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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक ९५

सप्तम लम्बक ९५
'मित्र ! स्त्री के वश मत हो। स्त्रियोंका हृदय अत्यन्त दुर्गम होता है। मेरे साथ जो बीती
है उसे कहता हूँ सुनो' ॥१४९॥
इसी वाराणसी नगरीमें युवती सुन्दरी चंचल और गुप्तयोगिनी सोमदा नामकी ब्राह्मणी
रहती थी॥१५०॥
दैव-योग से मेरे साथ उसका एकान्त समागम हो गया। उसी क्रम से मेरा उसका प्रेम
बढ़ा ॥१५१॥
एक बार ईर्ष्या से क्रोध करके मैंने उसे मारा। उस दुष्टा ने क्रोध को छिपाकर उस समय
उसे सहन कर लिया ॥१५२॥
दूसरे दिन उसने प्रेम-क्रीडा के बहाने मेरे गले में सूत बाँध दिया और उसी समय मैं
बधिया बैल बन गया ॥१५३॥
बैल बने हुए उसने मुझे बधिया ऊँटों का व्यापार करनेवाले एक व्यापारी के हाथ इच्छित
मूल्य लेकर बेच दिया ॥१५४॥
बोझ लदे हुए और तंग होते हुए मुझे देखकर बन्धमोचनिका नाम की योगिनी को दया
आ गई ॥१५५॥
उसने अपनी विद्या के प्रभाव से मुझे सोमदा द्वारा पशु बनवाया हुआ समझकर मेरे मालिक
की अनुपस्थिति में मेरे गले का डोरा खोल दिया ॥१५६॥
तब मैं मनुष्य हो गया। मेरा मालिक मुझे (बैल को) भागा हुआ जानकर चारों ओर
ढूँढ़ता हुआ घूमने लगा ॥१५७॥
मुझे बन्धमोचनिका के साथ घूमते हुए दैवयोग से उस सोमदा ने दूर से देख
लिया ॥१५८॥
क्रोध से जलती हुई सोमदा ने मोचनिका योगिनी से कहा कि तूने इस पापी को पशु-योनि
से क्यों मुक्त कर दिया ? तुझे धिक्कार है! इस कुकर्म का फल तुझे कल प्रातःकाल मारकर
चखाऊँगी ॥१५९ १६०॥
ऐसा कहकर सोमदा के चले जाने पर वह सिद्ध योगिनी बन्धमोचनिका मुझसे बोली—
यह सोमदा काली घोड़ी का रूप धारण करके मुझे मारने के लिए आयेगी और मैं उस समय
श्वेत घोड़ी के रूप में रहूँगी ॥१६१ १६२॥
हम दोनों का युद्ध प्रारम्भ होने पर तुम तलवार लिये हुए पीछे रहकर सावधानी से सोमदा
पर प्रहार करना ॥१६३॥
९

एवमेतां हनिष्यावस्तत्प्रातस्तस्य गृहे मम।
आगच्छेरित्युदित्वा सा गृहं मे स्वमदर्शयत् ॥१६४॥
तत्र तस्यां प्रविष्टायामहं निजगृहानगाम्।
अनुभूताद्भुतानेकश्च मामुत्रैव जननि ॥१६५॥
प्रात कृपाणपाणिश्च गतवानस्मि तद्गृहम्।
अथामात् सोमदा सात्र कृष्णाश्वापषधारिणी ॥१६६॥
सापि शोनहयारूपमकराद् बन्धमोचिनी।
खुरदन्तप्रहारैश्च ततो युद्धमभूत्तयो ॥१६७॥
मया प्रवृत्तनिस्त्रिंशप्रहारा क्षुद्रशाकिनी।
निहता बन्धमोचिन्या सया, मा सोमदा तत ॥१६८॥
मञ्चाहं निर्भयीभूतस्तीर्णतिर्मन्त्वधुर्गतिः।
न कुस्त्रीसङ्गमं भूयो मनसा समचिन्तयम् ॥१६९॥
चापलं साहसिकता शाकिनीछम्बरादय ।
दोषाः स्त्रीणां भय प्रायो लोकत्रयमयावहाः ॥१७०॥
तच्छाकिनीसमीं बन्धदत्तां किमनुधावसि ।
स्नेहो यस्या म पत्यौ स्वे तस्यास्तु खम्पसो कुत ॥१७१॥
एवमुक्तोऽप्यहं तेन मित्रेण भवशर्मणा।
नाकार्षं वचनं तस्य प्राप्तोऽस्मीमां गति तत ॥१७२॥
अतस्त्वां वच्मि मा कार्षीरनुरागपरां प्रति।
क्लेशं सा हि स्वजातीये प्राप्ते त्वां त्यक्ष्यति ध्रुवम् ॥१७३॥
मुञ्चीष पुष्पं पुष्यं स्त्री वाञ्छति नव नवम्।
अतोऽनुतापो भविता ममेव भवत सखे ॥१७४॥
इत्येतत्कपिरूपस्यसोमस्वामिवचो हृदि।
तस्य निश्चयदत्तस्य नाविशद्रागनिर्मरे ॥१७५॥
उवाच स कपिं स हि न सा व्यभिचरेन्मयि।
विद्याधराधिपकुले शुद्धे जाता ह्यसाविति ॥१७६॥
एव तयोराल्पतो सम्ध्यारक्तोऽस्तमूधरम्।
ययौ निश्चयवत्तस्य प्रियेप्सुरिव भास्करः ॥१७७॥
अथागतायां रजनाबप्रवृत्यामियाययो ।
सा शृङ्गोत्पादिनी तस्य निकट तत्र यक्षिणी ॥१७८॥

