कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
दशम लम्बक ८१५
दशम लम्बक ८१५
जिनमें एक बहू पापिन और व्यभिचारिणी थी और दूसरी यह पतिव्रता है। खंडित
व्रत का भी इतना प्रभाव है कि मैं पूर्व जन्म का स्मरण भी करता हूँ। यदि मैं अपना व्रत
खंडित न करता तो यहाँ मेरा जन्म भी न होता ॥६१-६२॥
इस प्रकार, अपना समाचार कहकर उस पुरुष ने उन दोनों भाइयों को दिव्य भोजन
और वस्त्रादि से सम्मानित किया ॥६३॥
तब उस पुरुष की सती पत्नी ने यह समाचार को जानकर, भूमि पर घुटने टेककर
और चन्द्रमा की ओर देखकर यह कहा—॥६४॥
'हे लोकपालो यदि मैं सचमुच पतिव्रता हूँ तो मेरा पति इस जल-वास से मुक्त होकर
स्वर्ग को जाय' ॥६५॥
उसके इस प्रकार कहते ही आकाश से विमान उतरा और उस पर चढ़े हुए वे दम्पती
(पति-पत्नी) स्वर्ग को चले गये ॥६६॥
सच है सच्ची पतिव्रताओं के लिए तीनों लोकों में असाध्य क्या है ? वे दोनों ब्राह्मण-
पुत्र यह दृश्य देखकर अत्यन्त आश्चर्य-चकित हो गये ॥६७॥
शेष रात्रि को व्यतीत कर प्रातःकाल ही वे दोनों ब्राह्मण-पुत्र वहाँ से आगे चल
पड़े ॥६८॥
और सायंकाल एक निर्जन वन में जल की इच्छा करते हुए जब वे एक वृक्ष के नीचे
खड़े हुए, तब उन्होंने उस वृक्ष से यह वाणी सुनी—॥६९॥
'हे ब्राह्मणो ठहरो मैं अभी आप दोनों का स्नान और भोजन आदि से आतिथ्य करता हूँ
क्योंकि तुम दोनों मेरे घर पर आये हो। ॥७०॥
ऐसा कहकर वह वाणी बन्द हो गई। तदनन्तर, वहीं एक सुन्दर बावली बन गई और
उसके किनारे विविध प्रकार की भोजन-पान-सामग्री उपस्थित हो गई। 'यह क्या है' इस प्रकार
आश्चर्य-चकित उन दोनों ब्राह्मण-पुत्रों ने वापी में स्नान करके भोजन किया ॥७१-७२॥
तदनंतर, सन्ध्या करके जब वे वृक्ष के नीचे बैठे तभी एक सुन्दर पुरुष उस वृक्ष से
उतरा ॥७३॥
उन ब्राह्मणों से प्रणाम किया गया वह पुरुष उनका स्वागत करके स्वयं जब बैठ गया
तब उससे उन ब्राह्मण-पुत्रों ने पूछा कि 'तुम कौन हो' ? ॥७४॥
तब वह पुरुष बोला कि मैं पहले जन्म में एक दरिद्र ब्राह्मण था। दैवयोग से कुछ धर्मात्मा
(जैन साधुओं) से मेरी संगति हो गई ॥७५॥
कुर्वंस्तदुपविष्टं च जातु व्रतमुपोषणम्।
शठेन साय मेनापि भोजिष्ठोऽस्मि बलात्पुनः ॥७६॥
तेनाहं खण्डितात्तस्माद्व्रताज्जातोऽस्मि गुह्यकः।
पूर्णं यद्यकरिष्यं तदभविष्यं सुरो दिवि ॥७७॥
एवं मयोक्तः स्वोदन्तो युवां कथयतं तु मे।
कुतो युवां किमेतां च प्रविष्टौ स्थो महत्स्थलीम् ॥७८॥
तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीत्तस्मै स्ववृत्तान्तं यशोधरः।
ततस्तो ब्राह्मणो यक्षः पुनरेवमभाषत ॥७९॥
यद्येवं सर्वहृद्विद्याः स्वप्रभावादहामि वाम्।
कृतविद्यौ गृहं यात विदेशभ्रमणेन किम् ॥८०॥
इत्युक्त्वा स ददौ ताभ्यां विद्यास्तो च तदैव ताः।
तत्प्रभावाज्जगृहतुः सोऽथ यक्षो जगाद तौ ॥८१॥
एकाभिदानीं याचेऽहं भवद्भ्यां गुरुदक्षिणाम्।
युवाभ्यां मत्कृते कार्यं व्रतमद्यत्वपोषणम् ॥८२॥
सत्याभिभाषणं ब्रह्मचर्यं देवप्रदक्षिणम्।
भोजनं भिक्षुवेलायां मनसः संयमः क्षमा ॥८३॥
