कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
About this granth
The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.
The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.
This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.
बोधसागर
(१०१)
पैसा दमरी नाहिं हमारे । केहि कारणे मोहि राय हंकारे ॥
गरज होय तो यहाँ चलि आवै । हम तो बैठे भजन करावै ॥
साखी—छडीदार तुम जायके, कहो रायके पास ॥
महा प्रचण्ड बघेल है, हम नहिं मानत त्रास ॥
चौपाई
छडीदार अति कोधित भयऊ । तुरतहिं चलि रायपहँ गयऊ ॥
छडीदार वचन
छडीदार कहै कर जोरी । महाराज एक विनती मोरी ॥
भक्त न आवै मोर हँकारे । कुछ भयभीरन राखु तुम्हारे ॥
कहैं हमारे कौन है काजा । तृणहि समान गिनत हौं राजा ॥
एता वचन राय सुनि लीन्हा । अगम बात कछु घटमो चीन्हा ॥
वह तो परमपुरुष है सोई । और होय तो आवै कोई ॥
सत्य भाव जाके उर आवे । मान बढाई लोभ सब जावे ॥
निर्गुण भक्ति जोई लवलीना । ताहि न उपजे भाव मलीना ॥
आशा तृष्णा जेहि घट व्यापै । धनवन्ता सो चाह मिलापै ॥
यहतो संत अविकल अविकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ॥
शोचत राजा मनमें गूने । नामदेव मन रहे अलूने ॥
मान बढाई जो नर पागे । करत खुशामद नृपती आगे ॥
साखी—नामदेव राजा कहे, जुलहा यहाँ न आव ॥
है अभिमानी बहुत सो, बहु अहँकार जनाव ॥
चौपाई
कीन विवेक राय दिल माहीं । नहिं आये कवीर हम जाहीं ॥
वह तो सत्य भक्ति चित दीन्हा । कारण कौन त्रास मम कीन्हा ॥
यहि विधि कीन विवेक विचारा । तबहीं राजा आप सिधारा ॥
१ नामदेवजीने राजाके विचारका भाव नहीं समझा ॥
(१०२)
बीरसिंह बोध
हुकम पाय आय असवारा । गज औ तुरंग सु साज सँवारा ॥
आवत देखा जब हम भाई । तब हम लीला एक बनाई ॥
आसन अधर कीन तेहि वारा । सवा हाथ धरतीसे न्यारा ॥
माला तिलक औ टोप विराजै । हाथ स्वेत कुवरी सो छाजै ॥
नृपति देखि अचरज मन कीन्हा । यह तो पुरुष अगम कछु चीन्हा ॥
कीन अवलोकन जग हम सबहीं । ऐसे पुरुष न देखे कबहीं ॥
धन्य धन्य अस्तुति सब गावैं । धन्य कवीर चरण सब ध्यावैं ॥
राजा चरण पकड़ि दोउ भाई । धन्य धन्य नृप करई बडाई ॥
कहे राय धन भाग हमारा । दर्शन दीन्ह आय करतारा ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-अस्तुति करत नृपति भाषेउ तुम ब्रह्म निर्गुण आप हो ॥
अनाथ नाथ सनाथ करि दिये माथ हाथ अनाथ हो ॥
अपनो दास करि जानि साहब दरश दीनेउ आयकै ॥
कीजै कृपा यहि दासपै चलि भवन दरस दिखायकै ॥
सोरठा-कृपा कीन जस मोहिं, तस मन्दिर पग दीजिये ॥
विनय करौं प्रभु तोहिं, वेगि विलम्ब न कीजिये ॥
कवीर वचन-चोपाई
कहैं कवीर तहाँ नहिं काजा । तुम परचण्ड बघेला राजा ॥
काम क्रोध मद लोभ बडाई । रोम रोम अभिमान समाई ॥
तुरी सवा लक्ष सँग तोरे । लक्ष सवा दो प्यादा दोरे ॥
हस्ती चलत सहस तव संगा । निश्चिदिन भूले कामिनि रंगा ॥
कंचन कलसा महल अटारी । कैसे शब्द गहै नर नारी ॥
हम भिक्षुक जाने संसारा । कौन काज है तहाँ हमारा ॥
राजा बीरसिंह वचन
तुम सतगुरु हो दीन दयाला । करमवश्य हम अहैं विहाला ॥
माया तिमिर नैन पट लागी । दर्शन पाय भये अनुरागी ॥
राजाका रानीसे कबीर साहबको गुरु बनानेकी बात चलाना और रानीका राजाको नीति समझाना
बोधसागर
(१०३)
करो दया अपनो करि लीजै । दास जानि आयसु प्रभु दीजै ॥
दीन जानि मन्दिर पगु धारो । भक्तराज तुम वेगि पधारो ॥
हम हैं पापी अधम अजाना । तव विनु कृपा काल धरि ताना ॥
देह उपदेश प्रभु मोहि बचावो । पाप जालते वेगि छुडाओ ॥
तुमरी कृपा सुनहु हो साहब । अंस विश्वास भवहितरि जायब ॥
अब जनि लावहु बार गुसाई । चलहु कृपा करि हंसन राई ॥
साखी-भक्तराज दाता अहो, कीजै मोह सनाथ ॥
