Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Report a copyright issue

Devanagarihipublished2,136 pages

About this granth

The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.

The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.

This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.

Page 552Permalink

(१०८)

बीरसिंह बोध

दीवान वचन

राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥

राजा बीरसिंह वचन

करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥

कबीर वचन

तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥

राजा बीरसिंह वचन

छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥

Page 553Permalink

बोधसागर

(१०९)

साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥
गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥

चौपाई

करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥
कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥
मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥
राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥
जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥
खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥
लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥
फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥
परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥
ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥

साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥
मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥

कबीर वचन-चौपाई

तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥
होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥
अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥
वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥
सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥
हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥

राजा बीरसिंह

राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥
अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥

राजाका कबीर साहबका शिष्य होना

Page 554Permalink

(११०)

बोरसिंह बोध

अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥
राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥
कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥
सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥
ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥
छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥
जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥
देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥

साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥

जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥

चौपाई

आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥
चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥
मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥
मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥

राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति

चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥
लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥
गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥
ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥
सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥
विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥
छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥
गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥

१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥

Page 555Permalink

बोधसागर

(१११)

संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥
गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥

चौपाई

सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥
बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥
नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥
कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥
नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥
रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥

राजा बीरसिंह वचन

चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥
आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥
मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥

कबीर वचन

सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥
श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥
तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥

दूत वचन

साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥

कबीर वचन

तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥
इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥
चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥
पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥

Page 556Permalink

(११२)

बीरसिंह बोध

युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥
चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥
राजा परे चरणतर आयी ।

राजा बीरसिंह वचन

। दयावंत भल कोक दिखायी ॥

कबीर वचन

देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥
पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥

कबीर वचन

तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥
राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥
बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥
छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥
दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥

राजा बीरसिंह वचन

अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥
अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥
राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥
जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥

कबीर वचन

तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥
चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥
नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥

राजा वीरसिंहका गुरुस्तुति करना

Page 557Permalink

बोधसागर

(११३)

कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥
कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥
स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥
सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥
स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥
कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥
राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥
विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥
बोले साधु शब्द धुनि तबहीं । रानी राय चरण गहे जबहीं ॥

राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना

राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥
करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥
धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥
छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥
दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥
अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥
संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥
सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥
वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥

कबीर वचन-चौपाई

करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥
तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥
बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥
जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥
बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥

कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना

Page 558Permalink

(११४)

बीरसिंह बोध

सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥
बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥
काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥
गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥
प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥

राजा बीरसिंहका स्तुति करना

करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥
पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥
भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥
अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥
सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥
जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥

कबीर वचन

आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥
तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥
रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥
सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥
सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥
सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥
ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥
सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥
साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥
दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥

चौपाई

जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥
मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥

Page 559Permalink

बोधसागर

(११५)

सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥
फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥
हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥
तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥

साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥
दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥

चौपाई

धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥
तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥
युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥
प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥
तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥
पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥
जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥
नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥

साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥
तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥

राजा बीरसिंह बचन-चौपाई

साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥
औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥
दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥
महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥
ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥
भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥

राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन

Page 560Permalink

(११६)

अमरसिंह बोध

कबीर वचन

अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥
गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥
बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥
सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥
ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥

कबीर वचन

तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥
पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥
राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥
माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥
भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥

राजा बीरसिंह वचन

राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥
सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥
एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥

ब्राह्मणी वचन

ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥

Page 561Permalink

बोधसागर

(११७)

ब्राह्मणी वचन

छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥
गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥
हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥
करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥

कबीर वचन

सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥
कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन-बीपाई

साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥
कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥
कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥

कबीर वचन

एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥
छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥
यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥
राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥
नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥
लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥

ब्राह्मणी वचन

अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥

जगन्नाथ वचन

जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥
अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥

१ जगन्नाथपुरीको ।

Page 562Permalink

(११८)

बीरसिंह बोध

ब्राह्मणी वचन

तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥
राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥
उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥
तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥

