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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

८८ कथासरित्सागर

८८ कथासरित्सागर
केचिन्मूर्खाः समाहूय न्ययोज्यन्ताधिकारिभिः ।
ग्राम्या राजकुलाविष्ट खर्जूरानयनं प्रति ॥३२॥
ते दृष्ट्वर्का सुखग्राह्यां खर्जूरपतितां स्वतः ।
खर्जूरीं तत्र खर्जूरीः सर्वा ग्रामे स्वकेऽच्छिदन् ॥३३॥
पतितास्ताश्च कलितास्तेषखर्जूरसञ्चयाः ।
उत्पाप्यारोपयामासुर्न चैषां सिद्ध्यति स्म तत् ॥३४॥
ततश्चानीतखर्जूरा बादृतारोपणेन ते ।
खर्जूरीच्छेदनं बुद्ध्वा राज्ञा प्रत्युत दण्डिताः ॥३५॥
मूर्खमन्त्रि कथा
उक्तं खर्जूरघासोऽथ निष्फालोकनमुच्यते ।
निधानदर्शी केनापि कोष्याज्ञाहे महीभुजा ॥३६॥
मा गात्क्वापि पलाय्यापि राजकुर्मत्रिणा ।
नेत्रे तस्योदपाट्येतां निधानस्थानदर्शिनः ॥३७॥
भूरूक्ष्णाम्धपदस्मस्त गतावप्यगतौ समम् ।
अन्ध दृष्ट्वा च तं मन्त्री स जडो जहसे जनैः ॥३८॥
लवणभक्षकस्य मूर्खस्य कथा
निधानालोकनं श्रुत्वा श्रूयतां लवणाशनम् ।
बभूव गह्वरो ग्रामवासी कोऽपि जडः पुमान् ॥३९॥
स मित्रेण गृहं जातु नीतो नगरवासिना ।
भोजिता लवणस्वादूत्यन्नानि व्यञ्जनानि च ॥४०॥
केनेय स्वादुतान्नानेरित्यपृच्छत्स गह्वरः ।
प्राधान्याल्लवणेनेति तेनोचे सुहृदा तदा ॥४१॥
तदेव सहि भोक्तव्यमित्युक्त्वा लवणस्य सः ।
पिष्टस्य मुष्टिमादाय प्रक्षिप्यामक्षयन्मुखे ॥४२॥
तच्छूनं तस्य दुर्बुद्धेरोष्ठौ द्मश्रूणि घालिपत् ।
हसतस्तु जनस्यात्र मुखं धवरतां ययौ ॥४३॥
मूर्खगोदोहककथा
लवणाशी ध्रुतो येव त्वया मोदोहकः शृणु ।
ग्राम्यः कश्चिदभून्मुग्धो गोरेका तस्य चाभवत् ॥४४॥

पञ्चम सम्वाद ८०९
राजा के आज्ञानुसार उसके कुछ अधिकारियों ने कुछ गँवारों को बुलाकर खजूर तोड़
लाने के लिए नियुक्त किया ॥१२॥
उन लोगों ने खजूर के एक पेड़ को गिरा देखकर और उससे खजूरों को बिना कष्ट
के पाने के योग्य समझकर, अपने गाँव के सभी खजूर के पेड़ काटकर गिरा दिये ॥१३॥
उन गिरे हुए वृक्षों के सारे खजूर एकत्र कर लेने पर वे उन वृक्षों को उठाकर फिर से
रोपने लगे किन्तु ऐसा न कर सके । तब राजा के पास खजूर लाने पर उनकी मूर्खता को सुनकर
राजा ने सभी को दंड दिया ॥१४-१५॥
मूर्ख मन्त्री की कथा
खजूर खानेवालों का हास्य सुना । अब भूमि में गड़े धन को देखनेवाले की कथा सुनो।
किसी राजा ने गड़ा हुआ धन बताने के लिए किसी ज्ञानी को कहीं से बुलवाया। किन्तु, राजा
के मूर्ख मन्त्री ने सोचा कि यह कहीं भाग न जाय इसलिए उसकी दोनों आँखें निकलवा
लीं ॥१६-१७॥
तब वह ज्ञानी भूमि के लक्षण देखने और चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गया। उसे
अन्धा देखकर सभी लोग हँसी करने लगे ॥१८॥
नमक खानेवाले की कथा
अब एक नमक खानेवाले की कथा सुनो।
किसी गाँव का रहनेवाला मङ्गर नाम का एक वज्रमूर्ख पुरुष था। उसको किसी नागरिक
मित्र ने अपने घर लेजाकर खूब स्वादिष्ट भोजन कराया ॥३९-४०॥
उस मङ्गर ने अपने मित्र से पूछा कि 'भोजन में इतना स्वाद किस कारण हुआ ? तब
उसने कहा—'इसमें प्रधानता नमक की है' ॥४१॥
तब उस गँवार ने सोचा कि जब अल्प से ही इतना स्वाद है, तो क्यों न केवल नमक ही
खाया जाय। ऐसा सोचकर उसने मुट्ठी-भर नमक का चूर्ण मुँह में डाक लिया और खाने
लगा ॥४२॥
उस नमक के चूर्ण से उस मूर्ख के ओठ दाढ़ी और मूंछ सब मर गये और उसका श्वेत मुँह
का देखकर लोगों के मुँह भी हँसी से श्वेत हो गये ॥४३॥
गाय दुहनेवाले की कथा
हे प्रभो सस्याघाती की कथा तुमने सुनी। अब गौ दुहनेवाले की कथा सुनो। एक गँवार
ग्वाला था। उसके पास एक गाय थी ॥४४॥
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