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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

मनोरथप्रभा की कथा

Page 800Permalink

दृष्टान्त सङ्ग्रह ७५१
'तुम कौन हो और अस्वस्थ हो इस दुर्गम भूमि में कैसे पहुंचे ?' यह सुनकर स मयप्रभ ने
अपना परिचय देकर उससे भी पूछा-॥८३॥
'तू मुझे बता कि तू कौन है और इस वन में तेरी क्या स्थिति है?' ऐसा पूछते हुए
राजकुमार से वह दिव्य कन्या बोली-'हे महापुरुष यदितुम्हें मेरे सम्बन्ध में जिज्ञासा
है तो कहती हूँ सुनो। ऐसा कहकर आंसुओं की निरन्तर धारा बहाती हुई वह कहने
लगी-॥८४-८५॥
मनोरथप्रभा की कथा
हिमालय के मध्यभाग में कांचनधाम नाम का नगर है। वहाँ पद्मकूट नाम का विद्याधरों
का राजा है। उस राजा की प्रभा नाम की रानी से उत्पन्न हुई मैं मनोरथप्रभा नाम की
कन्या हूँ ॥८६-८७॥
मैं विद्याओं के प्रभाव से अपनी सहेलियों के साथ प्रतिदिन आश्रमों और कुलगर्वता
वनों और उपवनों में दिन के तीन पहरों तक मनोविनोद करके चौथे पहर (सायंकाल) पिता के
भोजन के समय घर आ जाती थी। एक बार मैं विहार करती हुई यहाँ सरोवर के तीर पर आई
और मैंने उस तीर पर अपने मित्र के साथ बैठे हुए एक मुनिकुमार को देखा ॥८८ ९०॥
उसकी शोभा से आकृष्ट मैं दूती के समान उसके समीप गई। उसने भी साद भरे
नेत्रों से मेरा स्वागत किया ॥९१॥
तब मेरे बैठ जाने पर दोनों के मनोभाव को समझती हुई मेरी सहेली ने उसके मित्र से
उसके सम्बन्ध में पूछा ॥ ॥
तब उसका वह मित्र बोला-'हे गौरि यह समीप ही आश्रम में दीर्घतपस् नाम का
मुनि रहता है ॥ ९३॥
सरोवर में स्नान करने के लिए आय हुए उस तपस्वी मुनि को उसी समय आई हुई
लक्ष्मी ने देखा और वह उस पर आसक्त (अनुरक्त) हो गई ॥ ९४॥
लक्ष्मी ने उस जितेन्द्रिय मुनि को शरीर से असन्तुष्ट समझकर मन से ही जो उसकी
कामना की उससे उस मानस-पुत्र उत्पन्न हुआ। तब लक्ष्मी उस मानस पुत्र को मुनि को समर्पित करके
अन्तर्धान हो गई। उस मुनि ने भी बिना प्रयत्न और प्रयास के प्राप्त हुए उस पुत्र का "मकरन्दकन्दर्प"
स्वीकार कर लिया ॥९५- ९६॥

१. यही कादम्बरी की महाश्वेता है।
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