मैं आधीन शरण तुव, चलो हमारे साथ ॥
चोपाई
बहुत अधीन तेहि जब देखा । चलन विचार कीन तब लेखा ॥
ततक्षण राजा हस्ति मँगावा । लै हमहीं तब हस्ती बैठावा ॥
गजते आसन अधरहिं धारा । चले राय तब बजे नगारा ॥
जबै राय मन्दिर लै गयऊ । तबै रानि कहैं तुरत बोलेऊ ॥
मानिक देहरानी चलि आयी । तासे राजा बात सुनाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम रानी गुरु कीन कबीरा । आदि ब्रह्म हैं मतिके धीरा ॥
चरण धोय चरणाभूत लीजै । सतगुरु दया करम सब छीजै ॥
तब सो रानी कहैं सुनु बाता । ओढे चीर सुभग निज गाता ॥
रानी मानिकदेवी वचन
राजा विन्ती सुनो हमारा । समुझि बूझि गुरु करो भुवारा ॥
तुम राजा हौ बहुतै ज्ञानी । विनय हमार लेहु सुनि मानी ॥
राजा बीरसिंह वचन
इतना सुनत राय मुसुकाये । रानी ज्ञान कौन बहुराये ॥
तुम हौ नारि भक्ति कहैं मानौ । साहबकी गति नहिं तुम जानौ ॥
कर्ता आप देह धरि लीना । भक्तरूप होय दर्शन दीना ॥
नामदेव आदि भक्तोंका कबीर साहबसे ईर्षा करना और उनका समाधान
(१०४)
बीरसिंह बोध
हम अरु राय बैठे जेवनारा । आनि सो वार घरे दोय थारा ॥
कंचन थारी झारी पानी । कंचनवटुकी व्यंजन आनी ॥
अधरसु थार भुईं ते न्यारा । महाप्रसाद राय चित धारा ॥
पाय प्रसाद राय जब लीन्हा । हम अरु राय बाहर पगु दीन्हा ॥
एकहि आसन बैठे दोई । नामदेव तब ठाढे होई ॥
नामदेव कह आसन दीन्हा । बहु सन्मान ताहिकर कीना ॥
नामदेव बैठे जब जायी । प्रश्न करन तिन चित तब लाई ॥
नामदेव वचन
कहहु कवीर मोहि समुझाई । कहैं तव गुरु शब्द कित पायी ॥
साहिब कौन सबनके पारा । मोसे कहहु वचन विचारा ॥
साहिब कौन जाहि तुम ध्याओ । कहैवा सुक्ति सुरति कित लाओ ॥
कौन भाँति यमसे जिव बाँचे । भिन्न भिन्न कहहु मोहि साँचे ॥
आप न समझो बोधो राजा । राम विना होय जीव अकाजा ॥
केतो पढे गुने अरु गावै । विनु हरि भक्ति पार नहीं पावै ॥
कवीर वचन
नामदेव भूले तुम जैसे । हमको मति जानहु तुम तैसे ॥
निर्गुण पुरुष आहि यक आना । अस्तुति ताकर वेद बखाना ॥
शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा । और जीव है कौन विचारा ॥
छन्द-नित्य निगम अस्तुति अराघै हारि थके विरंच महेश हो ॥
सबै ऋषिदेव अस्तुति अराधई तेहि गावत सुरपति शेष हो ॥
जेहि गावत नारद शारदादि पार कोई ना लहे ॥
सो भेद सतगुरु गावही कोइ संत ज्ञानी चित गहे ॥
सोरठा-पूजहि हरि हर देव, जड मूर्ति पूजत बहै ॥
निशिदिन लावत सेव, जो रक्षक भक्षक अहै ॥
नामदेव तब सुनत लजाने । नहीं पाये भेद मनहिं पछताने ॥
सुनि लजायके उठि सो गयऊ । राजा तबहिं कहत अस भयऊ ॥
राजाका शिकार खेलने जाना - पानी न मिलनेसे व्याकुल होना और कबीर साहबका बाग प्रगट करके राजाका सेनासहित प्राण बचाना
बोधसागर
(१०५)
राजा वीरसिंह वचन
तब राजा अस वचन उच्चार । हम सँग साहिब चलो शिकारा ॥
आगे सेना सबही ठाडे । हस्ती घोडा बाहर काटे ॥
आगे चले निशान नगारा । सवा लक्ष सँग चले असवारा ॥
सवा लक्ष द्रव्य प्यादा दौरा । ठाडे भौंट करत बड शोरा ॥
हरनी स्वान लीन सँग चीता । कोइ सचान वाज कर लीता ॥
बहु दल हस्ती लीनी साथा । यहि विधि चले शिकार नरनाथा
भौंतिन भौंति खिलौना लीना । आयसु सकल लोक कहँ दीना ॥
आगे सेन चली सब साजा । हस्ती बैठि चले गुरु राजा ॥
कवीर वचन
जबही राजा चले रिगायी । तब हम तासों बात सुनायी ॥
राजा संग मोहि ले जाओ । जीव एक मारन नहि पाओ ॥
कोटिक यतन करो तुम राजा । जीवन मिलै होय तोहि लाजा ॥
राजा वीरसिंह वचन
तत्क्षण राजा वचन सुनावें । मारन कहौ तोहि जाइ चुकावें ॥
तब हम कहा हमका कहहीं । यह नहि धर्म मनुषकर अहहीं ॥
यह सुनि राजा घोड कुदावा । शेर शिकारी रूप बतावा ॥
एको जीव फन्द ना परई । क्रोध अग्नि घट भूपति जरई ॥
