कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
षष्ठम लम्बक ८८७
षष्ठम लम्बक ८८७
किसी ने वहाँ पर सोने का पलंग लाकर बिछा दिया किसी ने उस पर लिहाफ के
साथ गद्दई बिछाईं, किसी ने सुन्दर पुष्प चुनकर सेज पर रख दिये । किसी ने उत्तमोत्तम भोजन-
पात्र लाकर वृक्ष के नीचे एक ओर सजा दिये ॥१६-१७॥
तदनन्तर, उस बावली के तल से कामदेव को जीतनेवाला रूपवान् दिव्य आभूषणों
से विभूषित और तलवार हाथ में लिये हुए एक दिव्य पुरुष बाहर निकला ॥१८॥
वहाँ आकर और उसके आसन पर बैठ जाने पर, उसका सारा सेवक-परिवार उसी
बावली में डूब गया ॥१९॥
तब उसने बावली से दो स्त्रियों को निकाला उनमें एक सुन्दरी मन्द वेषधारिणी और
मंगलसूचक वस्त्राभरणों से सुशोभित थी और दूसरी अत्यन्त सुन्दरी और भड़कीले वस्त्राभरणों
से युक्त थी। वे दोनों उसकी पत्नियां थीं उनमें दूसरी यानी छोटी उसे अधिक प्यारी थी ॥२०-२१॥
तब पहली पतिव्रता स्त्री ने पति और सपत्नी (सौत) के आगे रत्न की दो थालियों में
भोजन परोस दिया ॥२२॥
और, उन दोनों के भोजन कर लेने पर उस छठी स्त्री ने स्वयं भोजन किया। तदनन्तर,
उसका पति दूसरी छोटी स्त्री के साथ पलँग पर आनन्द-विलास करके नींद में सो गया। तब
उसकी बड़ी (पहली) स्त्री उसके पैर दबाने लगी और दूसरी स्त्री भी पलंग पर पड़ी हुई जाग
रही थी। ऊपर से यह सब देखकर उन ब्राह्मण-बालकों ने उसी वृक्ष पर बैठे हुए आपस में
कहा—'यह कौन होगा यह बात जानने के लिए पैर दबानेवाली इस स्त्री से पूछना चाहिए।
ये सभी कोई दैवी व्यक्ति हैं' ॥ २३—२५॥
ऐसा सोचकर और वृक्ष से उतरकर जब वे पहली स्त्री की ओर चले तबतक दूसरी
लेटी हुई स्त्री ने यशोधर को देख लिया और इतने में उस चञ्चलाक्षी वह सोये हुए पति के
पलंग से उठकर उसके पास आकर कहने लगी—'मेरा उपभोग करो' ॥२७-२८॥
यशोधर ने उससे कहा 'पापिन तू दूसरे की स्त्री है और मैं दूसरा पुरुष हूँ। फिर, इस
प्रकार क्या कहती है? तब वह स्त्री बोली—'मैं तेरे जैसे सौ पुरुषों का संगम कर चुकी हूँ तो
मुझे क्या डर है? यदि विश्वास न हो तो मेरी इन सौ अंगूठियों को देखो' ॥२९-३ १ ॥