एकरात्रं विधायैतदर्पणीयं फलं मयि।
पूर्णव्रतफलं येन दिव्यत्वं प्राप्नुयामहेम् ॥८४॥
इत्युक्तवान्विनाभ्यां ताभ्यां यक्षस्तथेति सः।
विश्राम्य प्रतिपद्यार्थस्तत्रैवान्तर्दधे तरो ॥८५॥
तौ चाप्रयाससिद्धाथौ प्रहृष्टौ भ्रातरावुभौ।
रात्रिं नीत्वा परावृत्य स्वमेवाजग्मतुर्गृहम् ॥८६॥
तत्राख्याय स्ववृत्तान्तमानन्द्य पितरौ निजौ।
उपोषणव्रतं तत्तौ यक्षपुण्याय चक्रतुः ॥८७॥
अथैत्य स गुह्यक्षो विमानस्थो जगाद तौ।
युष्मत्प्रसादाद्युक्त्वं प्राप्तोऽस्म्युत्तीर्य यक्षताम् ॥८८॥
तदात्मार्थमिदं कार्यं युवाभ्यामपि तद्व्रतम्।
भविता येन दवत्वं देहान्ते युवयोरिति ॥८९॥
अक्षीणांशाविदानीं च धरामत्र सजिष्यथः।
इत्युक्त्वा स विमानेन कामचारी ययौ दिवम् ॥९०॥
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एकबार मैं उनके द्वारा उपदिष्ट उपापद्म (व्रत) करने लगा। उस व्रत के मध्य में ही
किसी एक दुष्ट ने मुझे सायंकाल में भोजन करा दिया। इस प्रकार व्रत के खण्डित हो जाने पर मैं
गुह्यक (यक्ष) योनि में उत्पन्न हो गया। यदि व्रत को पूरा कर लेता तो स्वर्ग में देवता
बन जाता ॥७६-७७॥
यह मैंने अपना समाचार तुम्हें सुनाया। अब तुम अपना परिचय मुझे दो कि तुम लोग इस
मरुभूमि में क्यों आ गये हो ? ॥७८॥
यह सुनकर यशोधर ने उसे अपना वृत्तान्त सुनाया। तब वह यक्ष उन ब्राह्मण-पुत्रों से
फिर बोला—॥७९॥
'यदि ऐसी बात है तो मैं तुम दोनों को अपने प्रभाव से विद्याएँ प्रदान करता हूँ। तुम लोग
विद्वान् होकर घर जाओ। व्यर्थ विदेश भ्रमण से क्या लाभ है ?' ॥८०॥
यह कहकर यक्ष ने उन्हें विद्याएँ प्रदान कीं और उसी यक्ष की कृपा से उन्होंने भी विद्याएँ
प्राप्त कीं। तदनन्तर, यक्ष उन दोनों से बोला—'अब मैं तुम दोनों से गुरु-दक्षिणा माँगता हूँ। इस
गुरु-दक्षिणा के रूप में तुम दोनों को मेरे लिए उपापद्म (व्रत) करना चाहिए। भूख वासना
ब्रह्मचर्य रहना देवता की प्रदक्षिणा करना नियूमा के समय (दिन रहते) भोजन करना मन का
संयम करना और क्षमा ये इस के आचरणीय नियम हैं। इस तरह व्रत करके इसका फल मुझे अर्पण
कर देना। जिससे कि मुझे पूरे व्रत का फल (देवत्व) मिल जाय ॥८१-८४॥
उन विनम्र दोनों बन्धुओं से इस प्रकार कहकर और उनसे व्रत के लिए स्वीकार-वचन
लेकर वह यक्ष उसी वृक्ष में अन्तर्हित हो गया ॥८५॥
बिना परिश्रम और प्रयत्न के अर्थ सिद्ध किए हुए उन दोनों ने रात बिताकर भोर अपने
घर वापस आकर तथा माता-पिता को यह सारा वृत्तान्त सुनाकर उन्हें शान्ति दान दिया। तब उन
दोनों ने अपने गुरु यक्ष के पुण्य के लिए उपापद्म नामक व्रत किया ॥८६-८७॥
तदनन्तर अप्सरायुक्त यक्ष विमान में बैठकर उनके पास आया और बोला—'मैं इस यक्ष
योनि से मुक्त होकर तुम लोगों की कृपा से देवत्व प्राप्त कर लिया है, सो आत्म कल्याण के
लिए तुम दोनों को भी यह व्रत करना चाहिए। इससे मृत्यु के पश्चात् तुम लोग भी देवता बनोगे
और इस जीवन में मेरे वरदान से अक्षय धनी बनोगे। इस प्रकार कहकर वह कामचारी स्वर्ग को
चला गया ॥८८-९१॥