गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका १७॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७ ४४५
८—बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य । धत्तं रयिं
स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः--अथर्व० २०। १७। १२,
ऋ० ७। ६७। १०॥ (बृहस्पते) हे बृहस्पते ! [ बड़ी वेदवाणी के रक्षक विद्वान् ]
(च) और (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [ महाप्रतापी राजन् ] (युवम्) तुम दोनों (दिव्यस्य)
आकाश के (उत) और । पार्थिवस्य) पृथिवी के (वस्वः) धन के (ईशाथे) स्वामी
हो । (स्तुवते) स्तुति करते हुये (कीरये) विद्वान् को (रयिम्) धन को (चित्)
अवश्य (धत्तम्) तुम दोनों दो, [हे वीरो!] [यूयम्] तुम सब (स्वस्तिभिः) सुखों
के साथ (सदा) सदा (नः) हमें (पात) रक्षित रखो ॥
कण्डिका १७॥
अथ यदैन्द्रावैष्णवमच्छावाकस्योक्थं भवति इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा
सोमं यातं द्रविणो दधानेत्यृचाभ्यनूक्तम् । मद्धद्धि तृतीयसवनम् । अधा हीन्द्र गिर्वण
इयन्त इन्द्र गिर्वण इत्यच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ। ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्प-
रीत्युक्थमुखम्। तस्योक्तं ब्राह्मणं, नूमत्तर्त्तो दयते सनिष्यन्निति वैष्णवं सांशंसिकम्।
अहञ्चेति विष्णुरब्रवीत्, देवतयोः संशंसायानतिशंसाय। सं वां कर्मणा समिषा
हिनोमीति पर्यास ऐन्द्रावैष्णवे। ऐन्द्रावैष्णवमस्यैतन्नित्यमुक्थम्। तदेतत् स्व-
स्मिन्नायतने स्वस्यां प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठापयति । द्वन्द्वं वा एता देवता भूत्वा व्यजयन्त
विजित्या एव। अथो द्वन्द्वस्यैव मिथुनस्य प्रजात्या उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे
इत्यैन्द्रावैष्णव्यर्चा परिदधाति, इन्द्राविष्णोरेव यज्ञं प्रतिष्ठापयति । इन्द्राविष्णू
पिबतं मध्वो अस्येति यजति। एते एव तद्देवते यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्यानु-
वषट्करोति । प्रत्येवाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति न ह्यानाराशंसाः सीदन्ति ॥ १७ ॥
कण्डिका १७ ॥ एकाह यज्ञ के तृतीयसवन के उक्थ में
अच्छावाक ऋत्विज् के मन्त्र ॥
(अथ यत् अच्छावाकस्य ऐन्द्रावैष्णवम् उक्थं भवति) फिर जो अच्छावाक
[ अच्छे बोलने वाले ऋत्विज् ] का इन्द्र और विष्णु [ मन और कान—क० ११ ] देवता
वाला उक्थ [ स्तोत्र ] होता है [ उसका वर्णन ] । (इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा
सोमं यातं द्रविणो दधाना••••••इति ऋचा अभ्यनूक्तम्) इन्द्राविष्णू मदपती …
१—इस ऋचा करके अनुकूल कहा गया है। (मद्धद्धि तृतीयसवनम्) हर्ष युक्त [ अथवा
मद शब्द वाला ] ही तृतीय सवन है। (अधा हीन्द्र गिर्वणः · इयं त इन्द्र गिर्वणः••• इति
अच्छावाकस्य स्तोत्रियानुरूपौ) अधा हि इन्द्र गिर्वणः•••• २—और, इयं ते इन्द्र
१७—(इन्द्राविष्णू) वायुविद्युताविव सभासेनेशौ (मदपती) आनन्दस्य
पालको (मदानाम्) आनन्दानाम् (सोमम्) ऐश्वर्य्यम् (आ यातम्) आगच्छतम्
(द्रविणो) द्रविणा उ इति पदद्वयमेकीभूय द्रविणो इति सिद्धम् । द्रविणा
द्रविणानि धनानि उ अपि (दधाना) दधानौ । धरन्तौ (अद्य) अद्य । सम्प्रति
(हि) एव (गिर्वणः) स्तुतिभिः सेवनीय (ऋतुः) वर्षाकालः (जनित्री)
४४६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७
गिर्वणः...... ३-यह दो मन्त्र अच्छावाक के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। (ऋतुर्जनित्री तस्या
अपस्परि...... इति उक्थमुखम्) ऋतुः जनित्री तस्याः अपः परि......४-यह मन्त्र
[अच्छावाक का] उक्थमुख है। (तस्य उक्तं ब्राह्मणम्) उसका ब्राह्मण कहा गया है।
(नु मर्त्तो दयते सनिष्यन्...... इति वैष्णवं सांशंसिकम्) नु मर्त्तः दयते सनिष्यन्......
