चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६५
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ४६५
दन्तीतृवृत्त्र्यूषणचित्रकैर्वा पयः शृतं दोषहरं पिबेन्ना ।
द्विप्रस्थमात्रं च पलार्धिकैस्तैरर्धावशिष्टं पवने सपित्ते ॥ २४ ॥
(४) वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे-दन्ती, निशोथ, सोठ, मरिच,
पिप्पली और चीता इनके चूर्ण के साथ दूध पका कर पीवे । दन्ती आदि
प्रत्येक का आधा २ पल लेकर दूध दो प्रस्थ पकावे । जब आधा रह जाये
तब इस दूध को पिये यह दूध दोषनाशक है ॥ २४ ॥
सशुण्ठि पीतद्रुरसं प्रयोज्यं श्यामोरुबूकोपषणसाधितं वा ।
त्वग्दारुवर्षाभूमहौषधैर्वा गुडूचिकानागरदन्तिभिर्वा ॥ २५ ॥
(५) चार योग—(१) साठ, पीतद्रु (हल्दू) इनके क्वाथ से साधित
दूध । (२) श्यामा (निशोथ), एरण्ड इनको मूल और ऊषण (मरिच)
इनसे साधित । (३) दालचीनी, देवदार (या दारुहल्दी), पुनर्नवा और
सोठ इनसे साधित दूध । (४) गिलोय, सोठ और दन्ती इनसे साधित दूध
वातजन्य और पित्तजन्य शोथ मे पीना चाहिये । प्रत्येक द्रव्य आधा पल, दूध
दो प्रस्थ जब आधा रह जाये तब प्रयोग करे ॥ २५ ॥
सप्ताहमौष्ट्रं त्वथवाऽपि मासं पयः पिबेद्भोजनवारिवर्जी ।
गव्यं समूत्रं महिषीपयो वा क्षीराशनं मूत्रमथो गवा वा ॥२६॥
(६) भोजन और पानी छोड़ कर सात दिन तक अथवा एक मास तक
केवल ऊटनी का दूध पीवे । अथवा गाय का मूत्र और भैंस का दूध पीवे
अथवा केवल गाय या भैंस के दूध वा मूत्र पर ही गुजारा करे ॥ २६ ॥
तक्रं पिबेद्वा गुरुभिन्नवर्चाः सव्योषसौवर्चलमाक्षिकं वा ।
गुडामया वा गुडनागरां वा सदोपभिन्नामविबद्धवर्चाः ॥ २७ ॥
(७) शोथ रोगी को अतिसार और भारीपन हो तो सोठ, मरिच, पिप्पली,
संचल नमक और शहद के साथ तक्र (मठा) पीवे । यदि रोगी का दोष के
कारण या आम से युक्त मल आता हो तो हरड़ और गुड को समान मात्रा मे
अथवा सोठ और गुड को समान भाग मे लेकर खावे ॥ २७ ॥
विड्वातसङ्गे पयसा रसैर्वा प्राग्भुक्तमद्यादुरुबूकतैलम् ।
स्रोतोविबन्धेऽग्निरुचिप्रणाशे मद्यान्यरिष्टांश्च पिबेत्सुजातान् ॥२८॥
(८) यदि वायु और मल का अवरोध हो तो भोजन से पूर्व मास रस या
दूध के साथ एरण्ड तैल पीवे । स्रोतो के रुकने पर, जाठराग्नि मन्द और भोजन
की इच्छा न हो तो अच्छी प्रकार बने अरिष्टो का पान करे ॥ २८ ॥
गण्डीरभल्लातकचित्रकाश्च व्योषं विडङ्गं बृहतीद्वयं च ।
द्विप्रस्थिकं गोमयपावकेन द्रोणे पचेत्कूर्चिकमस्तुनस्तु ॥ २९ ॥
४६६ चरकसंहिता [ अ० १२
त्रिभागशेषं तु सुपूतशीतं द्रोणेन तत्राकृतमस्तुना च।
सितोपलायाश्च शतेन युक्तं लिप्ते घटे चित्रकपिप्पलीभ्याम् ॥३०॥
वैहायसे स्थापितमादशाहात्प्रयोजयस्तद्विनिहन्ति शोफान् ।
भगन्दराशः क्रिमिकुष्ठमेहान्वैवर्ण्यकार्श्यानिलहिक्कनं च ॥ ३१ ॥
इति गण्डीराद्यरिष्टः ।
(६) गण्डीराद्यरिष्ट—गण्डीर (रामठ), भलावा, चित्रक, सोंठ, मरिच,
पिप्पली, बडी आर छोटी कटेरी के फल प्रत्येक दो प्रस्थ काटकर छोटे २ टुकड़े
कर लेवे। कांजी और मस्तु का एक द्रोण लेकर उपलो की आग पर पकावे।
