कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक ९५१
अष्टम लम्बक ९५१
'आपने ये पार्थिव भोग (अनल्प) तो भोग किये। अब अन्य दिव्य भोगों के भोगने
का समय आ गया है। अतः उसके लिए उद्योग प्रारम्भ कीजिए ॥६॥
दूतों को भेजकर अपने सम्बन्धी बन्धुओं को बुलवाइए। तब विद्याधरों के राजा सुमेरु
से मिलिये ॥७॥
तदनन्तर श्रुतशर्मा को जीतने और आकाशचारियों का साम्राज्य प्राप्त करेंगे। सुमेरु
नामक विद्याधर राजा हमारी सहायता के लिए सम्बन्धी की भावना से तैयार बैठा है। 'सूर्यप्रभ की
रक्षा करना और उसे अपनी कन्या प्रदान करना' शिवजी ने इस प्रकार का आदेश उसे पहले से
ही दे रखा है" ॥८-९॥
मयासुर के ऐसा कहने पर चन्द्रप्रभ ने सब बन्धु-राजाओं के पास आकाशचारी प्रहस्त
प्रभास आदि दूतों को उन्हें बुलाने के लिए भेज दिया ॥१०॥
तदनन्तर मय दानव की आज्ञा से सूर्यप्रभ ने जिन पत्नियों और मन्त्रियों को इन्द्रजाल आदि
विद्याएँ नहीं सिखाई थीं उन सबको अपनी विद्याएँ सिखा दीं ॥११॥
सूर्यप्रभ के दरबार में नारद मुनि का आगमन
इतने में ही जब सभा में यह चर्चा चल रही थी तभी अपने तपःप्रभाव से दिशाओं
को प्रकाशित करते हुए नारदमुनि आकाश से उतरे ॥१२॥
अर्घ्य देकर आसन पर विराजमान नारदमुनि ने राजा चन्द्रप्रभ से कहा—'राजन्, मुझे
इन्द्र ने भेजा है और यह सन्देश दिया है कि मुझे ज्ञात हुआ है कि आप लोगों ने शिवजी की आज्ञा
से और मय दानव की सहायता से अज्ञानवश मानवशरीरधारी सूर्यप्रभ को समस्त विद्याधरों का
चक्रवर्ती बनाने का प्रयत्न प्रारम्भ किया है ॥१३-१५॥
यह उचित नहीं है। यह पद मैंने श्रुतशर्मा को दिया है। वह विद्याधर कुल-रूपी क्षीर
सागर का चन्द्रमा है और कुल-परम्परा से उसे यह पद प्राप्त है ॥१६॥
हमारे विरोधी (शत्रु) के रूप में यदि तुम धर्म-विरुद्ध कार्य करोगे तो वह अवश्य ही
तुम्हारे विनाश के लिए होगा ॥१७॥
पहली बार भी यज्ञ-याग करते हुए मैंने तुमसे कहा था कि पहले अश्वमेध यज्ञ करो ऐसा
मेरे कहने पर भी तुमने वह नहीं किया ॥१८॥
सहेवाननपद्मस्य रुद्रप्रत्याशयानया।
यथाचरथ दर्पेण भवतां न शिवाय तत् ॥१९॥
इत्युक्ते सत्रसन्निवेशे नारदेन विहस्य तम्।
मयोऽब्रवीन् न साधूक्तं सुरेन्द्रेण महामुने ॥२०॥
सूर्यप्रभस्य मर्त्यस्य यदुक्ति तदपार्थकम्।
वह्वामोवरसङ्ग्रामे न ज्ञातं तेन तस्य किम् ॥२१॥
मर्त्या एव हि सत्त्वाढ्याः सर्वसिद्धयर्थकारिणः।
ऐन्द्रं न साधितं पूर्वं पदं किं नहुषादिभिः ॥२२॥
यच्चाह दत्तमस्माभिः साम्राज्यं श्रुतशर्मणे।
क्रमागतं च तत् तस्येतेद्वप्यसमञ्जसम् ॥२३॥
दाता महेश्वरो यत्र प्रामाण्यं तत्र कस्य किम्।
ज्येष्ठागतं हिरण्याक्षस्येन्द्रत्वं च कथं कृतम् ॥२४॥
यच्चापरं प्रातिपक्ष्यमधर्मं चाह तन्मृषा।
स एव हि हठात् स्वार्थं प्रातिपक्ष्यं करोति नः ॥२५॥
कश्चाधर्मो जिगीषामो वयं हि परिपन्थिनम्।
न हरामो मुनेर्भार्यां१ ब्रह्महत्यां२ न कुर्महे ॥२६॥
यच्चाश्वमेधाकरणं वेदावज्ञां च जल्पति।
तदसद्भूतयज्ञे हि विहितेऽन्यैः किमध्वरैः ॥२७॥
अचिते देवदेवे च सम्भौ देवो न कोऽचितः।
यच्चाहंनैव दास्या न पिबेति तदप्यसत् ॥२८॥