५--यह मन्त्र विष्णु देवता वाला सांशंसिक [यथार्थ प्रशंसा युक्त उक्थ] है। (अहं च
इति विष्णुः अब्रवीत्, देवतयोः संशंसनाय अनतिशंसनाय) और मैं-यह विष्णु ने कहा
[क० ११], वह देवताओं की यथार्थ प्रशंसा के लिये है जो अत्युक्ति बिना प्रशंसा हो।
(सं वां कर्मणा समिषा हिनोमि......, इति ऐन्द्रावैष्णवे पर्य्यासः) सं वां
कर्मणा......६-यह मन्त्र इन्द्र और विष्णु वाले [उक्थ] में पर्यास [अन्त] है। (अस्य
ऐन्द्रावैष्णवम् एतत् नित्यम् उक्थम्) इस [अच्छावाक] का इन्द्र और विष्णु देवता
वाला यह नित्य उक्थ है। (तत् एतत् स्वस्मिन् आयतने स्वस्यां प्रतिष्ठायां
प्रतिष्ठापयति) सो यह [उक्थ] अपने स्थान में और अपनी प्रतिष्ठा में [यजमान को]
स्थापित करता है। (एताः देवताः द्वन्द्वं वै भूत्वा विजित्यै एव व्यजयन्त) इन सब
देवताओं ने दो दो होकर विजय के लिये ही विजय पाया है। (अथो द्वन्द्वस्य एव
मिथुनस्य प्रजात्यै) फिर दो दो [देवता] वाले ही मिथुन [ज्ञान वा जोड़ा] की
उत्पत्ति के लिये है। (उभा जिग्यथुर्न पराजयेथे ...इति ऐन्द्रावैष्णव्या ऋचा
परिदधाति) उभा जिग्यथुः न...... ७-इस इन्द्र और विष्णु वाली ऋचा से वह परिधानीया
इष्टि करता है। (इन्द्राविष्णोः एव यज्ञं प्रतिष्ठापयति) इन्द्र और विष्णु के यज्ञ को
वह स्थापित करता है। (इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य ...इति यजति) इन्द्रा-
विष्णू पिबतम् ...८--इस मन्त्र से वह याज्या आहुति देता है। (एते एव देवते
तत् यथाभागं प्रीणाति वषट्कृत्य अनुवषट्करोति) इन ही दो देवताओं को उससे
अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता है और वषट्कार करके अनुवषट्कार [अन्तिम
आहुति दान] करता है। (प्रत्ति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति
न हि सीदन्ति) वे [ऋषि लोग] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं-नरों [नेताओं] की स्तुति
जनयित्री। जननी (अपः) जलानि (परि) सर्वतः (नु) शीघ्रम् (मर्त्तः)
मनुष्यः (दयते) धनमादत्ते (सनिष्यन्) सर्वधातुभ्यः इन् (उ० ४।११८)
षणु दाने--इन्। सुप आत्मनः क्यच् (पा० ३।१।८) सनि--क्यच् लालसायां
सुगागमः, ततः शतृ ।१ दातव्यधनमिच्छन् (सम्) सम्यक् (वाम्) युवाम्
(कर्मणा) ईप्सिततमेन व्यापारेण (इषा) अन्नेन (हिनोमि) वर्धयामि (उभा)
उभौ। इन्द्राविष्णू (जिग्यथुः) लिटि रूपम्। युवां जितवन्तौ शत्रून् (न)
निषेधे (पराजयेथे) पराजयं प्राप्नुथः (मध्वः) मधुरस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥
१. रूपसिद्धि की प्रक्रिया के इतने लम्बे व्यायाम की अपेक्षा लृडन्त सन् धातु से 'लुटः
सद्वा' के नियम के अनुसार शतृ प्रत्यय होकर प्रथमा के एकवचन में 'सनिष्यन्' बनाना
अधिक श्रेयस्कर है ॥ सम्पा० ॥
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७ ॥ ४४७
बिना यज्ञ [ यजमान का ] न बढ़ाते हैं और नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते है। देखो
क० ३ ] ॥ १७ ॥
