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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

सप्तम लम्बक १८१

Page 218Permalink

सप्तम लम्बक १८१
मार्ग में जाते हुए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त से यह कथा सुनाई और कहा--'इस प्रकार
महान् व्यक्तियों को महान् कष्ट प्राप्त होते हैं। दूसरे साधारण व्यक्तियों का तो कितने ही बार
उत्थान और पतन होते हैं ॥२२०-२२१॥
तुम तो रानी रत्नप्रभा की विद्या-शक्ति से रक्षित हो इसलिए राजकुमारी कर्पूरिका को
बिना कष्ट ही प्राप्त करोगे ॥२२२॥
इस प्रकार, नरवाहनदत्त ने सुमुख गोमुख के मुंह से कथा सुनकर रास्ते की थकावट का
अनुभव नहीं किया ॥२२३॥
जाते हुए उसने सायंकाल एक सुन्दर सरोवर को देखा जो सुन्दर शब्द करते हुए हंसों
के स्वर से मुखरित हो रहा था जिसका जल अमृत के समान मधुर और तृप्तिकारक था और
आम अनार एवं कटहल के वृक्षों से उसके किनारे रमणीय हो रहे थे ॥२२४॥
उस सरोवर में स्नान करके भक्ति-भाव से शिव की पूजा करके सुगन्धित मीठे और
पुष्टिकारक फलों से आहार करके उस नरवाहनदत्त ने कोमल पत्तों की शय्या पर अपने मित्र
के साथ उसके किनारे पर सोकर उस रात को बिताया ॥२२५॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का
अष्टम तरंग समाप्त
नवम तरंग
नरवाहनदत्त का साहस
तब प्रातःकाल उस तालाब के किनारे से उठकर आगे के लिए प्रस्थान करते हुए
नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख से कहा--॥१॥
"मित्र ! आज रात को स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारण किये हुई, कोई दिव्यरूपा एक
कुमारी ने मुझसे कहा--॥२॥
'बेटा ! निश्चिन्त रहो। यहाँ से शीघ्र ही तुम समुद्र-तट के जंगलों में स्थित
आश्चर्यमय बड़े नगर को जाओगे ॥३॥
वहाँ विश्राम करके बिना कष्ट के ही कर्पूरसम्भव द्वीप (टापू) में पहुँचोगे और वहाँ
कर्पूरिका नाम की राजकुमारी को प्राप्त करोगे' ॥४॥
ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गई और मैं भी उसी समय जाग उठा" ॥५॥
ऐसा कहते हुए युवराज से प्रसन्न गोमुख ने कहा-'महाराज ! तुम्हारे ऊपर देवताओं
की कृपा है। अतः अवश्य ही तुम्हारा मनोरथ शीघ्र सफल होगा' ॥६॥