कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
अष्टम लम्बक ४०९
अष्टम लम्बक ४०९
श्मशान-भूमि में सोने के विमान में बैठी हुई और सुन्दरी कन्याओं से घिरी हुई एक
दिव्य कन्या प्रकट हुई ॥१६४॥
वह कन्या मधुर वाणी द्वारा उस संन्यासी से बोली—'हे संन्यासी ! मैं विद्युन्माला नाम की
यक्षिणी हूँ और ये भी दूसरी यक्षिणियाँ हैं ॥१६५॥
सो तुम मेरे परिवार में इच्छानुसार एक यक्षिणी को ले लो। तुम्हारी मन्त्र-साधना से
इतनी ही सिद्धि हुई है ॥१६६॥
तुमने मेरे मन्त्र की विधि पूर्ण रूप से नहीं जानी। इसलिए, मैं तुम्हें सिद्ध नहीं हो
सकी। अब तुम दूसरा कष्ट व्यर्थ न उठाओ' ॥१६७॥
उस यक्षिणी विद्युन्माला द्वारा इस प्रकार कहे गये संन्यासी ने उसकी बात मान ली और
उसके परिवार से एक यक्षिणी ले ली ॥१६८॥
तदनन्तर, विद्युन्माला अदृश्य हो गई। तब आदित्यशर्मा ने उस यक्षिणी से जो उस
संन्यासी को सिद्ध हुई थी पूछा—॥१६९॥
'क्या विद्युन्माला से भी बढ़कर और कोई उत्तम यक्षिणी है ? तब वह बोली—'सुन्दर !
उत्तम यक्षिणियों में विद्युन्माला चन्द्रलेखा और सुलोचना तीन हैं। इन तीनों में भी सुलोचना
अत्युत्तम है ॥१७०-१७१॥
इस प्रकार कहकर वह यक्षिणी यथासमय आने के लिए चली गई और वह संन्यासी
आदित्यशर्मा के साथ उसके घर गया ॥१७२॥
तदनन्तर, प्रतिदिन नियत समय पर आनेवाली वह यक्षिणी प्रसन्न होकर उस परिव्राजक
को अभीष्ट भोगों का प्रदान करती थी ॥१७३॥
एक बार आदित्यशर्मा ने परिव्राजक के द्वारा उस यक्षिणी से पूछा कि 'सुलोचना को सिद्ध
करने की मन्त्रविधि को कौन जानता है' ॥१७४॥
उस यक्षिणी ने आदित्यशर्मा के सामने ही कहा—'दक्षिण दिशा की भूमि में गुल्मवन नाम
का स्थान है। वहाँ पर वेणा नदी के किनारे स्थान बनाकर विद्युन्मुख नाम का मटन्थ (बौद्ध
संन्यासी) रहता है। वह उसकी विधि को विस्तारपूर्वक जानता है' ॥१७५-१७६॥
यक्षिणी के मुँह से यह सुनकर उत्सुक आदित्यशर्मा प्रव्राजक के साथ वहाँ गया। वहाँ जाकर,
और मटन्थ को ढूँढ़कर वह उसके समीप ही रहने लगा। तत्पश्चात् उसने तीन वर्षों तक भक्ति-
पूर्वक उसकी सेवा की ॥१७७-१७८॥
५२
उपाचरच्च यक्षिण्या परिव्राट्सिद्धया तया।
यथोपयोगोपहृतैरुपचारैरमानुषैः ॥१७९॥
ततस्तुष्टो भदन्तोऽसौ तस्माआदित्यशर्मणे।
ददौ सुलोचनामन्त्रमभित सविधानकम् ॥१८०॥
ततश्चादित्यशर्मा स मन्त्रं प्राप्य समाप्य च।
होमं चकार सम्पूर्णं गत्वैकान्ते यथाविधि ॥१८१॥
ततस्तस्य विमानस्था यक्षिणी सा सुलोचना।
प्रादुर्वभूव रूपेण जगदाश्चर्यदायिना ॥१८२॥
जगाद चैतमेहोहि सिद्धाऽहं तव किं पुनः।
षण्मासं कन्यकाभावो नापनेयो मम त्वया ॥१८३॥
यदि मत्तो महावीर्यमृद्धिपात्रं सुलक्षणम्।
सर्वज्ञकल्पमजितं पुत्रं सम्प्राप्तुमिच्छसि ॥१८४॥
इत्युक्त्वा सा तथेत्येनमुक्तवन्तं च यक्षिणी।
आदायादित्यशर्माणं विमानेनालकां ययौ ॥१८५॥
स च तत्र समीपस्थां तांन्नपश्यन्नास्त सर्वदा।
आदित्यशर्मा षण्मासानसिधाराव्रतं चरन् ॥१८६॥
ततस्तुष्टो धनाध्यक्षो दिव्येन विधिना स्वयम्।
आदित्यशर्मणे तस्मै व्यतरत्तां सुलोचनाम् ॥१८७॥
तस्यां तस्य द्विजस्यात्र जातोऽयमहमात्मजः।
पित्रा च मे कृतं नाम गुणशर्मेति सद्गुणात् ॥१८८॥
ततस्तत्रैव यक्षाधिपतेर्मणिधराभिधात्।
क्रमाद्वेदाश्च विद्याश्च कलाश्चाधिगता मया ॥१८९॥
अथैकदा किमप्यागाच्छक्रोऽत्र धनवान्तिकम्।
उत्तस्थुश्च तं दृष्ट्वा ये तत्रासत केचन ॥१९०॥
मत्पितादित्यशर्मा तु तत्कालं विधियोगतः।
अन्यत्र गतचित्तत्वान्नोदतिष्ठत्ससम्भ्रमः ॥१९१॥
ततस्तमशपत्क्रुद्धः स शक्रो द्विजड प्रज।
स्वमेव मर्त्यलोकं त गेहुं योग्यो भवानिति ॥१९२॥
प्रणिपत्यानुनीतोऽथ स सुलोचनया तया।
शक्रोऽब्रवीत्तर्हि मा गान्मर्त्यलोकमयं स्वयम् ॥१९३॥