जगन्नाथ वचन

जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥
उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥

कबीर वचन

जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥
छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥
ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥

ब्राह्मणी वचन

हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥

छडीदार वचन

छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥
जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥
जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥
जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥
जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥

कबीर वचन

छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥

राजा बीरसिंह वचन

सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥
अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥
जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥

Page 563Permalink

बोधसागर

(११९)

कबीर वचन

जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥
वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥
मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥
सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥
चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥
ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥
पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥
अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥
तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥
छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥
अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥
धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥
धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥

राजावीरसिंह वचन

सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥
धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥

कबीर वचन-चौपाई

यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥
दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥
निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥
रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥
शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥
यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥

राजा वीरसिंह वचन

राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥

कबीर साहबका मगहरमें बिजुलीखाँके घर शरीर छोड़ना और राजा वीरसिंहका फौज लेकर बिजुलीखाँसे युद्धको जाना

Page 564Permalink

(१२०)

बीरसिंह बोध

पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥
महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥

कबीर वचन

आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥
तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥

राजा बीरसिंह वचन

विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥
साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥

कबीर वचन

तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥
तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥
चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥
बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥
साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥
तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥
रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥
विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥
गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥

विजलीखाँ वचन

कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥

कबीर वचन

यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥
छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥
नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥
चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥
जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥

Page 565Permalink

बोधसागर

(१२१)

सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥
हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥

कबीर बचन

पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥
डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥
चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥

राजा बीरसिंह बचन

अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥
विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥

कबीर बचन

आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥
खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥
कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥
ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥
भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥
नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥
आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥

विजलीखाँ बचन

हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥

कबीर बचन

विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥
पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥
तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥
छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥
रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥
हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥

पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन

Page 566Permalink

(१२२)

बीरसिंह बोध

राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥
पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥
गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥
जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥
मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥
सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥
ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥
अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥
यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥
गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥
सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥
आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥
भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥
छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥
धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥
अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥
पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥
अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥
असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥
दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥
करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥
सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥
श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥

चौपाई

गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥
नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥

Page 567Permalink

बोधसागर

(१२३)

धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥
ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥
सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥
शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥
पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥
चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥
नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥
तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥
घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥
तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥
राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥
एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥
राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥
बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥
तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥
भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥
चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥
चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥
यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥
हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥
दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥
जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥

साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥
ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥

Page 568Permalink

(१२४)

बीरसिंह बोध

चौपाई

तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥
निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥
धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥
जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥
अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥
चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥
तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥
मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥

छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥

बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥

काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥

करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥

सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥

कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥

चौपाई

तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥

आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥

साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥

हरिहर वचन

हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥

दूत वचन

कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥

वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥

आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥

नाम माहात्म्य

Page 569Permalink

बोधसागर

(१२५)

कबीर वचन

वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥

जीव वचन

विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥
नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥
तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥

ज्ञानी वचन

सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥
गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥

जीव वचन

जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥
जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥

कबीर वचन

साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥
अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥

चौपाई

पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥
कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥
देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥
देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥
ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥
मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥
तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥
कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥

Page 570Permalink

(१२६)

बीरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥
विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥

पुरुष वचन

आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥
कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥

हंस वचन

मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥
हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥
जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥
साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥
साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥
अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥

साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥
तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥

चौपाई

जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥
सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥
निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥
नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥
जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥
पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥

छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥
पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥

Page 571Permalink

बोधसागर

(१२७)

हंसन शिर क्षत्र राजे अमृत फल आनन्द घना ॥
रूप षोडश भानु हंसा कोटि शसिहिं अति बना ॥

सोरठा-धाम जो पाय अमोल, हंसा सुख तहैं विलसही ॥
द्वीपहिं द्वीप कलोल, जरा मरन भ्रम मेटिया ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे बीरसिंहबोधवर्णनो
नाम तृतीयस्तरंगः ॥

ग्रन्थ बीरसिंहबोध समाप्त ।