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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 600 में से

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पृष्ठ 386

३४८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० १६
आत्मानं परिदधाति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न प्रमीयते, यः एवं वेद १ ) अग्नि
ही द्रष्टा [ देखने वाला, ज्योति वाला ] है, उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ]
ही अपने को वह सब प्रकार पुष्ट करता है, पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं
मरता, जो ऐसा जानता है। १। ( सदः प्रसृप्य ब्रूयात्—उपश्रोत्रे॑ नमः इति ) सद
[ यज्ञशाला ] को चलकर वह बोले—उपश्रोता [ बहुत सुनने वाले ] के लिये नमस्कार है।
( वायुः वै उपश्रोता, तस्मै उ एव आत्मानं परिदधाति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा
न प्रमीयते, यः एवं वेद २ ) वायु ही उपश्रोता [ भले प्रकार सुनने वाला, सुनने का
साधन ] है, उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ] ही अपने को वह सब प्रकार
पुष्ट करता है, पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, जो ऐसा जानता
है। २। ( सदः प्रसर्पन् ब्रूयात्, अनुख्यात्रे नमः इति ) यज्ञशाला में आगे को चलता हुआ
वह बोले—अनुख्याता [ निरन्तर प्रसिद्धि करने वाले ] के लिये नमस्कार है। ( आदित्यः
वै अनुख्याता तस्मै उ एव आत्मानं परिदधाति, सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न
प्रमीयते, यः एवं वेद ३ ) प्रकाशमान सूर्य ही [ अनुख्याता ] प्रसिद्धि करने वाला है,
उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ] ही वह अपने को सब प्रकार पुष्ट करता है,
सम्पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, जो ऐसा जानता है। ३ । ( सदः
प्रसृतः ब्रूयात्, उपद्रष्ट्रे॑ नमः इति) यज्ञशाला में पहुँचा हुआ वह कहे—उपद्रष्टा [भली भांति
देखने वाले] के लिये नमस्कार है। (ब्राह्मणः वै उपद्रष्टा तस्मै उ एव आत्मानं परिदधाति,
सर्वम् आयुः एति, जरसः पुरा न प्रमीयते, यः एवं वेद ४ ) ब्राह्मण [ वेदवेत्ता ब्रह्मा ]
ही उपद्रष्टा है, उसके लिये [ उसके समान बल पाने के लिये ] ही वह अपने को सब प्रकार
पुष्ट करता है, सम्पूर्ण आयु पाता है, और बुढ़ापे से पहिले नहीं मरता, फिर जो ऐसा जानता
है। ४। ( एते वै सदस्याः गन्धर्वाः ) यह ही सदस्य [ यज्ञशाला में बैठने वाले ] गन्धर्व
[ वेदवाणी वा पृथिवी के धारण करने वाले ] हैं। ( सः यः एवम् एतान् सदस्यान्
गन्धर्वान् अविद्वान् सदः प्रसर्पति, सः सदस्याम् आर्त्तिम् आर्च्छति) फिर जो इस प्रकार इन
सदस्य गन्धर्वों को न जानता हुआ पुरुष यज्ञशाला में घुस जाता है, वह यज्ञशाला सम्बन्धी
पीड़ा पाता है। ( अथ यः विद्वान् सञ्चरति सदस्याम् आर्त्तिम् न आर्च्छति ) फिर जो
[ इनको ] जानता हुआ पुरुष [ यज्ञशाला में ] चलता है, वह यज्ञशाला सम्बन्धी पीड़ा
नहीं पाता। ( एतेन ह स्म वै अङ्गिरसः सर्वं सदः पर्य्याहुः, ते सदस्याम् आर्तिं न
आर्च्छन्ति ) इस [ व्यवहार ] से ही आङ्गिरस [ वेदवेत्ता लोग ] सब यज्ञशाला का बखान
करते हैं, वे यज्ञ सम्बन्धी पीड़ा नहीं पाते। ( अथ यान् कामयेत सदस्याम् आर्तिं न
आर्च्छेयुः इति, तेभ्यः एतेन सर्वं सदः परिब्रूयात्, ते सदस्याम् आर्तिं न आर्च्छन्ति )
फिर वह जिन [ पुरुषों ] को चाहे—यह लोग यज्ञशाला सम्बन्धी पीड़ा न पावें—उनसे इस
उप+दृशिर् प्रेक्षणे—तृच् । अधिकदर्शकाय ( परिदधाति ) सर्वतः पोषयति ।
समर्पयति ( प्रमीयते ) प्रम्रियते ( उपश्रोत्रे ) अधिकश्रवणसाधकाय ( अनुख्यात्रे )
निरन्तरख्यापकाय । प्रसिद्धिकारकाय ( अविद्वान् ) अजानन् ( अङ्गिरसः )
वेदवेत्तारः ॥