जब एक तृतीयांश रह जाय तब वस्त्र से छान कर शीतल कर ले। उसमे प्राकृत
मस्तु (दधि मस्तु) का एक द्रोण और मिश्री १०० पल मिला देवे। फिर
चित्रक और पिप्पली का बडे से लेप करके उस घट मे इसको रख दे। फिर
इस घडे को दस दिन तक खुले आकाश मे लटकते हुए छिके पर रख देवे।
पीछे से जब इसमे गन्ध आ जाये तब इसको बरते। इस अरिष्ट के प्रयोग से
भगन्दर, शाफ अर्श, कमि, कुष्ठ, प्रमेह, विवर्णता, कृशता ओर वातज हिचकी
नष्ट होती है१ ॥ २६-३१ ॥
काश्मर्यधात्रीमरिचाभयाना द्राक्षाफलाना च सपिप्पलीनाम् ।
शत शतं क्षौद्रगुडात्पुराणात्तुला तु२ कुम्भे मधुना प्रलिप्ते ॥ ३२ ॥
सप्ताहमुष्णे द्विगुणं तु शीते स्थितं जलद्रोणयुतं पिबेन्न। ।
शोफान्विबन्धन्कफवातजांश्च स हन्त्यरिष्टोऽष्टशतोऽग्निकृच्च ॥ ३३ ॥
इत्यष्टशतोऽरिष्टः ।
(१०) अष्टशतारिष्ट—गम्भारी, आवला, मरिच, हरड़, बहेड़ा, द्राक्षा
इनके फल और पिपली प्रत्येक सो, पुराना क्षुद्रगुड़ (राब) १ तुला (१००
पल) इनको एक द्रोण पानी मे मिलाकर मधु से लिपे हुए घडे मे डाल कर
ग्रीष्म-ऋतु मे सात दिनों तक और शीत ऋतु मे १५ दिन तक रख देवे३।
१ अष्टागसंग्रह मे यही योग भल्लातकारिष्ट के नाम से दिया है उसमे
गण्डीर का योग नही है —
'भल्लातकचित्रकविडङ्गबृहतीफलानि पृथग् द्विप्रस्थाशान्यच्छधान्याम्व्ळद्रोणे
गोमयाग्निना पक्वमित्यादि । २ 'जीर्णगुडात्तुलाच सक्षुद्र' इति पाठः ।
३ वाग्भट में—त्रिफलामरिचद्राक्षापिप्पलीकाश्मर्यफलानां प्रत्येक शतं गुड-
तुलामूदकद्रोण च मधुलिप्तभाजनस्थ सप्ताहमुष्णे काले धारयेत् ॥ (अष्टागसग्रह,
चिकि० १६) ।
अ० १२ ] ३२ चिकित्सितस्थानम् ४९७
इसके बन जाने पर इसके पीने से शोफ, कफ और वातजन्य विबन्ध ( कब्ज )
नष्ट होते हैं, तथा यह अष्टशत-अरिष्ट अग्निवर्धक है ॥३२-३३॥
पुनर्नवे द्वे च बले सपाठे दन्ती गुडूचीमथ चित्रकं च ।
निदिग्धिकां च त्रिपलानि पक्त्वा द्रोणावशेषे सलिले ततस्तम् ॥३४॥
पूत्वा रसं द्वे च गुडात्पुराणात्तुले मधुप्रस्थयुतं सुशीतम् ।
मासं निदध्याद् घृतभाजनस्थं पलो यवाना परतस्तु मासात् ॥३५॥
चूर्णीकृतैरर्धपलाशिकैस्तं पत्रत्वगेलामरिचाम्बुलोहैः ।
गन्धान्वितं क्षौद्रघृतप्रदिग्धं जीर्णे पिबेद् व्याधिबलं समीक्ष्य ॥३६॥
हृत्पाण्डुरोगं श्वयथुं प्रवृद्धं प्लीहाभ्रमारोचकमेहगुल्मान् ।
भगन्दरं षड्जठराणि कासं श्वासं ग्रहण्यामयकुष्ठकण्डूः ॥ ३७ ॥
शाखानिलं बद्धपुरीषता च हिक्कां किलासं च हलीमकं च ।
क्षिप्रं जयेद् वर्णबलायुरोजस्तेजोन्वितो मांसरसान्नभोजी ॥ ३८ ॥
इति पुनर्नवाद्यरिष्टः ।
( ११ ) पुनर्नवाद्यरिष्ट—श्वेत और लाल दोनो पुनर्नवा, बला और अति-
बला, पाठा, वासा, गिलोय, चीता, छोटी कटेरी ओर आवला, बहेड़ा, हरड़
प्रत्येक तीन पल लेकर चार द्रोण पानी मे क्वाथ करे । एक द्रोण रहने पर इसको
छान लेवे । इसमे पुराना गुड़ २०० पल, ठण्डा होने पर मधु १ प्रस्थ, नाग-
केसर, दालचीनी, इलायची, मरिच, बालक और तेजपात प्रत्येक आधा पल