खेलेत रमत दूर होय गयऊ । कितहुँ न भेंट जीवसे भयऊ ॥
फिरत अहेरे परे भुलाई । कतहुँ न ठौर नीर कहँ पाई ॥
विना नीर सो तडपे राजा । व्यापी तृषा बने नहि काजा ॥
साखी-बहुत दूर राजा गये, पीछे फिरे भुआर ॥
कटक सकल सबही फिरे, व्याकुल सबै अपार ॥
ग्रंथकर्ता अथवा परचात् के लेखक महाशयकी बलिहारी है, शिकारके लिये इतनी तैयारी
बतलायी है ।
(१०६)
बीरसिंह बोध
पानी पानी सबहीं गोहरावैं । विनु पानी सबहीं मरि जावैं ॥
राजा कहै देखो सब जायी । बडो धूप जिव गयो ढरायी ॥
बहुत लोग जल दूँढन लागे । बहुतक लोग भाग चले आगे ॥
ठावैं ठावैं सब गये झुलाई । हस्ती घोरा सबहिं नशायी ॥
राजा तब कहन अस लागा । संशय बहुत तेहि मन पागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
आज अहेर एको नहिं आवा । एको जीव जन्तु नहिं पावा ॥
पाना कतहुँ न पावा भाई । कैसी कर्ता कीन गुसाई ॥
जो जनितों अस होइहैं बाता । करन अहेर न आइत ताता ॥
सेना हमार प्राण सम प्यारी । सोऊ मरत प्यासकी मारी ॥
अब कहाँ जाइ केहि विधि करिहैं । विना नीर सब इतही मरिहैं ॥
व्याकुलता बहुतै मन बाढी । बहुत करौं सकौं नहिं काढी ॥
तेहि अवसर चर बहुतक आये । खोजिथके नहिं जलकतहुँ पाये ॥
साखी-सेना सकल मरत है, पानि पानि गोहराय ॥
छाँह छाँह सब दूँढहीं, राजा रहे शिर नाय ॥
चौपाई
तेहि अवसर हम कीन विचारा । राय प्रतीति देखों यहि वारा ॥
बीरसिंहदेव बघेला राजा । देइ प्रतीति करों यहि काजा ॥
विना प्रतीति भक्ति नहिं होई । विना भक्ति जिव जाय विगोई ॥
विनु भक्ती गुरु नाहीं भेटे । विनु गुरु संशय नाहीं भेटे ॥
विनु भेटे हिय संशय भाई । काल दयाल कहु को विलगाई ॥
मन परतीति होय जेहि प्रानी । होय तुरत चौरासी हानी ॥
करे प्रतीति नर सो पावैं । पाइ श्रद्धा गुरु शरणहिं जावैं ॥
गुरुके वचन जाहि विश्वासा । फिर नहिं होय नरकमें बासा ॥
बोधसागर
(१०७)
गुरु विनु मुक्ति न पावत कोई । चौरासी भय मिटत न लोई ॥
याते हम सब कीन्ह उपाई । राजा मन प्रतीति जेहि आई ॥
सरवर रच्यो अनूपम ठामा । बाग बगीचा औ लखेरामा ॥
नाना भांति फूली फुलवागी । बहु मेवा लागे तेहि बारी ॥
नाना भांति फूल तहैं फूले । बास सुवास पाइ मन भूले ॥
नाना पक्षी करत कलोल। जहैं तहैं उड़ैं सो टोलम टोला ॥
छन्द-फूल नाना भांति फूले, केतकी जूही आदि है ॥
चम्पा चमेली मोगरा तहैं फूल दाख गुलाब है ॥
खम्भा कदली खडे तहाँ सेबती दवना बहु अहे ॥
कदम्ब जाही मालती चमेली बहुत सुखदा लहैं ॥
सोरठा-नारियल अम्ब बदाम, कटहर बडहर पीसता ॥
बहुविधि कहे सुनाम, फल लागे चहु ओर सो ॥
चौपाई
ऐसो बाग बनी फुलवारी । बनी सो तुरत लगी नहिं वारी ॥
इहवाँ सैन रही कुम्हलायी । पानी पानी सबै गोहरायी ॥
तब हम कहे राय सुनु बाता । सत्य वचन भाखूं विख्याता ॥
उत्तर दिशा राय पगु धारो । थोडहि दूर जल बहे अपारो ॥
कहे मरत ससैन कुम्हलाई । सेना सकल चलो तहैं भाई ॥
यह सुनि राय ठाढ़ तब भयऊ । दौय कर जोरि सुविन्ती कियऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सतगुरु वचन कहो जनि ऐसो । पाहन ऊपर जल बह कैसो ॥
बार अनेक अहेरे आये । पर्वत पर जल नाहिं रहाये ॥
साहिब कछु जनि ऐसी बानी । हँसे लोग गुरु झूठ बखानी ॥
१ महल
(१०८)
बीरसिंह बोध
दीवान वचन
राय दिवान कहे अस बाता । गुरुके वचन झूठ नहिं जाता ॥
कहत दिवान जोरि दोउ हाथा । गुरुके वचन सत्य धरु माथा ॥
का जानो को आहि गुसाई । बेगि राय उठि टेके पाई ॥
राजा बीरसिंह वचन
करो क्षमा सुनु हे गुरुराई । दास गुनाहहि देहु बहाई ॥
जस कहिहौ सोई हम करिहैं । बचन तुम्हार सदा अनुसरिहैं ॥
कबीर वचन
तब हम कहयो सुनो तुम राई । उत्तर दिशा तुम देहु रिगाई ॥
सैन सिपाइ ठाढे सब भयऊ । ततक्षण उत्तरदिशि चलि गयऊ ॥
