कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर
... = ... ... दृन्त्या प्रियया सहितस्त्वया।
शेषांश्च तव भजे पृथ्वीपतिः कृती ॥१९९॥
इत्युक्तः स्मरदो मन्त्री गोमुखस्तत्सुखोन्मुखः।
नरवाहनदत्तं तमुवाचोत्सुकः पुनः ॥२००॥
एष विरहो वीरं सत्त्वेशो विरहद्विषम्।
न तु सोढुं सहते नैकामपि देव निशां कथम् ॥२०१॥
भवन्तमलंकारवती हि परिणेष्यति।
श्वेतेतिविदुषो न तत्र तत्समागतः ॥२०२॥
तच्छ्रुत्वाऽथायमुचिवान् मरुभूतिरभाषत।
उत्सन्नरससन्ताप स्वस्थस्त्वं किं न जल्पसि ॥२०३॥
कुरुते पुमान् धैर्यं विवेकं धीरुमेव च।
यावन्नापतति कामस्य सायकानां न गोचरे ॥२०४॥
इक्ष्वाकुः सरस्वती स्कन्दो जिनश्च जगति त्रयः।
एवन्तमतीत्यवाक्षिप्ता व्याभूय यैः स्मरः ॥२०५॥
मरुभूतो वदत्येवमुद्विग्नं वीक्ष्य गोमुखम्।
नरवाहनदत्तस्तं समर्थयितुमभ्यधात् ॥२०६॥
विभोऽभ्यर्धमेतन्मे गोमुखो युक्तमुक्तवान्।
स्निग्धो हि विरहायासे सानुवादं वदति किम् ॥२०७॥
समाश्वास्यो यथाशक्ति स्वजनैर्विरहातुरः।
अतः परं स जानाति देवश्चासमसायकः ॥२०८॥
इत्यादि जल्पन्नुत्सृज्य तास्ताः परिजनाःकथाः।
नरवाहनदत्तस्तां त्रियामामप्यवाहयत् ॥२०९॥
अलंकारवतीनरवाहनदत्तयोर्विवाहः
अथ स प्रातरुत्थाय विहितावश्यकक्रियः।
गगनाववरोहन्तीमपश्यत्काञ्चनप्रभाम् ॥२१०॥
भर्त्रालंकारशीलेन धर्मशीलेन सूनुना।
तयालंकारवत्या च स्वदुहित्रा समन्विताम् ॥२११॥
ते चावतीर्य सर्वेऽपि तत्समीपमुपागमन्।
अभ्यनन्दच्च तान्सोऽपि सं च तेऽपि यथोचितम् ॥२१२॥
इन कार्यों से निवृत्त होकर राजा पृथ्वीरूप अपनी पत्नी रूपलता के साथ सांसारिक
सुख-भोग करने लगा ॥१९९॥
मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा सुनाकर अपनी ओर देखते हुए नरवाहनदत्त की ओर देख
कर फिर उससे बोला—॥२ ०॥
महाराज धीर लोग इस प्रकार कष्ट के साथ विरह को चिरकाल तक सहन करते हैं
और तुम एक रात्रि का भी वियोग सहन नहीं कर सकते ॥२ १॥
प्रात:काल ही तुम अलंकारवती को विवाहित करोगे। गोमुख के इस प्रकार कहने पर
उसी समय आया हुआ यौगन्धरायण का पुत्र मरुभूति बोला-‘गोमुख ! काम-पीड़ा से अनभिज्ञ
एवं भ्रान्तचित्त तुम यह क्या कह रहे हो ॥२ २–३ ॥
मानव धीरज विवेक चरित्र आदि को तभी तक धारण करता है, जब-तक वह
कामदेव के बाणों का लक्ष्य नहीं बन जाता ॥२ ४॥
सरस्वती स्कन्ध और जिन ये तीन ही संसार में धन्य हैं जिन्होंने काम को वस्त्र के कोने
में चिपके हुए कीट के समान फटकार दिया ॥२ ५॥
मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और गोमुख को घबराया हुआ देखकर नरवाहनदत्त ने
उसका पक्ष लेते हुए कहा-मेरे मन का विनोद करने के लिए गोमुख ने ठीक ही कहा क्योंकि
स्नेही व्यक्ति विरह के दुःख में क्या धन्यवाद देता है ? ॥२ ६-२ ७॥
आत्मीय जनों को वियोगावस्था में अपने व्यक्ति को धीरज ही देना चाहिए। उसके
आगे भगवान कामदेव ही जानें ॥२ ८॥
इस प्रकार की बातें और अपने साथियों से विविध प्रकार की चर्चाएँ करते हुए नरवाहन-
दत्त ने वह रात्रि किसी प्रकार व्यतीत की ॥२ ९॥
नरवाहनदत्त और अलंकारवती का विवाह
रात्रि व्यतीत होने के पश्चात् प्रात काल उठकर और प्रातःकालीन आवश्यक
क्रियाओं को समाप्त करके नरवाहनदत्त ने आकाश से उतरती हुई काञ्चनप्रभा विद्याधरी को
देखा ॥२१ ०॥
वह अपने पति अलङ्कारशील पुत्र धर्मशील और कन्या अलङ्कारवती के साथ थी ॥२११॥
वे सब उतरकर नरवाहनदत्त के समीप आये और उसने उनका यथोचित आदर
सत्कार किया ॥२१२॥