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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

कण्डिका १९ ॥

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २। क० १९ ३४७
का तिरस्कार करके नहीं रहते, वे अवश्य [ दूसरों से ] नमस्कार किये गये नमस्कार करने
वाले को [ आशीर्वाद ] देते हैं [ यह गोप्ताओँ को आशीर्वाद का विषय हुआ ] । ( ततः
एतं प्रजापतिं यज्ञं प्रपद्यते, नमो नमः इति ) फिर इस प्रजापति यज्ञ में वह [ यजमान ]
पहुँचता है--नमो नमः [ कहता है ] । ( देवाः नमस्कारम् अति न हि, सः यजमानः
तत्र एव सर्वान् कामान् आप्नोति सर्वान् कामान् आप्नोति ) देवता [ विद्वान् लोग ]
नमस्कार का तिरस्कार करके नहीं रहते, वह यजमान उस [नमस्कार करने] में सब मनोरथों
को पाता है, सब मनोरथों को पाता है ॥ १८ ॥
भावार्थ :--बड़े बड़ों की आदरपूर्वक सम्मति मानने से मनुष्य के मनोरथ सिद्ध
होते हैं ॥ १८ ॥
कण्डिका १९ ॥
यो वै सदस्यान् गन्धर्वान् वेद, न सदस्यामार्ट्तिमार्च्छति । सदः प्रसृप्सन् ब्रूयादु-
पद्रष्ट्रे नम इति, अग्निर्वे द्रष्टा, तस्मा उ एवात्मानं परिदधाति सर्वमायुरेति न पुरा
जरसः प्रमीयते, य एवं वेद । १ । सदः प्रसृप्य ब्रूयादुपश्रोत्रे नम इति । वायुर्वा उपश्रोता,
तस्मा उ एवात्मानं परिदधाति सर्वमायुरेति न पुरा जरसः प्रमीयते, य एवं वेद । २ ।
सदः प्रसर्पन् ब्रूयात्, अनुख्यात्रे नम इति आदित्यो वा अनुख्याता तस्मा उ एवात्मानं
परिदधाति सर्वमायुरेति न पुरा जरसः प्रमीयते, य एवं वेद । ३ । सदः प्रसृप्तो ब्रूयात्,
उपद्रष्ट्रे नम इति । ब्राह्मणो वा उपद्रष्टा, तस्मा उ एवात्मानं परिदधाति सर्वमायुरेति
न पुरा जरसः प्रमीयते, य एवं वेद । ४ । एते वै सदस्या गन्धर्वाः । स य¹ एवमेतान्
सदस्यान् गन्धर्वान्विद्वान् सदः प्रसर्पति, स सदस्यामार्तिमार्च्छति । अथ यो विद्वान्
सञ्चरति, न सदस्यामार्तिमार्च्छति । एतेन ह स्म वा अङ्गिर²सः सर्वं सदः पर्य्याहुः,
ते न सदस्यामार्त्तिमार्च्छन्ति । अथ यान् कामयेत न सदस्यामार्त्तिमार्च्छेयुरिति, तेभ्य
एतेन सर्वं सदः परिब्रूयात्ते न सदस्यामार्त्तिमार्च्छन्ति । अथ यं कामयेत प्रमीयेतेति,
तमेतेभ्य आवृश्चेत् प्रमीयते ॥ १६ ॥
कण्डिका १९ ॥ सदस्य गन्धर्वों को नमस्कार ॥
( यः वै सदस्यान् गन्धर्वान् वेद, सदस्याम् आर्त्तिं न आर्च्छति ) जो [ यजमान ]
सदस्य [ यज्ञशाला में बैठने वाले ] गन्धर्वों [ वेदवाणी वा पृथिवी धारण करने वाले विद्वानों ]
को जानता है, वह यज्ञशाला में होने वाली पीड़ा को नहीं पाता है । ( सदः प्रसृप्सन्
ब्रूयात्, उपद्रष्ट्रे नमः इति ) सद [ यज्ञशाला ] में जाना चाहता हुआ [ यजमान ]
बोले-उपद्रष्टा [ अधिक देखने वाले ] को नमस्कार है, ( अग्निः वै द्रष्टा तस्मै उ एव
१६- ( सदस्यान् ) सदसि यज्ञशालायां भवान् ( गन्धर्वान् ) गां वाणीं पृथिवीं
गतिं वा धरतीति गन्धर्वः । कृगृशॄदृभ्यो वः ( उ० १ । १५५ ) गो+धृञ् धारणे—
वप्रत्ययः, गोशब्दस्य गम् । वेदवाणीधारकान् भूमिधारकान् ( उपद्रष्ट्रे )
१. पू. सं. “यः” इति नास्ति ॥ २. पू. सं. ‘आङ्गिरसः’ इति पाठः ॥ सम्पा० ॥

