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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

नवम लम्बक ५१

नवम लम्बक ५१
आक्रमण करते हुए एक सिंह को वीर खड्गधर ने तलवार के एक ही प्रहार से
दो टुकड़े करके मार डाला ॥१२७॥
और, दूसरे सिंह के पैरों को बायें हाथ से पकड़कर और घुमाकर पृथ्वी पर पटककर मार
डाला ॥१२८॥
इसी प्रकार भाषा-विज्ञानी वैश्य ब्राह्मण और पंचपट्टिक शूद्र आदि तीनों वीरों ने
पैदल चलते हुए ही राजा के सामने अनेक सिंह बाघ आदि को पृथ्वी पर पटक-पटककर सहज ही
में मार डाला ॥१२९-१३०॥
तब आश्चर्य के साथ सन्तुष्ट राजा शिकार खेलकर नगर को लौट आया और वे चारों
वीर दाता के घर पर, अपने निवास-स्थान को चल गये ॥१३१॥
तब राजा ने श्रान्त होते हुए भी उसी समय अपने रनिवास में जाकर वहीं अनंगरति को
बुलवाया और शिकार के समय उन वीरों का जो पराक्रम और कौतुक देखा था सब उस बहू
सुनाया। यह सब सुनकर और जानकर वह भी अत्यन्त चकित हुई ॥१३२-१३३॥
राजा ने कहा—'बेटी पंचपट्टिक और भाषाविज्ञानी ये दोनों यद्यपि समान वर्ण (जाति)
के नहीं हैं और यदि ब्राह्मण जीवदत्त कुरूप और कुत्सित कर्म करनेवाला है तो क्षत्रिय खड्गधर
का क्या दोष है? उसका कुल और रूप भी सुन्दर है तथा वह शूर और पराक्रम
शाली है ॥१३४-१३५॥
जिसने एक मदोन्मत्त और पागल हाथी को मार दिया और जो सिंहों को पकड़कर भूमि
पर पछाड़कर, मसल डालता है और खड्ग से उनके दो टुकड़े कर डालता है ॥१३६॥
यदि तुम उसके ये दो दोष बताती हो कि वह दरिद्र है और सेवक है तो मैं उसे राज भर
में दूसरों से सेवा किये जाने योग्य अर्थात् राजा बना दूँगा ॥१३७॥
इसलिए बेटी यदि तुम्हें वह अच्छा लगे तो उसे पति बना लो। पिता द्वारा इस प्रकार
कही गई अनंगरति बोली—॥१३८॥
'लगी बात है तो सब को यहीं बुलाकर और ज्योतिर्विदों को भी बुलवाकर
पूछो कि वे क्या बतलाते हैं॥१३९॥
यह सुनकर राजा ने उन वीरों को बुलवाकर उनके सामने ही ज्योतिषी से अनुराग के
साथ स्वयं पूछा—॥१४०॥
'देखो इन चारों में अनंगरति के साथ किसकी कुण्डली मिलती है और उसके विवाह का
लग्न कब कब है ? ॥१४१॥

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५२ कथासरित्सागर

तच्छ्रुत्वा पृष्टनक्षत्रस्तेषां स गणकोत्तमः ।
गणयित्वा चिरं कालं राजानं तमभाषत ॥१४२॥
न चेत् कुप्यसि मे देव स्फुटं विज्ञापयामि तत् ।
अस्ति त्वद्दुहितुर्नेषामेकेनाप्यनुकूलता ॥१४३॥
न चेहास्ति विवाहोऽस्या एषा शापच्युतात्र यत् ।
विद्याधरी स शापोऽस्यास्त्रिभिर्मासैर्निवर्त्स्यति ॥१४४॥
तस्मान् मासत्रयं तावत् प्रतीक्षन्ताममी इह ।
नैषां स्वलोकं याता चेत्तत एतद् भविष्यति ॥१४५॥
एतन्मौहूर्तिकस्यास्य वचः सर्वेऽपि तत्र ते ।
श्रद्दधुस्तत्र चैवासन् वीरा मासत्रयावधि ॥१४६॥
गते मासत्रये राजा तान् वीरान् गणकं च सम् ।
स्वाग्रमानाययामास तामनङ्गरतिं च सः ॥१४७॥
दृष्ट्वा चाधिकसौन्दर्याम कस्मात् तां सुतां नृपः ।
बह्वर्षं गणकस्तां तु प्राप्तकालममन्यत ॥१४८॥
इदानीं ब्रूहि यद्युक्तं त हि मासास्त्रयो गताः ।
इति यावच्च तं राजा गणकं पृच्छति स्म सः ॥१४९॥
तावज्जातिं निजां स्मृत्वा सानङ्गरतिराननम् ।
आच्छाद्य स्वोत्तरीयेश मानुषीं तां तनुं जहाौ ॥१५०॥
एवमेषा स्थिता किंस्विदिति राजा स्वयं मुखम् ।
यावदुद्घाटयते तस्यास्तावत् सा ददृशे मृता ॥१५१॥
व्यामुक्त्तनेत्रभ्रमरा विवर्णवदनाम्बुजा ।
हप्तमञ्जुस्वना मुक्ता पद्मिनीव हिमाहता ॥१५२॥
ततः स सद्यस्तच्छोकवज्रपाताहतो भुवि ।
भूभृत् पपात निर्घोषः स्वपक्षच्छेदमुच्छ्रितः ॥१५३॥
राज्ञी पद्मवती सापि व्यामोहपतिता ययौ ।
भ्रष्टामरणपुष्पा क्ष्मामिभमग्नेव मञ्जरी ॥१५४॥
मुक्ताक्रन्दे परिजने तेषु वीरेषु दुःखिषु ।
सम्भ्रमांत क्षणाद्राजा जीववत्तमुवाच तम् ॥१५५॥


[Footnote]
१ भू भृतः । राज्ञः पर्वतस्य च श्लेषेण वर्णनम् ।