मिलाकर, घी और मधु से लिप्त घड़े मे डालकर जौ के ढेर मे एक मास तक
दबा कर रख दे । एक मास के पीछे जब गन्ध रसादि उत्पन्न हो जायें तो प्रातः
काल ( प्रथम दिन के भोजन जीर्ण होने पर ) पीवे । इसकी मात्रा रोग और
बल के अनुसार लेवे । इस अरिष्ट के जीर्ण होने पर मास-रस के साथ अन्न खाने
वाले व्यक्ति के हृदय रोग, पाण्डु, शोथ, प्लीहा, ज्वर, अरोचक, प्रमेह, गुल्म,
भगन्दर, छ प्रकार के उदररोग, कास, श्वास, ग्रहणी, कुष्ठ, कण्डु, शाखा
( हाथ-पाव ) की वायु, विड्विबन्ध ( कब्ज ), हिचकी, किलास ( श्वेत कुष्ठ ),
हलीमक-रोग शीघ्र नष्ट होते हैं, रोगी का वर्ण बल, आयु और तेज
बढ़ते है ॥ ३४-३८ ॥
फलत्रिकं दीव्यकचित्रकौ च सपिप्पली लोहरजो विडङ्गम् ।
चूर्णीकृत कौडबिकं द्विरंशं क्षौद्रं पुराणस्य तुलां गुडस्य ।
४६८ चरकसंहिता [ अ० १२
मासं निदध्याद् घृतभाजनस्थं यवेषु तानेव निहन्ति रोगान् ॥३६॥
इति फलत्रिकाद्यरिष्टः ।
( १२ ) त्रिफलाद्यरिष्ट—त्रिफला दीप्यक ( अजवायन ), चीता, पिप्पली,
लोह भस्म, वायविडग प्रत्येक द्रव्य १ कुडव (चार पल), मधु ८ पल, पुराना
गुड १०० पल, पानी एक द्रोण इन सब को घी से भावित घड मे डालकर एक
मास तक जौ की राशि मे रख दे । इन अरिष्ट के बन जाने पर इसको पीवे ।
[ जीर्ण होने पर पूर्ववत् मास-रस के साथ अन्न भोजन करे ] । यह अरिष्ट भी
उपरोक्त रोगो को नष्ट करता है ॥३६॥
ये चार्शसा पाण्डुविकारिणा च प्रोक्ताः शुभाः शोफिषु तेऽप्यरिष्टाः ।
कृष्णा सपाठा गजपिप्पली च निदिग्धिका चित्रकनागरे च ॥ ४० ॥
सपिप्पलीमूलरजन्यजाजी मुस्तं च चूर्णं सुखतोयपीतम् ।
( १३ ) जो अरिष्ट अर्शरोग और पाण्डुरोग मे कहे हैं, वे सब शोफ रोगियो
के लिये भी हितकारी है । पिप्पली, पाठा, गजपिप्पली, छोटी कटेरी, चीता,
सोठ, पिप्पलीमूल, हल्दी, अजाजी ( जीरा ), मोथा इन सब का चूर्ण करके
गरम पानी के साथ पीने से त्रिदोषजन्य और पुरातन शोफ नष्ट होता है ॥४०-॥
हन्यात् त्रिदोष चिरज च शोफं कल्कश्च भूनिम्बमहोौषधस्य ॥४१॥
अयोरजस्त्र्यूषणयावशूक चूर्णं च पीतं त्रिफलारसेन ।
( १४ ) इसी प्रकार चिरायता, सोठ इनका चूर्ण भी गरम पानी के साथ
पीने से पुरातन श.फ को नष्ट करता है । लोह भस्म, सोठ, मरिच, पिप्पली,
यवक्षार इनका चूर्ण त्रिफला क्वाथ के साथ पीने से त्रिदोषजन्य और पुरातन
शोथ नष्ट होता है ॥ ४१- ॥
क्षारद्वयं स्याल्लवणानि चत्वार्ययोरजो व्योषफलत्रिकं च ॥ ४२ ॥
सपिप्पलीमूलविडङ्गसार मुस्ताजमोदामरदारुबिल्वम् ।
कलिङ्गकाश्चित्रकमूलपाठ सयष्टिकं चातिविषं पलाशम् ॥ ४३ ॥
सहिङ्गु कर्षं तु सुसूक्ष्मचूर्णं द्रोणं तथा मूलकशुण्ठकानाम् ।
स्याद्भस्मनस्तत् सलिलेन साध्यमालोड्य यावद् घनम्प्रदग्धम् ॥४४॥
स्त्यानं ततः कोलसमां तु मात्रां कृत्वा सुशुष्कां विधिनोपयुञ्ज्यात् ।
प्लीहोदरश्वित्रहलीमकार्शःपाण्ड्वामयारोचकशोषशोफान् ।
विसूचिकागुल्मगरारमरीश्च सश्वासकासाः प्रणोदेत् सकुष्ठाः ॥४५॥
इति क्षारगुडिका ।
( १५ ) क्षार गुडिका—दो क्षार ( सज्जीखार और जौखार ), चारों नमक