राजा कुंजर दीन रिगाई । बाज निशान भेरि शहनाई ॥
चलत राय देखे चहुँ फेरा । राजा नजर दूर लगि फेरा ॥
दूरिते देखि परा सो ठावा । सुंदर बाग जहाँ रहै शोभावा ॥
राजा देखि हरष मन भरेऊ । गुरुके चरण शीश तब धरेऊ ॥
सरवर निकट राय चलि जाई । देखत बाग रहै हरषाई ॥
अम्ब निम्ब औ कदलि घनेरा । दौना मरुआ लगे बहुतेरा ॥
भांति भांति तहँ मेवा लागा । भई प्रतीति राय मन जागा ॥
ऐसी शोभा बनी बनायी । देखत बने बरनि नहिं जायी ॥
राजा बीरसिंह वचन
छन्द-राय कुंजर उतरि ठाढे चरण सतगुरुकै गहै ॥
हम कुटिल अधम अघकर्म राशी बचन पावन तुव अहै ॥
बालभाव सुभाव पितु हित बचन कबहिक टार जो ॥
पितु कण्ठ लावत आपने हिय तात और न आव सो ॥
सोरठा-जो पितु तामन लाव, तो बालक कासों कहै ॥
अधम उधारन नाव, दीन जानि जन तारिये ॥
बोधसागर
(१०९)
साखी-सैन सरोवर देखिया, उत्तम वरन सो नीर ॥
गिरिवर पर सरवर रचे, धन धन सत्यकवीर ॥
चौपाई
करी प्रणाम राय गहि पाई । महाप्रसाद देहु गुरुराई ॥
कीन प्रसाद राजा कहैं दीना । राजा बहुत लोक मिलि लीना ॥
मेवा सकल लोक मिली पाये । बहुत भांति सब लीन धराये ॥
राजा प्रजा सब करै बडाई । काहि कहौं कछु कहत न जाई ॥
जैसा मेवा सत्यगुरु दीना । नहि मिल सो सुरलोकहि चीना ॥
खात खात सो जनम सिराई । नहि देख्यो अस मेवा भाई ॥
लेइ प्रसाद जल अचवन कीन्हा । दुख संताप मुलाय सो दीन्हा ॥
फिरन लगे सो बगीचा माहीं । नहि गर्मी नहि शीत तहांहीं ॥
परिमल वास उठे चहुँ ओरा । बहुविधि पक्षी करै कलौरा ॥
ज्यों २ देखै झैल बगीचे । त्यों २ मन आनन्द रस सीचे ॥
साखी-तृषा सबनकी बुझि गयी, ऐसा निर्मल नीर ॥
मेवा पाये सब मिली, तृषित भये शरीर ॥
कबीर वचन-चौपाई
तब मैं कहचो सुनो हो राजा । सेना सकल भयो सब काजा ॥
होय असवार जाहु घर राई । जहँको जल तहँ देखै पठाई ॥
अब हम अपने लोक सिधायब । सत्य पुरुषका दर्शन पायब ॥
वहँकी शोभा अनन्त अपारा । शिव ब्रह्मा नहि पावत पारा ॥
सुनत बचन राजा भय माना । जानि विछोहै मनहि सँकाना ॥
हाथ जोरि विन्ती सो कीना । बहुत अधीन भयो परवीना ॥
राजा बीरसिंह
राजा चरण परे अकुलायी । अब सतगुरु जनि करहु दुरायी ॥
अब स्वामी मन्दिर पगु दीजै । सकल जीव अपना कर लीजै ॥
राजाका कबीर साहबका शिष्य होना
(११०)
बोरसिंह बोध
अब मन जनि दाय करि जानो । हम सेवक तुम निज कै मानो ॥
राय प्रतीति बहुत मन भाई । देखि प्रीति चलन फरमाई ॥
कुंजर राय भये असवारा । ले हमहीं पुनि तहाँ बैठारा ॥
सब सेनाकी भयी तैयारी । बजा निशान लगी नहिं बारी ॥
ततक्षण राय वचन कहि दीना । भरि भरि वर्तन सबही लीना ॥
छोड़ि सरोवर चले रिंगायी । क्षणहि सरोवर छार उडायी ॥
जब राजा पुनि पाछे निहारा । नहीं सरोवर उड़ैं तहाँ छारा ॥
देखत राजा चकित न थोरा । मँम पद गहि चित्त बहु मोरा ॥
साखी-धन्य कवीर सरोवर रची, दलहिं लीन ज़िवाय ॥
जहवाँको जल लायक, तहाँको दीन पठाय ॥
चौपाई
आगे मोहि करि जबही लीन्हा । तब पीछे राजा पग दीन्हा ॥
चले राय महल पग दियऊ । सतगुरुको आगे करि लयऊ ॥
मन्दिर कञ्चन पलंग बिछावा । लै सतगुरुहि तहाँ बैठवा ॥
मानिक देह रानी चली आयी । कहै राय रानी गहु पायी ॥
राजा बोरसिंह वचन रानी प्रति
चरण टेकि चरणामृत लीजै । गुरुकी दया अमृत रस पीजै ॥
लोक लाज तुम तजहु बडाई । गुरु कवीरकी शरणे आई ॥
गुरु कृपा होय दास पर जबहीं । काल त्रास ना ब्यापे तबहीं ॥
ज्ञान भक्ति विन गुरु न पावै । काल फन्द स्वपने नहिं जावै ॥
सर्गुण भक्ति जगत बतलावे । निर्गुण भक्ति गुरुसे पावे ॥
विन निर्गुण नहिं जीव छुटावे । बार बार यम फन्द परावे ॥
छन्द-गुरु कृपा होय जेहि दासपै तेहि काल त्रास न ब्यापई ॥
गुरु भक्ति मुक्ति दाता भक्त त्राता छुटै जीव तहाँ तापई ॥
१ मेरे पग पर पड़कर मनके अभिमानको छोड़ दिया ॥
