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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१९० कथासरित्सागर

१९० कथासरित्सागर
दृष्ट्वैव तद्गतमनास्तथाभूदचलप्रभा ।
आङ्गिकोऽभिनयोऽप्यस्या दृष्ट्वैवाविनयरथा ॥२३८॥
समाप्याथ तयोर्भावं तं द्वयोरप्यसक्यन् ।
प्रेक्षणं चोपसंजह्रुः श्रान्ता राजसुतेति ते ॥२३९॥
सठं सूर्यप्रभं तिर्यक् पश्यन्ती सा महल्लिका ।
पित्रा विसृष्टा वन्दित्वा दानवेन्द्रानगाद्गृहम् ॥२४०॥
दानवेन्द्राश्च ते सर्वे यथास्वमगमन् गृहान् ।
सूर्यप्रभोऽपि स्वावासमाजगाम दिनक्षये ॥२४१॥
प्रदोषे च कलावत्या पुनरागतया सह ।
सुष्वापाम्यन्तरे गुप्तं बहिः सुप्ताखिलानुगः ॥२४२॥
ताव महल्लिका सार्धं वत्सन्दर्शनसोत्सुका ।
तत्राययौ सविस्रम्भमवयस्याद्वयसङ्गता ॥२४३॥
अन्तत्प्रवेष्टुमिच्छन्तीं प्रज्ञाढ्याख्यो ददर्श ताम् ।
सूर्यप्रभस्य सचिवो निद्रया तत्क्षणोज्झितः ॥२४४॥
देवि तिष्ठ क्षण यावत् प्रविश्याभ्यन्तरादहम् ।
निर्गच्छामीति स च तां परिज्ञायोत्थितोऽभ्यधात् ॥२४५॥
रुद्धाः स्म किं बहिः कस्मादद्य चेति सशङ्कया ।
तया पृष्टः स मूढोऽपि प्रज्ञाढ्यो निजगाद ताम् ॥२४६॥
स्वैरं सुप्तस्य सहसैकान्तिकं किं प्रविश्यते ।
सुप्तश्चास्मतप्रभुरसावेको व्रतबशादिति ॥२४७॥
तत्तस्तथा विधत्स्व त्वमित्युक्तः सविलक्षया ।
प्रह्लादवैद्यसुतया प्रज्ञाढ्योऽन्तर्विवेश सः ॥२४८॥
सुप्तां कलावतीं दृष्ट्वा तस्मै सूर्यप्रभाय सः ।
प्रबोध्य स्वैरमाचख्यावागतां तां महल्लिकाम् ॥२४९॥
सूर्यप्रभश्च श्रुत्वा तच्छय्योत्थाय निर्गतः ।
दृष्ट्वा महल्लिकामात्मवृत्तीयामप्यभाषत ॥२५०॥
प्रीता कृतार्थता तामद्ययमभ्यागतो जनः ।
नीयतां स्थानमप्येतदासनं परिगृह्यताम् ॥२५१॥
तत्तस्तरोपविशदाथ सहास्याभ्यां महल्लिका ।
सूर्यप्रभोऽप्युपाविशत्स प्रज्ञाढ्ययुतस्ततः ॥२५२॥

उसे देखते ही महल्लिका का मन ऐसा विचलित हुआ कि मानों उसके इस अभिनय को
देखकर क्रोध से आंगिक अभिनय भ्रष्ट-सा हो गया ॥२३८॥
सभा में बैठे हुए सभी सदस्यों ने उन दोनों को समझ लिया और 'राजकुमारी थक गई है'
ऐसा कहकर उस दृश्य को स्थगित कर दिया ॥२३९॥
वह महल्लिका भी सूर्यप्रभ को तिरछी दृष्टि से देखती हुई पिता से जाने की आज्ञा पाकर,
सभी सदस्यों को प्रणाम करके घर चली गई ॥२४ ॥
सभी दानवराज भी नृत्य के उपरान्त अपने-अपने घरों को चले गये। सायंकाल होने पर
सूर्यप्रभ भी अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥२४१॥
रात होने पर पुनः शयन-गृह में आई हुई कलावती के साथ वह सो गया और उसके साथी
मन्त्री भवन के बाहर अन्यत्र सो गये ॥२४२॥
इसी बीच सूर्यप्रभ से मिलने की लालसा से महल्लिका भी घबराती हुई दो सखियों को साथ
लेकर वहाँ आई ॥२४३॥
कमरे के अन्दर जाती हुई उसे देखकर अकस्मात् जाग पड़े सूर्यप्रभ के मन्त्री प्रज्ञाढ्य ने
उसे देखा ॥२४४॥
और उसे पहचानकर कहा-'रुको रुको। मैं अन्दर जाकर और लौटकर
आता हूँ' ॥२४५॥
'हम क्यों रोका गया और आप सब लोग बाहर क्यों हैं'—महल्लिका के इस प्रकार प्रश्न
करने पर प्रज्ञाढ्य ने कहा—'क्या स्वतन्त्रता से सोए हुए किसी व्यक्ति के पास एकाएक चला जाना
उचित है ? हमारे स्वामी किसी व्रत (नियम) के कारण अकेले सो रहे हैं ॥२४६-२४७॥
'अच्छा भीतर जाओ'—लज्जिता महल्लिका के इस प्रकार कहने पर प्रज्ञाढ्य
अन्दर गया ॥२४८॥
वहाँ कलावती को सोती देखकर उसने सूर्यप्रभ को जगाकर अपनी इच्छा से आई हुई
महल्लिका का समाचार दिया ॥२४९॥
यह सुनकर सूर्यप्रभ धीरे से उठकर बाहर निकल आया और दो सखियों के साथ आई
हुई महल्लिका से बोला—॥२५ ॥
'आपने इस अभ्यागत अतिथि को अपने शुभागमन से कृतार्थ किया अब आप इस स्थान
को भी कृतार्थ करें, यह आसन स्वीकार कीजिए' ॥२५१॥
यह सुनकर महल्लिका दोनों सखियों के साथ बैठ गई। सूर्यप्रभ भी प्रज्ञाढ्य के साथ
सामने बैठ गया ॥२५२॥