सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

अष्टम लम्बक ४३१

अष्टम लम्बक ४३१
तब देवराज इन्द्र ने क्रोध से भरकर वज्र उठाकर सूर्यप्रभ पर प्रहार किया तो शिवजी ने
हुंकार कर दिया। फलतः वज्र नष्ट होगया ॥८४॥
तब इन्द्र के युद्धभूमि से चले जाने पर स्वयं नारायण क्रोध से भरकर तीक्ष्ण मुखवाले
बाणों से प्रभास को कढ़ाने लगे ॥८५॥
नारायण के अस्त्रों का उत्तर विरोधी अस्त्रों से देता हुआ प्रभास अविचल भाव से
छायारथ व्यक्ति के समान युद्ध करने लगा। घोड़ों के मर जाने और रथ के टूट जाने पर भी वह
दूसरे रथ पर चढ़कर लड़ रहा था। तब विष्णु भगवान् ने क्रुद्ध होकर प्रभास पर जलते
हुए चक्र का प्रहार किया तो तुरन्त प्रभास ने भी अभिमन्त्रित खड्ग का प्रयोग कर दिया। उन
दोनों अस्त्रों (चक्र और खड्ग) को परस्पर युद्ध करते हुए और चक्र से खड्ग को धीरे-धीरे
निर्बल होते हुए देख कर शंकर भगवान् ने हुंकार किया। उससे वे दोनों खड्ग और चक्र
अन्तर्हित हो गये ॥८६—८९॥
तब सूर्यप्रभ के विजयी होने और श्रुतशर्मा के पकड़कर बांध लिये जाने पर असुर
आनन्दित और देवता खिन्न हो गये ॥९०॥
तदनन्तर देवताओं ने स्तुति करके शंकर की आराधना की। फलतः प्रसन्न होकर
गिरिजापति शंकर भगवान् ने देवताओं से यह कहा—'मैंने सूर्यप्रभ से जो प्रतिज्ञा की है उसे
छोड़कर और कोई भी वर मांगो। देवताओं ने कहा—'भगवन्, आप जो प्रतिज्ञा कर चुके उसे
उलटने में कौन समर्थ हो सकता है, किन्तु हम लोगों ने भी श्रुतशर्मा को जो वचन दिया है वह
भी सत्य होना चाहिए। हमारे वंश का नाश नहीं होना चाहिए' ॥९१—९३॥
ऐसा कहकर चुप हुए देवताओं से भगवान् महादेव ने कहा—'परस्पर सन्धि कर लेने पर
ही यह सम्भव है। पहले श्रुतशर्मा अपने अनुचरों के साथ सूर्यप्रभ को प्रणाम करे, तब मैं उस
पक्ष के हित की बात कहूँगा' ॥९४—९५॥
शिवजी के ऐसा कहने पर 'ऐसा ही होगा' देवताओं ने कहा और श्रुतशर्मा को सूर्यप्रभ
के आगे विनम्र कर दिया ॥९६॥
तब उन लोगों के गले मिलने पर और आपसी शत्रुता छोड़ देने पर देवताओं और
असुरों ने बैर शान्त करके परस्पर मित्रता कर ली ॥९७॥
तदनन्तर, सभी सुरों और असुरों के नमते रहने पर, भगवान् शंभू ने सूर्यप्रभ से
कहा—॥९८॥
५५

कुरु दक्षिणवेद्यर्धे छत्रवासित्वमात्मनः।
उत्तरस्मिंस्तु वेद्यर्धे देहि तच्छ्रुतशर्मणे ॥९९॥
प्राप्तव्यमचिरात्पुत्र त्वया हीदृक्चतुर्गुणम्।
साम्राज्यं किन्नरादीनामशेषाणां द्युचारिणाम् ॥१००॥
तस्मिन्प्राप्ते च दद्यास्त्वं वेद्यर्धमपि दक्षिणम्।
तत्कुञ्जरकुमाराय सविशेषपदे स्थितः ॥१०१॥
ये चात्र निहता वीराः समित्युभयपक्षयोः।
उत्तिष्ठन्त्वक्षतैरङ्गैर्जीवन्तः सर्व एव ते ॥१०२॥
इत्युक्त्वान्तर्दधे शम्भुः सर्वे चोत्तस्थुरक्षताः।
सुप्तप्रबुद्धा इव ते येऽत्राभूवरणे हताः ॥१०३॥
अथ सूर्यप्रभो मूर्ध्नि धृतशाम्भवशासनः।
गत्वा विविक्तं विस्तीर्णं भूमिभागमरिन्दमः ॥१०४॥
उपविष्टो महास्थानं श्रुतशर्माणमागतम्।
निजसिंहासनार्धे तमुपावेशितवांत्स्वयम् ॥१०५॥
तद्वयस्याः प्रभासाद्या वयस्याः श्रुतशर्मणः।
दामोदराद्याश्च तयोः पार्श्वयोः समुपाविशन् ॥१०६॥
उपाविशत्सुनीथश्च मयश्चान्ये च दानवाः।
आसनेषु यथार्हेषु तथा विद्याधरेश्वराः ॥१०७॥
ततस्तत्राययुः सप्तपातालपीठयोत्थिताः।
प्रह्लादप्रमुखा दैत्यदानवेन्द्राः प्रहर्षतः ॥१०८॥
शक्रश्च लोकपालाविमुतो गुरुपुरस्सरः।
विद्याधरः सुमेरुश्च स सुवासकुमारकः ॥१०९॥
दनुप्रभृतयः सर्वाश्चाययुः कश्यपाङ्गनाः।
भूतासनविमानेन भार्याः सूर्यप्रभस्य च ॥११०॥
सर्वेष्वेपु दृष्टान्योन्यप्रीत्याचारोपवेशिषु।
सिद्धिनमि सखी धन्वास्तद्वाक्यमेवमम्यधात् ॥१११॥
भो भो सुरासुरा देवी दनुर्मुष्मन्निरीक्ष्यसौ।
अस्मिन्प्रीतिसमाजे यत्सीमन्तस्य सुखं च नः ॥११२॥
तद्भूतं यदि युष्माभिरनुभूतं बनाधन।
तदयोयं न कस्सभ्यो विरोधो दुरादादणः ॥११३॥