गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 486, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें४४८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १७
तब ( अंशोः ) अंशु [ ओषधि के डांठल ] का ( पीयूषम् ) पीने योग्य रस ( प्रथमम् )
मुख्य करके ( उक्थ्यम् ) प्रशंसनीय [ अथवा उक्थ नामक यज्ञ के योग्य ] होता है ॥
५—नू मर्तो दयते सनिष्यन् यो विष्णव उरुगायाय दाशत् । प्र यः सत्राचा
मनसा यजात एतावन्तं नर्यमा विवासान्--ऋग्० ७ । १०० । १ ॥ ( सनिष्यन् )
भक्ति चाहता हुआ ( मर्तः ) वह मनुष्य ( नु ) शीघ्र ( दयते ) [ मनोरथ ] पाता है,
( यः ) जो ( उरुगायाय ) बहुत गाने योग्य ( विष्णवे ) विष्णु [ व्यापक परमात्मा ] को
( दाशत् ) देवे [ आत्मदान करे ] और ( यः ) जो ( सत्राचा ) सत्य को प्राप्त हुये
( मनसा ) मन से ( एतावन्तम् ) इतने बड़े ( नर्यम् ) नरों के हितकारी [ विष्णु ] को
( प्र यजाते ) अच्छे प्रकार पूजे और ( आबिवासात् ) सब ओर से सेवे ॥
६-सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य । जुषेथां
यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता- ऋ० ६ । ६६ । १ ॥ ( इन्द्रा-
विष्णू ) हे इन्द्र और विष्णु [ सूर्य और बिजुली के समान सभापति और सेनापति ]
( वाम् ) तुम दोनों को ( अस्य ) इस ( अपसः पारे ) कर्म के पार में ( कर्मणा )
अत्यन्त चाहे हुये व्यापार और ( इषा ) अन्न से ( सं मं हिनोमि ) मैं बढ़ाता हूं,
( यज्ञम् ) यज्ञ [ संगति करण व्यवहार ] को ( जुषेथाम् ) सेवो ( च ) और ( नः )
हमको ( अरिष्टैः ) बेरोक ( पथिभिः ) मार्गों से ( पारयन्ता ) पार करते हुये तुम
दोनों ( द्रविणम् ) धन वा यश ( धत्तम् ) दो ॥
७–उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न पराजिग्ये कतरश्च नैनयोः । इन्द्रश्च विष्णो
यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदैरयेथाम्--अथर्व० ७ । ४४ । १, ऋ० ६ । ६९ ।
८ ॥ ( विष्णो ) हे विष्णु ! [ बिजुली के समान व्याप्त होने वाले सभापति ] ( च )
और ( इन्द्रः ) हे इन्द्र ! [ वायु के समान ऐश्वर्यवान् सेनापति ] ( उभा ) तुम दोनों ने
[ शत्रुओं को ] ( जिग्यथुः ) जीता है, और तुम दोनों ( न ) कभी नहीं ( परा जयेथे )
हारते हो, ( एनयोः ) इन [ तुम ] दोनों में से ( कतरः चन ) कोई भी ( न ) नहीं
( परा जिग्ये ) हारा है । ( यत् ) जब ( अपस्पृधेथाम् ) तुम दोनों ललकारे हो
( तत् ) तब ( सहस्रम् ) असंख्य [ शत्रु सेना दल ] को ( त्रेधा ) तीन विधि पर
[ ऊंचे, नीचे और मध्य स्थान में ] ( वि ) विविध प्रकार से ( ऐरयेथाम् ) तुम दोनों ने
निकाल दिया है ॥
८--इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम् । आ
वामन्धांसि मदिराण्यग्मन्नप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे-ऋग्० ६ । ६६ । ७ ॥
( दस्रा ) हे दुःखनाशक ( इन्द्राविष्णू ) इन्द्र और विष्णु ! [ वायु और बिजुली के समान
अध्यापक और उपदेशक ] तुम दोनों (अस्य ) इस ( मध्वः ) मधुर ( सोमस्य ) सोम
[ ओषधियों के रस ] का ( पिबतम् ) पान करो और ( जठरम् ) पेट को ( आ
पृणेथाम् ) अच्छे प्रकार भरो । ( वाम् ) तुम दोनों को ( मदिराणि ) आनन्द देने वाले
( अन्धांसि ) अन्न ( अगमन् ) प्राप्त हुये हैं, ( मे ) मेरे ( ब्रह्माणि ) स्तोत्रों और
( हवम् ) पुकार को ( उप शृणुतम् ) तुम दोनों समीप से सुनो ॥