कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
७१२ कथासरित्सागर
७१२ कथासरित्सागर
पितुश्च क्षपितार्थं किं वक्ष्यस यास्यसि क्व वा।
तदितोऽद्यापि निर्याहि कल्याणे चेन्मतिस्तव ॥११६॥
एतत्तस्य वचः सख्यूर्र्वधीर्यं वणिग्युवा।
मासेनाप्यव्ययीचक्रे तत्र कोटित्रयं स तत् ॥११७॥
ततो हृतस्वो दत्तार्धचन्द्रः सुन्दरीगृहात्।
तया मकरदंष्ट्राख्य कुट्टन्या निरकाश्यत ॥११८॥
अर्थदत्तादयस्तं च गत्वा स्वनगरं द्रुतम्।
तत्पित्रे तत्समाचख्युर्यथावृत्तमशेषतः ॥११९॥
स तत्पिता रत्नवर्मा तद्बुद्ध्वा दुःखितो भृशम्।
कुट्टनीं यमजिह्वां तां गत्वावोचद्वणिग्पतिः ॥१२०॥
गृहीत्वा मूल्यमीदृक् त्वया मे शिक्षितः सुतः।
हृत मकरदंष्ट्रा यत्सर्वस्वं तस्य हर्म्यया ॥१२१॥
इत्युक्त्वा पुत्रवृत्तान्तं तस्यै स समवर्णयत्।
ततः सा यमजिह्वां तं वृद्धकुट्टन्यभाषत ॥१२२॥
आनाययेह पुत्रं ते करिष्यामि तथा यथा।
सम्या मकरदंष्ट्रास्तत्सर्वस्वं स हरिष्यति ॥१२३॥
एवं तया प्रतिज्ञाते कुट्टन्या यमजिह्वया।
तदद्य शीघ्र मन्विष्य भूय्या गानपुरःसरम् ॥१२४॥
रत्नवर्मा ततस्तस्य पुत्रस्यानयनाय च।
तन्मित्रमर्थदत्तं च प्रजिघाय हितैषिणम् ॥१२५॥
अर्थदत्त स गत्वा च तत्काञ्चनपुरं पुरम्।
तस्मै शं शंस सन्देशं शसदेवरवर्मणः ॥१२६॥
पुनरत्र धात्रवीमित्र माकार्षीस्त्वं बथा हि मे।
तदद्य वेदषामद्भावो दृष्ट प्रत्यक्षासत्प्रथया ॥१२७॥
अथधन्तस्खया प्राप्ता दृष्ट्वा ततोऽपिऽऽवदम्।
कः प्राज्ञा बाञ्छतिरतन् वश्यासु गिरसासु च ॥१२८॥
विमुच्यते वा भवता वग्गुपमौन्यमीदृशः।
तावद्विगन्धो धीरदप नरो भागी शुभस्य च ॥१२९॥
यावन्नमति नेत्राण रामाविभ्रमभूमिषु।
तदागच्छ पितुः पार्श्वं मय्यूप्रतिश्रोति कुरु ॥१३०॥
पिता का धन, नष्ट करने के बाद उनसे क्या कहोगे और कहाँ जाओगे ? इसलिए यदि
अपना कल्याण चाहते हो तो अब भी यहाँ से निकल चलो' ॥११६॥
उस युवक ने मित्र का कहना न मानकर शेष तीन करोड़ मुद्रा भी व्यय कर
डाली ॥११७॥
सारा धन समाप्त होने पर कुट्टनी मकरकटी ने ईश्वरवर्मा को सेवकों (नौकरों) द्वारा
अर्धचन्द्र (गरदनिया) दिलवाकर निकलवा दिया ॥११८॥
तब अर्थदत्त आदि उसके साथियों ने अपने नगर में जाकर उसके पिता को सम्पूर्ण
समाचार यथावत् सुना दिया ॥११९॥
यह समाचार सुनकर व्यापारियों का चौधरी रत्नवर्मा अत्यन्त दुःखी होकर यमजिह्वा
कुट्टनी के पास आकर बोला- ॥१२० ॥
'तूने इतना धन लेकर मेरे पुत्र को शिक्षा दी और मकरकटी ने सरलता के साथ उससे
पाँच करोड़ मुद्रा ठग ली' ॥१२१॥
इस प्रकार कहकर उसने पुत्र का सम्पूर्ण समाचार उसे सुना दिया। तब उस वृद्धा
कुट्टनी यमजिह्वा ने कहा- ॥१२२॥
'अपने पुत्र को तुम यहाँ बुलवाओ। मैं उसे ऐसी शिक्षा दूँगी कि वह मकरकटी का सारा
धन (सर्वस्व) हरण कर लेगा' ॥१२३॥
कुट्टनी यमजिह्वा के इस प्रकार प्रतिज्ञा करने पर रत्नवर्मा ने पुत्र के हितैषी मित्र
अर्थदत्त को दान आदि का प्रलोभन देकर ईश्वरवर्मा को बुलाने के लिए भेजा ॥१२४ १२५॥
वह अर्थदत्त उस कांचनपुर में जाकर ईश्वरवर्मा से फिर बोला कि 'तूने मेरी बात नहीं
मानी। आज वेश्या का सच्चा प्रेम तूने देख लिया। पाँच करोड़ मुद्रा देकर अर्धचन्द्र पाया।
कौन बुद्धिमान् वेश्या में और बाल में स्नेह (प्रेम और तेल) चाहता है ॥१२६-१२८॥
तुम्हें क्या कहूँ? यह वस्तु का स्वाभाविक धर्म है। चतुर और वीर व्यक्ति तभी तक
सम्मान के भागी होते हैं जबतक स्त्री की विलास-वासना में नहीं पड़ते। इसलिए अब चलो और
अपने पिता के शोक को दूर करो ॥१२९-३१ ॥