बोधसागर
(१११)
संशय हरन अघ कर्म दाहन है सदा हंस सहाय हो ॥
गुरु पह मते अपवर्ग वासा पुरुष लोक सिधाय हो ॥
चौपाई
सरवर एक रचे गुरु तहवाँ । पर्वत ऊपर जल नहिं जहवाँ ॥
बाग एक रच्यो तेहिके तीरा । निर्मल जल बहै त्रिविध समीरा ॥
नाना भांती तरु जेहि माहीं । सुर पादप तेहि देखि लजाहीं ॥
कदम्ब निम्ब अम्ब कचनारी । वडहल बेल बदाम सुपारी ॥
नाना रंग फुली फुलवारी । फल रस भरे झुकी सब डारी ॥
रानीसे अस कहि सो राजा । विन्ती करन लगा जिवकाजा ॥
राजा बीरसिंह वचन
चरण टेकि राजा कहे बाता । भये दयाल दयानिधि दाता ॥
आवागमन रहित करु मोही । अब मैं खसम चरण गह्यो तोही ॥
मो कहैं अपना लोक दिखाओ । अब हम धरयो तुम्हारो पाओ ॥
कबीर वचन
सत्य प्रतीति जब राजहिं देखा । बहु विधि ताकी कीन परेखा ॥
श्रवण लागि निज नाम सुनाया । तुरतहिं राजा लेइ सिधाय ॥
तबहीं दूत रोक गहि बाटा । छलन दूत बैठा तहाँ नाटा ॥
दूत वचन
साहब तुम निर्मल असवारा । भुईं तरे कहवाँ पगु धारा ॥
कबीर वचन
तबै हम दूतनसे कहेऊ । यह जिव नाम खसम कर रहेऊ ॥
इतना सुनत दूत उठि भागा । देखत नृपति भयो अनुरागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
धन्य सतगुरु धन्य भक्ति तुम्हारी । धन्य हंसा जेहि शब्द उचारी ॥
चले हम अरु राय तेहि ठौरा । जहँवा गम पावत नहिं चौरा ॥
पहुँचे मानसरोवर जायी । शोभा कामिनि बहुत सुहायी ॥
(११२)
बीरसिंह बोध
युत्थ युत्थ बैठी सब पाँती । एक रूप तहवाँ नहिं जाती ॥
चार भानु कामिनिकी काँती । नहिं तहँ दिवस नहिं तहँ राती ॥
राजा परे चरणतर आयी ।
राजा बीरसिंह वचन
। दयावंत भल कोक दिखायी ॥
कबीर वचन
देखिनि राय लोककी शोभा । चकित होय राजा मन लोभा ॥
पुनि राजा कहन अस लागा । देखि लोक लोभ महाँ पागा ॥
राजा बीरसिंह वचन
अब जनि लेह चलो संसारा । राखो लोक शरण मंझारा ॥
कबीर वचन
तब हम कहा सुनु राय सुजाना । तुम राजा सत्यलोक भुलाना ॥
राजा मानो कहा हमारा । चलो तहाँ जहाँ राज तुम्हारा ॥
बरबस बाहँ गही तब राई । ले राजा तहँवा बैठाई ॥
छिन यक गहर तहाँ नहिं कियऊ । देह जायके जागृत भयऊ ॥
दोय कर जोरि राय रहे ठाढे । बहुत प्रेम हरष मन बाढे ॥
राजा बीरसिंह वचन
अब लगि साहब मैं नहिं जाना । सकल भक्त सम तुमको माना ॥
अब हम जाना भेद तुम्हारा । सोई करहु जेहि हंस उबारा ॥
राजा कहे कौन विधि करऊँ । सकल द्रव्य गुरु चरणे धरऊँ ॥
जाते जीव कालते बांचे । सोई जतन करो गुरु सांचे ॥
कबीर वचन
तब हम कहा होहु निर्वाना । राय मँगाव मिठाई पाना ॥
चौका जुगति करो सब साजा । देउ सार पद मेटो लाजा ॥
नरियर धोती पान मँगाओ । महा कन्द ले तहाँ धराओ ॥
राजा वीरसिंहका गुरुस्तुति करना
बोधसागर
(११३)
कलश ले अरु पांचो बाती । साधु संत बैठे बहु भांती ॥
कंचन झारी जल धरवाई । तापर खरचा सात चढाई ॥
स्वेत चँदेवा स्वेत कनाता । सत्यपुर कह सूकृत वाता ॥
सत्यलोक स्वेत है फूला । स्वेत सब देह जीवका मूला ॥
स्वेत सिंहासन चौका चारी । सतगुरु बैठे आसन मारी ॥
कदली पत्र मेवा संयूता । चन्दन श्वेत सुगन्ध बहूता ॥
राजा सकल साज लइ आये । साधु संत बैठे सब आये ॥
विधिपूर्वक शुभ चौक पुराया । हाथ जोरि ठाढा भयो राया ॥
बोले साधु शब्द धुनि तबहीं । रानी राय चरण गहे जबहीं ॥
राजा बीरसिंहका सतगुरुकी स्तुति करना
राजा लीन्ह नारियर हाथा । बहुत जीव तहाँ भये सनाथा ॥
करी दंडवत विन्ती कीना । हंस राज मोहि दर्शन दीना ॥
धन्य भाग मम काह सराहू । हे प्रभु तुम हौ सत्य मम नाहू ॥
छन्द-आनन्द कन्द सर्वज्ञ रूप अखिल ज्ञाता अविगतं ॥
दास जानि दीजै अभय पद ज्ञानदाता अस्थितं ॥
अविनाश सागर-दयाके आगर धर्म कंटक मर्दनं ॥
संशय खण्डन रिपुविहंडन अजर वीरा सुमिरावैनं ॥
सोरठा-अमर पुरी तुव बास, अमर स्वरूपी हंस जहँ ॥
