कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
सप्तम लम्बक ११७
सप्तम लम्बक ११७
यह सुनकर राजकुमार गया और जबतक तिलों के बोने की तैयारी करता है
तबतक देखता है कि उसकी प्रेयसी की माया के बल से सारी भूमि जुत गई और सारे तिल
बो दिये गये हैं ॥११९ १२० ॥
राजपुत्र ने जाकर अग्निशिख से खेत जोतने और तिल बोये जाने का समाचार सुना
दिया तब वह धूर्त और ठग राक्षस फिर बोला—॥१२१॥
'मुझे तिलों के बोने से कोई प्रयोजन नहीं है। तुम जाकर उन्हें एकत्र करके फिर
से ढेर लगा दो। यह सुनकर राजकुमार ने फिर सारा हाल रूपशिखा से कहा—'रूपशिखा ने
उस भूमि में अगणित चीटियाँ उत्पन्न करके उनसे उन तिलों को बिनवाकर अपनी माया से
ढेर करा दिया ॥१२२ १२३॥
यह देखकर राजपुत्र ने अग्निशिख से जाकर कहा कि वे तिल फिर ढेर कर दिये
गये ॥१२४॥
तब वह मूर्ख ठग फिर बोला—'यहाँ से दक्षिण की ओर आठ कोस पर शिव का एक
मन्दिर है। उसमे मेरा प्यारा भाई धूमशिख रहता है ॥१२५ १२६॥
तुम अभी वहाँ जाओ और देव-मन्दिर के सामने खड़े होकर मेरी ओर से कहना कि
'हे धूमशिख ! अपने अनुचरों के साथ तुम्हे निमन्त्रण देने के लिए मुझे अग्निशिख ने भेजा है।
तुम शीघ्र आना। कल प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा का विवाहोत्सव है। इतना कहकर
तुम आज ही लौटकर यहाँ आओ और प्रातःकाल मेरी कन्या रूपशिखा से ब्याह
करो ॥१२७—१२९॥
उस पापी अग्निशिख से इसप्रकार कहा गया राजकुमार 'ऐसा ही होगा' कहकर
रूपशिखा के पास आया और ये सारी बातें उससे कहीं ॥१३० ॥
उस पतिव्रता ने उसे मिट्टी पानी काँटे और आग एवं अपना अच्छा घोड़ा देकर
कहा—॥१३१॥
'इस अच्छे घोड़े पर चढ़कर, उस देव-मन्दिर का प्रणाम कर तथा धूमशिख को मेरे
पिता की ओर से निमंत्रण करके तुम दौड़ते हुए इस घोड़े से शीघ्र आ जाओ। आते हुए गर्दन
घुमाकर बार-बार पीछे की ओर देखना ॥१३२ १३३॥
पश्चात्तमागतं धूमशिखं द्रक्ष्यसि यत्ततः।
सन्मार्गे मृत्तिकां ते प्रक्षेप्स्यात्मपृष्ठतः ॥१३४॥
ततोऽपि पश्चादागच्छेत् स ते धूमशिखो यदि।
तथैव पृष्ठतस्त्याज्यं तोयमेव त्वयान्तरा ॥१३५॥
तदप्यत्येति चेत्क्रम्यास्तद्वदेतेऽप्य कण्टकाः।
तथापि चेत्सोऽनुपतेन् मध्येऽग्निमिमं क्षिप ॥१३६॥
एवं कृते हि निर्वेन्यस्त्वमिष्टंवाप्स्यसि मा च ते।
विकल्पोऽभूद्ध्रुवं प्रत्यस्य च विद्याबलं मम ॥१३७॥
इत्युक्तः स तया शृङ्गभुजो धृतमुदादिकः।
तथेति तद्यातश्चोदरण्ये देवकुलं ययौ ॥१३८॥
तत्र वामस्थगौरीकं दक्षिणस्थविनायकम्।
दृष्ट्वा नत्वा च विश्वेशमुक्तचैवाग्निशिखोदितम् ॥१३९॥
निमन्त्रणवचस्तस्य तूर्ण धूमशिखस्य तत्।
ततश्चारुह्य चतुरं प्रधाविततुरङ्गमम् ॥१४०॥
क्षणाच्च पृष्ठतो यावदीक्षते वलिताननः।
तावद्धूमशिखं पश्चादागतं तं ददर्श सः ॥१४१॥
चिक्षेप चाशु मार्गेऽस्य मृत्तिकां तां स्वपृष्ठतः।
क्षिप्तमात्रं तया मध्ये सद्योऽभूत्पर्वतो महान् ॥१४२॥
तमुल्लङ्घ्य कथञ्चित्तमागतं वीक्ष्य राक्षसम्।
तथैव पृष्ठतस्तोयं तत्स राजसुतोऽप्रक्षिपत् ॥१४३॥
तेन तत्रान्तरा जज्ञे वेल्लद्वीचिर्महानदी।
तामप्युत्तीर्य कथमप्यागतेऽस्मिन्निशाचरे ॥१४४॥
शीघ्रं शृङ्गभुजः पश्चात्कण्टकांस्तामवाकिरत्।
तैर्बभूव गहनं वनं मध्ये सकण्टकम् ॥१४५॥
ततोऽपि निर्गते तस्मिन् राक्षस्यग्निं स्वपृष्ठतः।
अहो तेन स जज्वाल मार्गं सत्तृणकाननम् ॥१४६॥
तं वीक्ष्य साण्डबमिव ज्वलितं दुरतिक्रमम्।
ययौ धूमशिखः खिन्नो भीतश्च स यथागतम् ॥१४७॥
सदा रूपसिखामायामोहितः स हि राक्षसः।
पद्भ्यामागावगाञ्चैव न सस्मार मनोजवित्वम् ॥१४८॥