कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
दशम लम्बक १७५
दशम लम्बक १७५
बलवाले को दान देने से क्या लाभ ? तृप्त को भोजन देने से क्या फल ? शीत से काँपते
हुए को चन्दन से क्या लाभ और शीतकाल में वर्षा की क्या आवश्यकता ? ॥३५॥
अतः हम इन दुखियों को उद्धार करो। हमारी रोग-रूपी आपत्ति को दूर करो। उन
दुखियों से इस प्रकार कही गई उन स्त्रियां ने आपस में कहा-'ये दुःखी ठीक और उचित कह
रहे हैं। इसलिए हम लोगों को अपना सर्वस्व त्याग कर भी इनकी चिकित्सा करनी
चाहिए' ॥३६-३७॥
आपस में इस प्रकार विचार कर और सरस्वती देवी की पूजा करके वे स्त्रियां उन रोगियों
को अलग-अलग अपने-अपने घरों में ले गईं ॥३८॥
और, सर्वसमर्थ अपने-अपने पतियों को प्रेरित करके उनकी चिकित्सा कराती हुई सदा
उनके पास बैठी रहती थीं ॥३९॥
दिन-रात सहवास के कारण उत्पन्न काम-वासना से वे ऐसी हो गईं कि सारे संसार को
तन्मय देखने लगीं ॥४०॥
कहाँ ये दरिद्र रोगी और कहाँ मन्त्री सेनापति आदि उनके पति काम-वासना से अन्धा किये
हुए उनके मन ने यह विचार नहीं किया ॥४१॥
तदनन्तर, रोगियों के लिए असम्भव सम्भोग से चिह्नित उन स्त्रियां के शरीरों मे नखक्षत
और दन्तक्षत आदि उनके निजी पतियों ने देखे ॥४२॥
तब वे राजा मन्त्री पुरोहित वैद्य आदि परस्पर मिलकर बड़ी सावधानी से सम्बद्ध के
साथ चर्चा करने लगे ॥४३॥
तब राजा ने दूसरो से कहा- अभी आपलोग ठहरिए। आज मैं युक्ति से अपनी
स्त्री से पूछता हूँ ॥४४॥
ऐसा कहकर उन सब को विदा करके अपने वास-भवन में जाकर स्नेह और भय दिखा-
कर राजा ने रानी से पूछा-॥४५॥
'यह तुम्हारे ओठ को किसने काटा। तुम्हारे स्तनों को नखों से किसने क्षत किया। यदि
सच कहती है तो ठीक है अन्यथा तेरा कल्याण नहीं' ॥४६॥
राजा से इस प्रकार कही गई रानी ने झूठी बात बनाकर कहा-'बात तो कहने योग्य
नहीं है फिर भी में वन्द्य हूँ कि तुम्हें आश्चर्य की बात कहती हूँ सुनो ॥४७॥
यह सामने दीखती हुई चित्र की दीवार से रात को हाथ में खड्ग लिए हुए एक पुरुष निकल
कर मेरा उपभोग करता है और प्रातः काल उसी दीवार में विलीन हो जाता है। मेरे जिस अंग
को कभी सूर्य और चन्द्र ने भी नही देखा वहाँ वह पुरुष तुम्हारे रहते हुए भी, मेरे साथ ऐसा
कार्य करता है ॥४८-४९॥
एतत्तस्या सशुद्धाया इव श्रुत्वा वचो नृप।
प्रत्येति स्म तथा मूर्खो मायामाशङ्क्य वैष्णवीम् ॥५०॥
शशंस मध्याद्विम्वस्य तेभ्यस्तेऽपि तथा जडा।
मत्वान्युतोपभुक्तास्ता भार्यास्तूष्णीं किलाभवन् ॥५१॥
हृदयस्थैर्यकरणचतुरा कुस्त्रिय शठा।
वञ्चयन्ते जडमतीनाह मूर्खस्तु तादृश ॥५२॥
इति यक्षो ब्रुवन्भार्या स विलक्षीचकार ताम्।
तच्च प्रव्राजकोऽप्यश्रोत् सर्वं तरुतले स्थित ॥५३॥
तत कृताञ्जलिर्भूत्वा स स प्रव्राड् व्यजिज्ञपत्।
भगवन्नाश्रमप्राप्तस्तवाहं शरणागत ॥५४॥
तत्क्षमस्वापराध म त्वद्वचो यन्मया श्रुतम्।
इत्युक्त सत्यवचनात्तस्य यक्षस्तुतोष स ॥५५॥
सवस्थानगतास्योऽङ्क यक्षस्तुष्टस्तवास्मि च।
गृहाण वरमित्यूचे प्रव्राड् यक्षण तन स ॥५६॥
मन्युमस्यां स्वभार्यायां मा कृथा एप एव मे।
वरोऽस्त्विति तमाह स्म स प्रव्राडपि गुह्यकम् ॥५७॥
तत स यक्षोऽब्रवीत तुष्टोऽस्मि सुतरां तव।
तदय से वरो दत्तो मयान्य प्राप्स्यसीमिति ॥५८॥
तत प्रव्राजकोऽब्रवीत्सत्यं मेऽपरो वर।
अद्यप्रभृति पुत्र मां जानीव दम्पती युवाम् ॥५९॥
श्रुत्वतत् स सभायोंऽपि प्रत्यक्षीभूय तत्क्षणम्।
यक्षस्तमब्रवीद् बाढ पुत्र पुत्रस्त्वमावयो ॥६०॥
अस्मत्प्रसादान्न च ते भविष्यति विपत् क्वचित्।
विवादे कलह द्यूत विजयी च भविष्यसि ॥६१॥
इत्युक्त्वान्तर्हित यक्ष तं प्रणम्यातिवाह्य च।
रात्रिमत्राययो प्रव्राट् स त पाटलिपुत्रकम् ॥६२॥
तत्र द्रास्थ्यमुखनाम्नस्तस्य सिहाक्षमभूपत।
पश्मीरागतमात्मानमाख्याति स्म स वादिनम् ॥६३॥
मनुशाखप्रवेदाश्च तनास्थान महीभुजा।
प्रविद्यात्र स्थिताम् वादायादिक्षप स पण्डितान् ॥६४॥