वास दीजिये दास, सुरतिवंत प्रभु कीजिये ॥
कबीर वचन-चौपाई
करि चौका तब नरियर मोरा । करि आरती भयो पुनि भोरा ॥
तिनका तोरि पान लिखि दयऊ । रानी राय अपन करि लयऊ ॥
बहुतक जीव पान मम पाये । ताघट पुरुष नाम सात आये ॥
जो कोइ हमारा बीरा पावे । बहुरि न योनी संकट आवे ॥
बीरा पावे भवते छूटे । विनु बीरा यम धरि २ लूटे ॥
कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना
(११४)
बीरसिंह बोध
सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥
बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥
काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥
गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥
प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥
राजा बीरसिंहका स्तुति करना
करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥
पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥
भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥
अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥
सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥
जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥
कबीर वचन
आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥
तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥
रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥
सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥
सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥
सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥
ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥
सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥
साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥
दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥
चौपाई
जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥
मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥
बोधसागर
(११५)
सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥
फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥
हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥
तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥
साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥
दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥
चौपाई
धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥
तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥
युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥
प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥
तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥
पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥
जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥
नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥
साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥
तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥
राजा बीरसिंह बचन-चौपाई
साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥
औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥
दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥
महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥
ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥
भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥
