कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
अष्टम लम्बक १३७
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अष्टम लम्बक १३७
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वहाँ जाकर प्रतीहार से सूचित और सभागृह में गए हुए मैंने उन विद्याधर-राजाओं से
घिरे हुए श्रुतशर्मा को देखा ॥१५४॥
पिता त्रिकूट, सेनापति विक्रमशक्ति और दामोदर आदि शूरवीर उसके समीप बैठे थे।
तदनन्तर, आसन पर बैठकर मैंने श्रुतशर्मा से कहा—'मुझे श्रीमान् सूर्यप्रभ ने दूत के रूप में आपके
पास भेजा है और आपके लिए उन्होंने सन्देश दिया है कि मैंने शिवजी की कृपा से विद्या, रत्न, भार्या
और सहायक सिद्ध कर लिये। इसलिए, तुम भी इन विद्याधरों के साथ मेरी सेना में आकर मिलो।
मैं विरोधियों का घातक और नम्रों का रक्षक हूँ ॥१५५-१५८॥
तुमने अनजान में मुनीश की अगम्या कन्या कामचूडामणि का जो अपहरण किया है,
उसे मुक्त करो। यह कार्य तुम्हारे लिए अशुभ है॥१५९॥
मेरे ऐसा कहने पर वे सब क्रुद्ध होकर बोले—'वह कौन होता है, जो घमंड के साथ हमें
यह सन्देश भेजता है॥१६०॥
वह मनुष्यों के लिए ऐसा सन्देश दे। विद्याधरों में इस प्रकार का सन्देश देनेवाला वह कौन
होता है। मनुष्य होकर ऐसा घमंड करता हुआ वह बेचारा नष्ट हो जायगा' ॥१६१॥
यह सुनकर मैंने कहा—'क्या कहा वह कौन होता है? तो सुनो, शिवजी ने अब उन्हें
तुम लोगों का चक्रवर्ती बनाया है॥१६२॥
यदि वे मनुष्य हैं तो क्या? मनुष्यों ने तो देवत्व भी सिद्ध कर लिया है और विद्याधरों ने
उस मनुष्य का पराक्रम देख लिया है॥१६३॥
उसके यहाँ आने पर तुम लोगों का विनाश होगा, यह निश्चित है। मेरे ऐसा कहने पर
वह सारी सभा क्षुब्ध होगई ॥१६४॥
और, श्रुतशर्मा तथा शूरवीर मुझे मारने के लिए दौडे। 'यही आपकी वीरता है?' इस
प्रकार मेरे कहने पर दामोदर ने उन्हें रोका तथा शान्त किया और कहा—दूत और ब्राह्मण दोनों
अवध्य हैं। उन्हें न मारना चाहिए' ॥१६५-१६६॥
तब विक्रमशक्ति ने मुझसे कहा—'हे दूत, तुम जाओ। तुम्हारे स्वामी के ही समान हम
सब भी ईश्वर के बनाये हुए हैं॥१६७॥
'वह आवे। हम सब उसका आतिथ्य करने में समर्थ हैं।' गर्व के साथ उसके इस प्रकार
कहने पर मैंने हँसते हुए कहा—॥१६८॥
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