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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

द्वादश लम्बक ८४३

Page 892Permalink

द्वादश लम्बक ८४३
समुद्र की लहरों में निशान लगानेवाले की कथा
अब एक चिल्लकर्त्ता की कथा सुनो। समुद्री नाव से यात्रा करते हुए किसी मूर्ख
का एक सोने का बरतन समुद्र में गिर गया। उस मूर्ख ने वहाँ पर लहरों और जल के भँवरों पर
मन ही-मन निशान (चिह्न) लगा लिया और यह सोचा कि 'लौटते समय यहाँ से बरतन निकाल
लूँगा जब वह उधर से लौटा तब पानी में अपने चिह्न का स्मरण करके बरतन निकालने के
लिए समुद्र में कूद पड़ा। लोगों के पूछने पर अपना अभिप्राय बताने पर उसकी हँसी हुई और
लोगों ने उसे मूर्ख बनाकर धिक्कारा ॥२७८-२८१॥
मांस के बदले में मांस देनेवाले राजा की कथा
अब अन्य में मांस देनेवाले एक राजा की कथा सुनो। एक राजा ने महल से दो
व्यक्तियों को देखा उनमें एक ने रसोइघर से मांस चुरा लिया था। राजा ने आज्ञा देकर उसके
शरीर से पाँच पल (२ तोला) मांस कटवा लिया। मांस काटने पर उसे रोने-बिलखने और
भूमि पर लोटते देखकर राजा को दया आ गई और उसने द्वारपाल को आज्ञा दी कि पाँच पल
मांस काट लेने से इसकी वेदना शान्त नहीं हो रही है इसलिए इस एक पाव से अधिक मांस
दे दो॥२८२-२८६॥
'महाराज गला काट लेने पर गो गले दने पर भी क्या पुरुष फिर जी सकता है—ऐसा
कहकर बाहर जाकर और पेट पकड़कर द्वारपाल खूब हँसा ॥२८७॥
और आश्वासन देकर उस काटा हुआ मांस जोड़कर वैद्य को सौंप दिया। सच है
मूर्ख राजा दंड देना और कृपा करना भी नहीं जानते ॥२८८॥
एक को मारकर दूसरा पुत्र चाहनेवाली स्त्री की कथा