राजाका अजर नाम चौका करनेके लिये ब्राह्मणोंके घर वस्त्र लेने जाना और अजर चौका वर्णन
(११६)
अमरसिंह बोध
कबीर वचन
अजर नाम चौका विस्तारो । जेहिते पुरुषा तरे तुम्हारो ॥
गाव तुम्हारे ब्राह्मणि जाती । धोती कीन्हही बहुतै भांती ॥
बारी माहिँ कपास लगायी । बहुत नेम से काति बनायी ॥
सो धोती तुम राजा लाऊ । पाछे चौका जुगुति बनाऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
तब राजा अस विन्ती कीन्हा । कैसे जान्यो को कहि दीन्हा ॥
ब्राह्मणि मंदिर नगर रहायी । ताकी सुधि हमहुँ नहि पायी ॥
कबीर वचन
तब राजा आपै चलि गयऊ । साथ एक नेगीको लयऊ ॥
पूछत ब्राह्मणि राजा गयऊ । वही पुरीमें जाइ ठाढ़ रहेऊ ॥
राजा आवन सुनी जब सोई । आदर देन चली तब ओई ॥
माई पुत्री आगे चलि आई । दधि अच्छत औ लुटिया लाई ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणि कहै दोई कर जोरी । राजा सुनिये विन्ती मोरी ॥
भाग मोर हम दर्शन पावा । मैं बलिहारी यहाँ सिधावा ॥
राजा बीरसिंह वचन
राजा कह ब्राह्मणीसे बाता । तुव घर धोती एक रहाता ॥
सो धोती हमको देहू । गाँव ठौर तुम हमसे लेहू ॥
एतो वचन जो राखु हमारा । धोती देइ करु काज निबारा ॥
ब्राह्मणी वचन
ब्राह्मणी कहे सुनो हो राऊ । धोती सुधि तुहि कौन बताऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
हम घर सतगुरु कहि समझायी । धोती सुधि हम गुरुपै पायी ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
वचन सुनत तेहि सुधि सो भूली । मन पछताय विनय मुख खोली ॥
बोधसागर
(११७)
ब्राह्मणी वचन
छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥
गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥
हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥
करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥
कबीर वचन
सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥
कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन-बीपाई
साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥
कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥
कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥
कबीर वचन
एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥
छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥
यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥
राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥
नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥
लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥
ब्राह्मणी वचन
अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥
जगन्नाथ वचन
जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥
अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥
१ जगन्नाथपुरीको ।
(११८)
बीरसिंह बोध
ब्राह्मणी वचन
तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥
राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥
उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥
तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥
जगन्नाथ वचन
जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥
उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥
कबीर वचन
जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥
छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥
ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥
ब्राह्मणी वचन
हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥
जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥
जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥
जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥
जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥
कबीर वचन
छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥
अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥
जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥
बोधसागर
(११९)
कबीर वचन
जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥
वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥
मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥
सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥
चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥
ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥
पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥
अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥
तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥
छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥
अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥
धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥
धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥
राजावीरसिंह वचन
सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥
धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥
कबीर वचन-चौपाई
यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥
दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥
निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥
रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥
शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥
यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥
राजा वीरसिंह वचन
राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥
कबीर साहबका मगहरमें बिजुलीखाँके घर शरीर छोड़ना और राजा वीरसिंहका फौज लेकर बिजुलीखाँसे युद्धको जाना
(१२०)
बीरसिंह बोध
पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥
महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥
कबीर वचन
आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥
तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥
राजा बीरसिंह वचन
विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥
साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥
कबीर वचन
तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥
तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥
चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥
बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥
साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥
तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥
रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥
विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥
गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥
विजलीखाँ वचन
कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥
कबीर वचन
यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥
छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥
नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥
चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥
जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