इस प्रकार, हम दोनों इसे प्रातःकाल मार डालेंगे। तुम सबेरे ही मेरे घर पर आ जाना।
ऐसा कहकर उसने उसे अपना घर दिखा दिया। उसके घर चले जाने पर मैं अपने घर लौट
आया। मैं इसी क्रम में अनेक अद्भुत जन्मों का अनुभव कर चुका था ॥१६४-१६५॥
सबेरे ही तलवार हाथ में लेकर बन्धमोचनिका के घर गया और सोमदा काली घोड़ी के
रूप में वहाँ आई ॥१६६॥
उस बन्धमोचनिका ने भी लाल घोड़ी का रूप धारण किया और खुरों एवं दांतों के प्रहार से
उन दोनों का युद्ध प्रारम्भ हुआ। अवसर पाकर मेरे द्वारा प्रहार करने पर वह नीच डाग्न (सोमदा)
बन्धमोचनिका से मार दी गई ॥१६७-१६८॥
तदनन्तर पशुता की दुर्व्यथा से छूटे हुए मैंने यह निश्चय किया कि अब मन से भी परस्त्री का
संसर्ग न करूँगा ॥१६९॥
चंचलता, साहस और डायनपन—स्त्रियों के ये तीन दोष तीनों लोकों को भय देनेवाले हैं।
इसलिए, डायन की सहेली बन्धुदत्ता का पीछा क्यों कर रहे हो, जिसका अपने पति के प्रति प्रेम
नहीं है, वह तुमसे क्या स्नेह करेगी ? ॥१७०-१७१॥
मित्र भवशर्मा से इस प्रकार कहे जाने पर भी मैंने उसकी बात नहीं मानी, उसीसे इस गति
को पहुँचा हूँ ॥१७२॥
इसीलिए, तुमसे भी कहता हूँ कि तुम भी अनुरागपरा से प्रेम न करो। वह किसी सजातीय
विद्याधर के मिलने पर तुम्हें छोड़ देगी ॥१७३॥
जैसे मधुकरी नये-नये फूलों को चाहती है, उसी प्रकार स्त्री नये-नये यार को चाहती है।
अतः हे मित्र ! तुम्हें भी मेरे ही समान पश्चात्ताप करना पड़ेगा ॥१७४॥
सोमस्वामी के प्रेम से भरे ये वचन निश्चयदत्त के हृदय में स्थान न पा सके ॥१७५॥
वह बोला—अनुरागपरा मेरे साथ कभी धोखा न करेगी, वह विशुद्ध विद्याधरी-वंश में
जन्मी है ॥१७६॥
इस प्रकार, उन दोनों के वार्तालाप करते-करते सूर्य मानों निश्चयदत्त का प्रिय कार्य करने के
लिए अस्ताचल को चल पड़ा। तदनन्तर रात आने पर अवदूती के समान वह शृंगोत्पादिनी
यक्षिणी उसके समीप आई ॥१७७-१७८॥