भावार्थः-कण्डिका १५ के समान है ॥ १७ ॥
विशेषः १-( मदयती ) के स्थान पर ( मदपती ) और ( अपसस्परि )
के स्थान पर ( अपस्परि ) वेद मन्त्र से शोधा है ॥
विशेषः २-प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१-इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना । सं
वामञ्जन्त्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः-ऋग्० ६ । ६९ । ३ ॥
( इन्द्राविष्णू ) हे इन्द्र और विष्णु [ वायु और विजुली के समान सभापति और सेनापति ]
( मदानाम् ) आनन्दों के बीच ( मदपती ) आनन्द के पालने वाले और ( द्रविणो )
धनों के भी ( दधाना ) धारण करने वाले तुम दोनों ( सोमम् ) ऐश्वर्य को ( आ यातम् )
प्राप्त होओ । ( मतीनाम् ) मनुष्यों के ( शस्यमानासः ) बोले हुये ( स्तोमासः ) स्तोम
[ स्तुति व्यवहार ] ( अक्तुभिः ) तेजों और ( उक्थैः ) वेद स्तोत्रों के साथ ( वाम् )
तुम दोनों को ( सं सम् अञ्जन्तु ) बहुत अच्छे प्रकार प्रकट करें ।
२-अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान् महः ससृज्महे । उदेव यन्त
उदभिः-अथर्व० २० । १०० । १, ऋ० ८ । ६८ । ७, [ सायण भाष्य ८७ ]
साम० उ० १ । १ । तृच २३ ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ( इन्द्र ) इन्द्र !
[ महाप्रतापी राजन् ] ( अध हि ) अब ही ( त्वा ) तुझे ( महः ) अपनी बड़ी
( कामान् ) कामनाओं को, ( उदा ) जल [ जल की बाढ़ ] के पीछे ( उदभिः ) दूसरे
जलों की बाढ़ों के साथ ( यन्तः इव ) चलते हुये पुरुषों के समान हमने ( उप, ) अंदर से
( ससृज्महे ) समर्पण किया है ॥
३-इयं त इन्द्र गिर्वणो रातिः क्षरति सुन्वतः । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि
राजसि-ऋ० ८ । १३ । ४ ॥ ( गिर्वणः ) हे स्तुतियों से सेवनीय ( इन्द्र ) इन्द्र !
[ महाप्रतापी राजन् ] ( ते ) तेरे लिये ( सुन्वतः ) तत्त्वरस निचोड़ने वाले पुरुष की
( इयम् ) यह ( रातिः ) दान क्रिया ( क्षरति ) बहती है, ( मन्दानः ) हर्ष करता हुआ
तू ( अस्य बर्हिषः ) इस वृद्धि कारक व्यवहार का ( वि ) विशेष करके ( राजसि )
राजा है ॥
४-ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्परि मक्षू जात आविशद्यासु वर्धते । तदाहना
अभवत् पिप्युषी पयोऽशोः पीयूषं प्रथमं तदुक्थ्यम्-ऋ० २ । १३ । १ ॥ ( ऋतुः )
ऋतु [ वर्षाकाल ] ( जनित्री ) [ प्रत्येक पदार्थ की ] जननी है, ( तस्याः परि ) उस
[ जननी ] से ( जातः ) उत्पन्न होकर वह [ पदार्थ ] ( मक्षू ) शीघ्र ( अपः ) जलों में
( आ अविशत् ) सब प्रकार से प्रवेश करता है, ( यासु ) जिन [ जलों ] में ( वर्धते )
वह बढ़ता है । ( तत् ) इससे वह [ पदार्थ ] ( आहनाः ) पाने योग्य ( अभवत् ) होता
है, और ( पयः ) रस की ( पिप्युषी ) बढ़ाने वाली [ वह जननी ऋतु होती है ] । ( तत् )
४४८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७
तब ( अंशोः ) अंशु [ ओषधि के डांठल ] का ( पीयूषम् ) पीने योग्य रस ( प्रथमम् )
मुख्य करके ( उक्थ्यम् ) प्रशंसनीय [ अथवा उक्थ नामक यज्ञ के योग्य ] होता है ॥
