कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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तब उसने शिवजी की तपस्या करके एक बालक प्राप्त किया। राजा ने जीवन से भी
अधिक प्यारे उस बालक का नाम रजतदंष्ट्र रख दिया ॥७३॥
पिता ने बाल्यरूप में ही स्नेह के कारण उसे सभी विद्याएँ सिखा दीं और बन्धुओं की
आँखों का तारा वह रजतदंष्ट्र क्रमशः बड़ा हुआ ॥७४॥
एक बार, उसने अपनी बड़ी बहन सोमप्रभा को गौरी के सामने पिञ्जरक नाम का बाजा
बजाते हुए देखा ॥७५॥
'बहन यह पिञ्जरक मुझे दो मैं भी बजाऊँ—इस प्रकार बाल-हठ के कारण बाजा माँगते
हुए उसे जब बहन ने बाजा नहीं दिया तब वह चंचलता के कारण उसकी बीन छीनकर पक्षी के
समान आकाश में उड़ गया ॥७६-७७॥
तब उसकी बहन ने उसे शाप दिया कि 'तू मेरे पिञ्जरक को हठपूर्वक लेकर पक्षी के
समान उड़ा इसलिए तू स्वर्णचूड़ पक्षी बनेगा' ॥७८॥
यह सुनकर उसके चरणों पर गिरे हुए भाई रजतदंष्ट्र द्वारा प्रार्थना की गई सोमप्रभा ने
उसके शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥७९॥
'मूर्ख तू पक्षी बनकर जब अँधेरे कुएँ में गिरेगा तब तुझे जो भी दयालु उससे बाहर
निकालेगा उसका उपकार करने पर तेरे शाप का अन्त होगा बहन से इस प्रकार कहा गया वह
भाई रजतदंष्ट्र स्वर्णचूड़ पक्षी के रूप में उत्पन्न हुआ ॥८०-८१॥
यह वही मैं स्वर्णचूड़ पक्षी रात को इस कूप में गिरा हुआ आज तुझ महात्मा द्वारा
निकाला गया हूँ सो अब मैं जाता हूँ ॥८२॥
'संकट के समय तुम मुझे स्मरण करना। तब तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शाप से मुक्त
हो जाऊँगा' ऐसा कहकर वह पक्षी चला गया ॥८३॥
तदनन्तर बोधिसत्त्व से पूछे गये सर्प ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार सुनाया ॥८४॥
सर्प की आत्मकथा
मैं पूर्वजन्म में कश्यप ऋषि के आश्रम में मुनिकुमार था। वहाँ एक मुनिकुमार मेरा
मित्र था ॥८५॥
एक बार स्नान के लिए सरोवर में उतरने पर मैंने तीर पर आये हुए तीन फना वाले
एक सर्प को देखा ॥८६॥
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