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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१४६ कथासरित्सागर

१४६ कथासरित्सागर
इत्युक्तो देवगुरुणा महेन्द्रस्त्रिदशैः सह।
गत्वा ययाचे नमुचिं तमुच्चैःश्रवसं हयम् ॥२२८॥
न मे पराङ्मुखो गच्छेत्प्रार्थी सन्नापि वासवः।
तस्मै नमुचिर्भूत्वा दद्यां नाहं कथं हयम् ॥२२९॥
जगत्सु वसुदाकीर्तिर्या मया चिरमर्जिता।
सा चेन्म्लानिं गता तन्मे किं धिया जीवितेन वा ॥२३०॥
इति सञ्चिन्त्य शक्राय तमुच्चैःश्रवसं ददौ।
वार्यमाणोऽपि शुक्रेण नमुचिः स महायशः ॥२३१॥
दत्ताश्वमथ विश्वास्य तं गाङ्गेन जघान सः।
शस्त्राद्यवध्यं फेनेन वञ्चयन्नस्तनं वृत्रहा ॥२३२॥
अहो दुरन्ता संसारे भोगतृष्णा यया हताः।
अनौचित्यादकीर्तेश्च देवा अपि न बिभ्यति ॥२३३॥
तच्छ्रुत्वा तस्य नमुचेरनुमाता तपोबलात्।
चकार दुःखसन्तप्ता सङ्कल्पं शोकशान्तये ॥२३४॥
स एव मे पुनर्गर्भे सम्भूयान्नमुचिर्बली।
भूयाच्च सर्वदेवानामजेयः संयुगेष्विति ॥२३५॥
ततः स तस्याः सम्भूय गर्भे जातोऽसुरः पुनः।
सर्वरत्नमयो नाम्ना प्रबलो बलयोगतः ॥२३६॥
सोऽपि तप्ततपाः प्रीणन् प्राणैरप्यर्थिनः कृती।
शतकृत्वो जिगायेन्द्रं प्रबलो दानवेश्वरः ॥२३७॥
ततः सम्मन्त्र्य देवास्तमुपेत्येदं ययाचिरे।
देहं पुरुषमेधार्थमस्मभ्यं देहि सर्वथा ॥२३८॥
तच्छ्रुत्वा स रिपुभ्योऽपि तेभ्यो देहमदान्निजम्।
प्राणानुदारा विसृजन्त्यर्थिनो न पराङ्मुखान् ॥२३९॥
ततः स खण्डशो देवैः कृतः प्रबलदानवः।
मनुष्यलोके जातोऽथ प्रभाववपुषा पुनः ॥२४०॥
तदेयमास्ते नमुचिस्ततोऽभूत् प्रबलश्च सः।
शैष मस्तत्पुन न्ददुर्जयोऽरिभिः ॥२४१॥
गमनम्। वेदेषु नरमेधविचारो नास्तीति
श्रौतप'

देव गुरु के ऐसा कहने पर इन्द्र स्वयं देवताओं के साथ नमुचि से घोड़ा मांगने गया ॥२२८॥
मुझसे मांगनेवाला याचक कभी विमुख नहीं होता उसमें भी देवराज इन्द्र। तो मैं
नमुचि होकर इसे घोड़ा क्यों न दूँ ? मैंने तीनों लोकों में चिरकाल से जो कीर्ति अर्जित की है, यदि
वही मलिन हो गई, तो मेरे वैभव और जीवन से क्या लाभ ? ॥२२९-२३०॥
ऐसा सोचकर उदारहृदय नमुचि ने गुरु शुक्राचार्य के रोकने पर भी इन्द्र को घोड़ा
दे दिया ॥२३१॥
उसके घोड़ा देने पर भी उसे निःशस्त्र बनाकर इन्द्र ने वज्र पर रखे हुए गंगा के फेन से
उसे मार डाला क्योंकि वह अन्य अस्त्र-शस्त्रों से नहीं मारा जा सकता था ॥२३२॥
आश्चर्य है कि संसार में भोग की तृष्णा का अन्त नहीं है। इस तृष्णा के वशीभूत होकर
देवता भी अनुचित कार्य करने से तथा अपयश से नहीं डरते ॥२३३॥
इस वृत्तान्त को जानकर दुःखित नमुचि की माता दनु ने अपने तपोबल से शोक की शान्ति
के लिए यह संकल्प किया कि 'बलवान् नमुचि फिर मेरे गर्भ से उत्पन्न हो और वह युद्ध में देवताओं
से अजेय रहे' ॥२३४-२३५॥
तदनन्तर, वह बलवान् नमुचि अत्यन्त बलशाली होने के कारण प्रबल नाम से पुनः दनु के
गर्भ से उत्पन्न हुआ। उस प्रबल नामक दानवराज ने इन्द्र को सौ बार पराजित किया और वह
याचकों के लिए जीवन तक देने के लिए सदा सन्नद्ध रहता था ॥२३६-२३७॥
उससे बार-बार पराजित होकर देवताओं ने मन्त्रणा करके उससे कहा—'हमलोग
नरमेध यज्ञ करना चाहते हैं इसके लिए हमें अपना शरीर-दान करो ॥२३८॥
यह सुनकर उस प्रबल दानी दानव ने माँगने पर उन शत्रुओं को भी अपना शरीर दान
में दे दिया। उदार व्यक्ति अपने प्राणों का दान कर देते हैं किन्तु याचक को विमुख नहीं होने
देते ॥२३९॥
तदनन्तर देवताओं ने उस दानव के टुकड़े-टुकड़े कर डाला। वही प्रबल दानव आज प्रभास
के रूप में मनुष्य-लोक में उत्पन्न हुआ है ॥२४०॥
यह पहले नमुचि तदनन्तर प्रबल रूप में जन्मा। वही आज प्रभास के रूप में है और पूर्व पुण्य
के कारण शत्रुओं से अजेय है ॥२४१॥