५—नू मर्तो दयते सनिष्यन् यो विष्णव उरुगायाय दाशत् । प्र यः सत्राचा
मनसा यजात एतावन्तं नर्यमा विवासान्--ऋग्० ७ । १०० । १ ॥ ( सनिष्यन् )
भक्ति चाहता हुआ ( मर्तः ) वह मनुष्य ( नु ) शीघ्र ( दयते ) [ मनोरथ ] पाता है,
( यः ) जो ( उरुगायाय ) बहुत गाने योग्य ( विष्णवे ) विष्णु [ व्यापक परमात्मा ] को
( दाशत् ) देवे [ आत्मदान करे ] और ( यः ) जो ( सत्राचा ) सत्य को प्राप्त हुये
( मनसा ) मन से ( एतावन्तम् ) इतने बड़े ( नर्यम् ) नरों के हितकारी [ विष्णु ] को
( प्र यजाते ) अच्छे प्रकार पूजे और ( आबिवासात् ) सब ओर से सेवे ॥
६-सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य । जुषेथां
यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता- ऋ० ६ । ६६ । १ ॥ ( इन्द्रा-
विष्णू ) हे इन्द्र और विष्णु [ सूर्य और बिजुली के समान सभापति और सेनापति ]
( वाम् ) तुम दोनों को ( अस्य ) इस ( अपसः पारे ) कर्म के पार में ( कर्मणा )
अत्यन्त चाहे हुये व्यापार और ( इषा ) अन्न से ( सं मं हिनोमि ) मैं बढ़ाता हूं,
( यज्ञम् ) यज्ञ [ संगति करण व्यवहार ] को ( जुषेथाम् ) सेवो ( च ) और ( नः )
हमको ( अरिष्टैः ) बेरोक ( पथिभिः ) मार्गों से ( पारयन्ता ) पार करते हुये तुम
दोनों ( द्रविणम् ) धन वा यश ( धत्तम् ) दो ॥
७–उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न पराजिग्ये कतरश्च नैनयोः । इन्द्रश्च विष्णो
यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्--अथर्व० ७ । ४४ । १, ऋ० ६ । ६९ ।
८ ॥ ( विष्णो ) हे विष्णु ! [ बिजुली के समान व्याप्त होने वाले सभापति ] ( च )
और ( इन्द्रः ) हे इन्द्र ! [ वायु के समान ऐश्वर्यवान् सेनापति ] ( उभा ) तुम दोनों ने
[ शत्रुओं को ] ( जिग्यथुः ) जीता है, और तुम दोनों ( न ) कभी नहीं ( परा जयेथे )
हारते हो, ( एनयोः ) इन [ तुम ] दोनों में से ( कतरः चन ) कोई भी ( न ) नहीं
( परा जिग्ये ) हारा है । ( यत् ) जब ( अपस्पृधेथाम् ) तुम दोनों ललकारे हो
( तत् ) तब ( सहस्रम् ) असंख्य [ शत्रु सेना दल ] को ( त्रेधा ) तीन विधि पर
[ ऊंचे, नीचे और मध्य स्थान में ] ( वि ) विविध प्रकार से ( ऐरयेथाम् ) तुम दोनों ने
निकाल दिया है ॥
८--इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम् । आ
वामन्धांसि मदिराण्यग्मन्नप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे-ऋग्० ६ । ६६ । ७ ॥
( दस्रा ) हे दुःखनाशक ( इन्द्राविष्णू ) इन्द्र और विष्णु ! [ वायु और बिजुली के समान
अध्यापक और उपदेशक ] तुम दोनों (अस्य ) इस ( मध्वः ) मधुर ( सोमस्य ) सोम
[ ओषधियों के रस ] का ( पिबतम् ) पान करो और ( जठरम् ) पेट को ( आ
पृणेथाम् ) अच्छे प्रकार भरो । ( वाम् ) तुम दोनों को ( मदिराणि ) आनन्द देने वाले
( अन्धांसि ) अन्न ( अगमन् ) प्राप्त हुये हैं, ( मे ) मेरे ( ब्रह्माणि ) स्तोत्रों और
( हवम् ) पुकार को ( उप शृणुतम् ) तुम दोनों समीप से सुनो ॥