किं सत्र दवनिर्वह्नेरन्यैर्यत्रोद्यतो हरः।
रवावभ्युदितऽन्यानि किं तेजांसि चकासति ॥२९॥
तदेतद्देवराजाय सर्वं वाच्यं त्वया मुने।
वयं च प्रस्तुतं कुर्मः स यद्वेत्ति करोतु तत् ॥३०॥
एवं मयासुरेणोक्तो नारदषिस्तथेति तम्।
प्रतिसन्देशमादाय ययौ सुरपतिं प्रति ॥३१॥
गत तस्मिन् मुनौ सोऽत्र तं चन्द्रप्रभमूपतिम्।
शत्रुसन्देशसाशङ्कमुखाभं मयासुरः ॥३२॥
१ अत्र गौतमधर्म्मदारस्य जारत्वमिन्द्रस्य व्यज्यते।
२ त्वाष्ट्रस्य वत्रासुरस्य हननं स्मर्य्यते।
तुम दूसरे देवताओं की परवाह न करके केवल एक रुद्र की आज्ञा से जो कुछ घमंड के
साथ कर रहे हो वह तुम्हारे हित के लिए न होगा' ॥१९॥
नारदजी के ऐसा कहने पर दानवराज मय हँसकर बोला—हे महामुनि देवेन्द्र ने जो कहा है
वह उचित नहीं है। वह जो कहता है कि सूर्यप्रभ मनुष्य है यह मिथ्या-कथन है। इस बात को
दामोदर-संग्राम में इन्द्र ने नहीं देख लिया था कि वह अलौकिक मानव है ? मनुष्य सत्त्ववान् प्राणी है,
अतः वह सभी सिद्धियों का अधिकारी है। क्या राजा नहुष आदि ने इन्द्र-पद की सिद्धि नहीं
प्राप्त की थी ? और भी इन्द्र जो यह कहता है कि श्रुतशर्मा को हमने विद्याधर-चक्रवर्ती
का पद प्रदान किया है तथा वह पद उसके कुलक्रम से चला आ रहा है, यह भी विरुद्ध बात है।
महेश्वर शिव जिसके दाता हैं उसमें किसी प्रकार की प्रामाणिकता की क्या आवश्यकता है ?
दूसरे, बड़ा भाई होने के कारण हिरण्याक्ष को इन्द्र-पद मिलना चाहिए था उस पर उसने कैसे
अपना अधिकार कर लिया ? ॥२०-२४॥
और भी इन्द्र ने जो यह सन्देश दिया कि इस प्रकार हमारी तुम्हारे साथ शत्रुता ठन जायगी
यह भी ठीक नहीं क्योंकि इन्द्र केवल अपने हठ के कारण हमसे शत्रुता रखता है। फिर, इसमे अधर्म
की भी कौन-सी बात है। हम तो शत्रु पर विजय प्राप्त करके क्षात्र धर्म का पालन ही कर रहे हैं,
न कि उसके समान मुनि-पत्नी¹ का अपहरण कर रहे हैं और न उसके समान ब्रह्महत्या² ही कर
रहे हैं ॥२५ २६॥
और, इन्द्र जो कहता है कि अश्वमेध यज्ञ की आज्ञा की अवहेलना करके हमने देवताओ
का अपमान किया है यह भी उसका प्रलाप-मात्र है क्योंकि रुद्र-यज्ञ कर लेने पर फिर अन्य यज्ञों का
क्या महत्त्व रह जाता है ॥२७॥
देवाधिदेव महादेव की अर्चना कर लेने पर किस देवता की अर्चना नही हो जाती ? वह
जो कहता है कि वज्रप्रभ की एकमात्र आस्था शिव पर ही है और वह उसके हित के लिए नहीं है,
यह भी अनुचित है ॥२८॥
जहाँ स्वयं शिवजी उद्यत हैं, वहाँ अन्य देवताओं की बात ही क्या ? सूर्य के उदय होने पर
अन्य तेज-समूह क्या फीके नहीं पड़ जाते ? ॥२९॥
इसलिए हे मुनिवर, तुम जाकर यह सब देवराज इन्द्र से कहो। हम अपना प्रस्तुत कार्य
करते हैं और वह भी जो चाहे, करे' ॥३०॥
मयासुर द्वारा इस प्रकार कहे गये देवर्षि नारद प्रतिसन्देश लेकर देवराज इन्द्र के समीप
गये ॥३१॥
नारद मुनि के चले जाने पर इन्द्र के सन्देश से शंकित राजा वज्रप्रभ से मयासुर ने
कहा—॥३२॥
१ यह इन्द्र का गौतम-पत्नी अहल्या के साथ समागम-रूपी अनाचार पर
व्यंग्य है।—अनु
२ यह ब्राह्मण वृत्रासुर को मारने पर व्यंग्य है।—अनु