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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

१०२ कथासरित्सागर

१०२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्या स विशस्य तं वैद्यं सूदान्नृपोऽब्रवीत्।
किं तस्य शृङ्गालस्यास्ति मांसशेषोऽत्र कश्चन ॥१५॥
शृङ्गे परे स्त इत्युक्ते सूदैर्वेद्योऽथ सोऽब्रवीत्।
साधु तद्घृतं हि स्यात्प्रसूतौ शृङ्गगर्भजम् ॥१६॥
इत्युक्त्वा कारयित्वैव तत्ततः शृङ्गमांसतः।
तस्यै गुणवरायै स चूर्णमिश्रं भिषग्ददौ ॥१७॥
ततस्तस्याश्च नवतिर्देभ्यो राज्ञो नवाधिका।
आसन्गर्भाः काले च सर्वाः सुषुविरे सुतान् ॥१८॥
अर्वागुपात्तगर्भा च सा सर्वोत्तमलक्षणम्।
प्रासूत स्म महादेवी पश्चाद् गुणवरा सुतम् ॥१९॥
शृङ्गमांसरसोत्पन्नं नाम्ना शृङ्गभुजं च तम्।
पिता वीरभुजश्चक्रे राजा कृतमहोत्सवः ॥२०॥
वर्धमानः सहान्यैस्तैर्भ्रातृभिर्वयसा परम्।
कनिष्ठः सोऽभवत्तेषां गुणैर्ज्येष्ठतमस्त्वभूत् ॥२१॥
क्रमात्स राजपुत्रश्च रूपे कामसमो बभौ।
धनुर्वेदेऽर्जुनसमो भीमसेनसमो बले ॥२२॥
तच्च सपुत्रां सुतरां दृष्ट्वा वीरभुजस्य ताम्।
प्रियां गुणवरां राज्ञो देव्योऽन्या मत्सरं ययुः ॥२३॥
अथ तास्वयशोलेखा नाम राज्ञी दुराशया।
सम्मन्त्र्य ताभिरन्याभिः सह कृत्वा च संविदम् ॥२४॥
समस्ताभिः सपत्नीभिस्तं राजानं गृहागतम्।
मुषाधृतमुखग्लानिं पृच्छन्तं कृच्छ्रतोऽब्रवीत् ॥२५॥
आर्यपुत्र कथं नाम सहसे गृहदूषणम्।
परस्य रक्षिताद्य न रक्षस्यात्मनः कथम् ॥२६॥
यः सुरक्षितनाभायमन्तःपुरपतिर्युवा।
तत्सक्ता हि त्वदीयेषा राज्ञी गुणवरा किल ॥२७॥
तदन्यस्य न कामोऽस्ति सौविदल्ल१निरीक्षिते।
अन्तःपुरेऽत्र पुंसो यद्दत्तासौ तेन सङ्गता ॥२८॥
१ सौविदल्लः कञ्चुकी। तल्लक्षणं यथा —
अन्तःपुरचरो वृद्धो विप्रो गुणगणान्वितः।
सर्वकार्यार्थकुशलः कञ्चुकीत्यभिधीयते॥

ऐसा सुनकर वैद्य को लज्जित और स्तब्ध देखकर राजा ने पाचक से कहा—'क्या उस
बकरे का कुछ भी मांस शेष है' ? ॥१५॥
'हाँ देव! दो सींग बचे हैं' पाचक के ऐसा कहने पर वैद्य बोला—'ठीक है, सींगों के
अन्दर का मांस तो बहुत उत्तम होगा उसे पकाओ। ऐसा कहकर और सींगों के मांस से रस
बनवाकर वैद्य ने चूर्ण मिलाकर रानी गुणवरा को दिया ॥१६—१७॥
उस ओषधि के सेवन से राजा की निन्यानब्बे रानियां एक साथ ही गर्भवती हुईं और
साथ ही उन्होंने पुत्रों का प्रसव किया ॥१८॥
सबसे अन्त में रस-पान करने के कारण रानी गुणवरा ने सम्पूर्ण शुभलक्षणों से युक्त पुत्र
को सबसे पीछे प्रसव किया ॥१९॥
यह बालक शृंग के मग मांसरस में उत्पन्न हुआ था इसलिए राजा ने इसका नाम शृंगभुज
रख दिया ॥२०॥
क्रमशः भाइयों के साथ बड़ा होता हुआ शृंगभुज रूप से अवस्था में छोटा होने पर भी
गुणों में उनसे बहुत बड़ा मालूम होता था ॥२१॥
क्रमशः वह राजकुमार शृंगभुज रूप में कामदेव के समान धनुर्वेद में अर्जुन के समान
और बल में भीमसेन के समान हुआ ॥२२॥
इस प्रकार, गुणवाले पुत्र के साथ उसकी माता गुणवरा को सन्तुष्ट देखकर राजा वीरभुज
की अन्य रानियाँ उससे डाह करने लगीं ॥२३॥
इनमें सबसे दुष्ट रानी अयशोलेखा ने इस स्थिति को देखकर सभी रानियों से मिलकर
एक सम्मति की और राजा के घर आने पर बुरे ही मुँह को मलिन बना लिया और राजा के
पूछने पर बड़ी ही कठिनाई से बोली—'आर्यपुत्र ! तुम घर के भीतर का कलंक कैसे सहन
करते हो ? दूसरों की बुराई की रक्षा करते हो और उस (बुराई) से अपनी रक्षा क्यों नहीं
करते हो ? ॥२४—२६॥
यह जो गुहा इस नाम का रतिपाल का प्रधान नौकर है उससे तुम्हारी रानी
गुणवरा आसक्त है ॥२७॥
नपुंसिका द्वारा गुहोक्त रतिपाल के अन्तःपुरस्थी इन्दिरा के साथ स्त्री की सम्भावना
रही है इसलिए यह रानी उसी गुहा से संभोग करती है ॥२८॥