कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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नवम तरंग
गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कथाएँ
दूसरे दिन रात में फिर पहले के ही समान मनोविनोद करते हुए गोमुख मन्त्री ने
नरवाहनदत्त के लिए कथा सुनाई ॥१॥
बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न बनिये की कथा
किसी नगर में बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न किसी धनी बनिये (सेठ) का लड़का था
जिसकी मां मर गई थी ॥२॥
दूसरी स्त्री (सौतेली मां) के वशीभूत और उसी के द्वारा प्रेरित पिता से बनवास के
लिए निर्वासित वह पुत्र अपनी पत्नी के साथ घर से निकल गया ॥३॥
अपने साथ आते हुए अपने भ्रान्ताचित छोटे भाई को लौटाकर वह दूसरे ही मार्ग से
गया ॥४॥
चलते चलते मार्ग में भोजन-रहित वह क्रमशः प्रचंड सूर्य की किरणों से संतप्त महान्
मरुस्थल में जा पहुँचा ॥५॥
उस मरुस्थल में सात दिनों तक थकी-मांदी और भूखी-प्यासी स्त्री को वह अपने मांस
और रक्त से जिलाता रहा। वह पापिनी भी उसे खाती-पीती रही। ॥६॥
आठवें दिन वह एक पहाड़ी जंगल में पहुँचा जो पहाड़ी नदी की तरंगों से मुखरित फल-
वाले सघन वृक्षों की छायावाला और हरी घासों के मैदानों से रमणीय था ॥७॥
वहां पर थकी-मांदी अपनी पत्नी को कन्द, मूल फल जल आदि से स्वस्थ करके वह
स्वयं तरंगों से सुशोभित पहाड़ी नदी में स्नान करने के लिए उतरा ॥८॥
उसने नदी की धार में बहते हुए अपना बचाव चाहते हुए कटे हुए हाथपैर वाले एक
पुरुष को देखकर, अनेक उपवासों से थके और दुर्बल होते हुए भी उस दयालु महापुरुष ने नदी
की धार में जाकर उसे निकाला ॥९ १ ॥
और, उस दयालु राजकुमार ने उस वृद्ध पुरुष को अपनी पीठ पर उठाकर सूखे स्थान पर
रखा और पूछा कि 'भाई, तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की' ॥१०॥
तब उस पुरुष ने कहा—'मेरे शत्रुओं ने मुझे कष्टपूर्वक मरने के लिए मेरे हाथ-पैर काट
कर मुझे नदी में फेंक दिया' ॥११॥
ऐसा कहते हुए उस पुरुष के घावों पर पट्टियां बांधकर और उसे भोजन आदि से सन्तुष्ट
करके उस महापुरुष ने स्नान आदि क्रिया समाप्त की ॥१२॥