३४८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १६
आत्मानं परिदधाति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न प्रमीयते, यः एवं वेद १ ) अग्नि
ही द्रष्टा [ देखने वाला, ज्योति वाला ] है, उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ]
ही अपने को वह सब प्रकार पुष्ट करता है, पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं
मरता, जो ऐसा जानता है। १। ( सदः प्रसृप्य ब्रूयात्—उपश्रोत्रे॑ नमः इति ) सद
[ यज्ञशाला ] को चलकर वह बोले—उपश्रोता [ बहुत सुनने वाले ] के लिये नमस्कार है।
( वायुः वै उपश्रोता, तस्मै उ एव आत्मानं परिदधाति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा
न प्रमीयते, यः एवं वेद २ ) वायु ही उपश्रोता [ भले प्रकार सुनने वाला, सुनने का
साधन ] है, उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ] ही अपने को वह सब प्रकार
पुष्ट करता है, पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, जो ऐसा जानता
है। २। ( सदः प्रसर्पन् ब्रूयात्, अनुख्यात्रे नमः इति ) यज्ञशाला में आगे को चलता हुआ
वह बोले—अनुख्याता [ निरन्तर प्रसिद्धि करने वाले ] के लिये नमस्कार है। ( आदित्यः
वै अनुख्याता तस्मै उ एव आत्मानं परिदधाति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न
प्रमीयते, यः एवं वेद ३ ) प्रकाशमान सूर्य ही [ अनुख्याता ] प्रसिद्धि करने वाला है,
उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ] ही वह अपने को सब प्रकार पुष्ट करता है,
सम्पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, जो ऐसा जानता है। ३ । ( सदः
प्रसृतः ब्रूयात्, उपद्रष्ट्रे॑ नमः इति) यज्ञशाला में पहुँचा हुआ वह कहे—उपद्रष्टा [भली भांति
देखने वाले] के लिये नमस्कार है। (ब्राह्मणः वै उपद्रष्टा तस्मै उ एव आत्मानं परिदधाति,
सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न प्रमीयते, यः एवं वेद ४ ) ब्राह्मण [ वेदवेत्ता ब्रह्मा ]
ही उपद्रष्टा है, उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ] ही वह अपने को सब प्रकार
पुष्ट करता है, सम्पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, फिर जो ऐसा जानता
है। ४। ( एते वै सदस्याः गन्धर्वाः ) यह ही सदस्य [ यज्ञशाला में बैठने वाले ] गन्धर्व
[ वेदवाणी वा पृथिवी के धारण करने वाले ] हैं। ( सः यः एवम् एतान् सदस्यान्
गन्धर्वान् अविद्वान् सदः प्रसर्पति, सः सदस्याम् आर्त्तिम् आर्च्छति) फिर जो इस प्रकार इन
सदस्य गन्धर्वों को न जानता हुआ पुरुष यज्ञशाला में घुस जाता है, वह यज्ञशाला सम्बन्धी
पीड़ा पाता है। ( अथ यः विद्वान् सञ्चरति सदस्याम् आर्त्तिम् न आर्च्छति ) फिर जो
[ इनको ] जानता हुआ पुरुष [ यज्ञशाला में ] चलता है, वह यज्ञशाला सम्बन्धी पीड़ा
नहीं पाता। ( एतेन ह स्म वै अङ्गिरसः सर्वं सदः पर्य्याहुः, ते सदस्याम् आर्तिं न
आर्च्छन्ति ) इस [ व्यवहार ] से ही आङ्गिरस [ वेदवेत्ता लोग ] सब यज्ञशाला का बखान
करते हैं, वे यज्ञ सम्बन्धी पीड़ा नहीं पाते। ( अथ यान् कामयेत सदस्याम् आर्तिं न
आर्च्छेयुः इति, तेभ्यः एतेन सर्वं सदः परिब्रूयात्, ते सदस्याम् आर्तिं न आर्च्छन्ति )
फिर वह जिन [ पुरुषों ] को चाहे—यह लोग यज्ञशाला सम्बन्धी पीड़ा न पावें—उनसे इस
उप+दृशिर् प्रेक्षणे—तृच् । अधिकदर्शकाय ( परिदधाति ) सर्वतः पोषयति ।
समर्पयति ( प्रमीयते ) प्रम्रियते ( उपश्रोत्रे ) अधिकश्रवणसाधकाय ( अनुख्यात्रे )
निरन्तरख्यापकाय । प्रसिद्धिकारकाय ( अविद्वान् ) अजानन् ( अङ्गिरसः )
वेदवेत्तारः ॥