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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर
स प्रविष्टोऽत्र पुरुषो नैवाभ्यासितुमोजसा ।
शशाक तस्याः पर्यङ्के न्यषीदत् पुष्पासने ॥१२५॥
तद्दृष्ट्वा बत नीचोऽयमिति यावद्विषीदति ।
राज्ञी सा तावदत्रागादुपरिष्टाद् भ्रमन्नहिः ॥१२६॥
तं विलोक्य भयोत्थाय सहसा पुरुषोऽत्र सः ।
धनुरादाय भुजगं जघान विशिखेन तम् ॥१२७॥
विपन्नपतितं तं च गवाक्षात्क्षिप्तवान्बहिः ।
हर्षेण तन्मयोत्तीर्णो मनर्त स च कातरः ॥१२८॥
नृत्यन्तं वीक्ष्य तं खिन्ना सा कल्याणवती भृशम् ।
दध्यौ धिग्विधिमेतेन निःसत्त्वेनाधमेन मे ॥१२९॥
दृष्ट्वैव तद्विरक्तां तां चित्तज्ञा सा च तत्सखी ।
निर्गत्याशु प्रविश्यात्र जगाद कृतसम्भ्रमा ॥१३०॥
आगतस्ते पिता देवि तदयं यातु सम्प्रति ।
यथागतेनैव पथा स्वगृहं त्वरितं युवा ॥१३१॥
एव तयोक्ते निर्याते रज्ज्वा वातायनाद्बहिः ।
भयाकुलः स पतितो न दैवात् पञ्चतां गतः ॥१३२॥
गते तस्मिन्नुवाचैतां सा कल्याणवती सखीम् ।
सखि सुष्ठु कृतं नीचो यत्त्वयैष बहिष्कृतः ॥१३३॥
शान्तं त्वया मे हृदयं चेतो हि मम दूयते ।
भर्त्ता मे व्याघ्रसिंहादीन्विपाट्यापहृतो ह्रिया ॥१३४॥
अयं तु भुजगं हत्वा हीनसत्त्वः प्रनृत्यति ।
तत्तादृशं तं हित्वा किमस्मिन्मे प्राकृते रतिः ॥१३५॥
तदप्रतिष्ठितमतिं धिङ् मां धिगथवा स्त्रियः ।
या धावन्त्यगुणे हित्वा कर्पूरं मक्षिका इव ॥१३६॥
इति जातानुतापा सा राज्ञी नीत्वा निशां ततः ।
प्रतीक्षमाणा भर्त्तारमासीत्तत्र पितुर्गृहे ॥१३७॥
तावत्स दत्तान्यबलो गजानीकेन भूभुजा ।
गत्वा तान्प्राग्जयान्यस्य पापात्सिंहवतोऽब्रवीत् ॥१३८॥
ततः स सम्प्राप्य पुनः स्वराज्यमानीय भार्यां च पितुर्गृहात्ताम् ।
प्रपूज्य तं च श्वशुरं धनोपेतोऽनिष्कण्टकां क्ष्मां सुचिरं शशास ॥१३९॥

वह पुरुष उसके शयनागार में जाकर भी उसके तेज से प्रभावित होकर उसके पर्यंक पर
न बैठकर भूमि पर बिछे हुए अलग आसन पर ही बैठ गया ॥१२५॥
यह देखकर, जब रानी यह सोच रही थी कि अरे, यह तो कायर है, तो मन में दुख
करने लगी। इतने में ही छत के ऊपर से घूमता हुआ एक सर्प वहाँ आ निकला ॥१२६॥
उसे देखकर, भय से उठकर और धनुष लेकर उस पुरुष ने बाण से सर्प को मार
डाला ॥१२७॥
मरने के बाद गिरे हुए उस सर्प को उसने झरोखे से बाहर फेंक दिया। फलतः उस
भय से छूट जाने पर वह कायर प्रसन्न होकर नाचने लगा ॥१२८॥
उसे नाचते हुए देखकर व्याकुल वह कन्यावती गम्भीर चिन्ता करने लगी कि 'मुझे
धिक्कार है! ऐसे बलहीन और नीच पुरुष से मैं क्या समागम करूँ? ॥१२९॥
उस पुरुष को देखते ही रानी को विरक्त जानकर, उसके मनोभाव को जाननेवाली
सहेली ने उस कमरे में तुरन्त आकर घबराहट के साथ कहा—'हे देवि तुम्हारे पिता आये हैं
इसलिए यह युवापुरुष जिस मार्ग से आया था उसी मार्ग से अपने घर चला जाय' ॥१३०-१३१॥
उस सहेली के ऐसा कहने पर खिड़की से बाहर लटकती हुई रस्सी के सहारे वह निकला
किन्तु भय के कारण गिर पड़ा भाग्यवश मरा नहीं ॥१३२॥
उसके चले जाने पर कन्यावती अपनी सहेली से कहने लगी—'सखि अच्छा किया
तुमने जो इस अधम और कायर को बाहर निकाला ॥१३३॥
तुमने मेरे हृदय को जान लिया। मेरा चित्त दुःखी हो रहा है। मेरा पति तो सिंह,
जंगली हाथी और डाकुओं के दल का नाश करके भी लज्जा से उसे छिपाता है। और, यह कायर
तो साँप को मारकर नाचता है। इसलिए, ऐसे शूर-वीर पति को छोड़कर ऐसे पामर व्यक्ति
से मैं क्या प्रेम करूँ? ॥१३४-१३५॥
इस प्रकार चंचल बुद्धिवाली मुझे धिक्कार है। या उन सभी स्त्रियों को धिक्कार है,
जो मक्खियों की भाँति सुगन्धित कपूर को छोड़कर गन्दगी की ओर दौड़ती हैं ॥१३६॥
इस प्रकार पश्चात्ताप करती हुई रानी उस रात्रि को व्यतीत करके पति की प्रतीक्षा करती
हुई पिता के घर में रहने लगी ॥१३७॥
उधर, राजा विह्वल ने राजा गजानीक से और भी सेना की सहायता लेकर, चढ़ाई
करके अपने महाबली पाँचों कुटुम्बियों को पराजित किया ॥१३८॥
तदनन्तर, राजा विह्वल ने पुनः अपने राज्य को पाकर अपनी रानी कन्यावती को
पिता के घर से लाकर और श्वशुर को पर्याप्त धन देकर अपने निष्कंटक राज्य का चिरकाल तक
शासन किया ॥१३९॥