कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
सप्तम लम्बक ११३
सप्तम लम्बक ११३
क्योंकि तुमने बगुला बने मेरे पिता को भीषण बाण से बींध दिया। उस सोने के बाण को
मैंने देखने के लिए पिता से ले लिया है ॥८९॥
मेरे पिता को उसके मन्त्री महादंष्ट्र ने विशल्यकरणी आदि ओषधियों से तुरन्त अच्छा
कर दिया है ॥९०॥
तो मैं पिता को सूचित करके तुम्हें शीघ्र अन्दर लिवा ले जाती हूँ। हे आर्यपुत्र !
मैंने अपने को तुम्हें दे डाला है ॥९१॥
ऐसा कहकर और शृंगभुज को बैठाकर वह रूपशिखा पिता अग्निशिख के पास
गई ॥९२॥
'हे पिता ! शृंगभुज नाम का एक राजकुमार यहाँ आया है। वह रूप, शील (चरित्र)
अवस्था और गुणों से असाधारण व्यक्ति है। मालूम होता है कि वह कोई पृथ्वी पर अवतीर्ण
देवता का अंश है, मानव नहीं है। यदि वह मेरा पति न होगा तो मैं निश्चय ही प्राण त्याग कर
दूँगी' ॥९३-९४॥
रूपशिखा से इस प्रकार कहे गये उसके पिता ने कहा—'बेटी ! मनुष्य तो हमारे भक्ष्य हैं।
तो भी यदि तुम्हारा आग्रह है, तो वही ठीक है। तुम उस राजकुमार को यहीं लाकर दिखाओ।
ऐसा सुनकर रूपशिखा शृंगभुज के समीप गई और जो कुछ किया था, उसे कहकर पिता के समीप
ले गई। अग्निशिख ने भी उसे विजयी देखकर सत्कार किया और बोला—॥९५-९७॥
'हे राजकुमार ! मैं तुम्हें इस रूपशिखा को देता हूँ, यदि तुम कभी मेरी बात को
इधर-उधर न करोगे' ॥९८॥
ऐसा कहते हुए अग्निशिख से विजयी शृंगभुज बोला—'ठीक है, तुम्हारी आज्ञा के
वचनों का उल्लङ्घन कभी न करूँगा' ॥९९॥
शृंगभुज से इस प्रकार कहा गया प्रसन्न अग्निशिख बोला—'अब उठो और स्नानगृह से
स्नान करके आओ' ॥१००॥
उसे ऐसा कहकर रूपशिखा से बोला—'तू भी जा और सब बहनों को लेकर शीघ्र जा'
इस प्रकार अग्निशिख से कहे गये शृंगभुज और रूपशिखा—दोनों 'जो आज्ञा' कहकर
बाहर निकले ॥१०१-१०२॥
बाहर आकर रूपशिखा ने शृंगभुज से कहा—'आर्यपुत्र ! मेरी एक सौ कुँवारी
बहनें हैं। ॥१०३॥
१५
सर्वा वयं सदृश्यश्च तुल्याभरणवाससः।
सर्वासां सन्ति कण्ठेषु तुल्या हारलताश्च नः॥१०४॥
तत्तातो मेलयित्वास्मांस्त्वां विमोहयितुं प्रिय।
आसां मध्यादभीष्टां त्वं वृणीष्वेति वदिष्यति॥१०५॥
जानाम्येतमहं तस्य व्याजाभिप्रायमीदृशम्।
सर्वा सङ्कटयत्यस्मान्किमर्थमयमन्यथा ॥१०६॥
तवा मूर्ध्नि करिष्ये च कण्ठाद्धारलतामहम्।
तदभिज्ञानलक्ष्म्या यां वनमालां मयि क्षिपे ॥१०७॥
भीतप्रायश्च तातोऽस्य बुद्धिर्नास्य विवेकिनी।
तथा मय्यपि मार्गोऽस्य जातिसिद्धः क्व गच्छति॥१०८॥
तदस्य वञ्चनार्थं ते यद्यत्किञ्चिद्वदिष्यति।
अङ्गीकृत्य त्वया तत्तद्वाच्यं मे वेद्म्यहं परम्॥१०९॥
इत्युक्त्वा भगिनीनां सा पार्श्वं रूपशिखा ययौ।
तथेत्युक्त्वा च गतवांस्नातुं शृङ्गभुजोऽपि सः॥११०॥
अथागात्स्वसृभिः साकं पार्श्वं रूपशिखा पितुः।
सोऽपि शृङ्गभुजश्चैतैः स्नापितोऽत्रागमत्पुनः॥१११॥
आसां मध्यान्निजेष्टायै प्रयच्छैतामिति ब्रुवन्।
वनमालां ददौ शृङ्गमूनायाग्निशिखोऽथ सः॥११२॥
सोऽप्यादायैव तां रूपशिखायाः क्षिप्तवान्गले।
प्राङ्मूर्धन्यस्तसङ्केतहारभ्रष्टेनुं पारमञ्ज ॥११३॥
ततः सोऽग्निशिखो रूपशिखां शृङ्गभुजान्विताम्।
निजगाद विभास्ते यां प्रातस्ताहमङ्गलम्॥११४॥
इत्युक्त्वा तौ च ताश्चान्या विससर्ज सुता गृहम्।
क्षणाच्च तं शृङ्गभुजं समाहूयैवमब्रवीत्॥११५॥
गच्छैवं दान्तयुगलं समादाय पुरावहिः।
राधिस्यं भुवि तन्नाद्य तिलसारीशतं वप॥११६॥
तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा गत्वा शृङ्गभुजोऽब्रवीत्।
खिन्नो रूपशिखायास्तत्साप्येवं निजगाद तम्॥११७॥
आर्यपुत्र न कार्यस्ते विषादोऽत्र मनागपि।
गच्छ त्वं साधयाम्येतदहं क्षिप्रं स्वमायया॥११८॥