चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ९] चिकित्सास्थानम् ४४५
अ० ९] चिकित्सास्थानम् ४४५
होकर, हृदय को दूषित करके शीघ्र ही अति भयकर, तीव्र, उन्माद का
उत्पन्न करता है।
लक्षण--विना अवसर के ही अमर्ष अर्थात् अक्षमा, क्रोध करना, संरम्भ
(किसी काम मे बहुत जल्दी करना), नगा हो जाना, संतर्जन (भर्त्सना),
अभिद्रवण (भागना), शरीर का उष्ण होना, क्रोध करना, छायायुक्त स्थान की
चाह, शीतल खान-पान की इच्छा का होना, शरीर मे पिलाई की झलक होना,
ये सब पित्तजन्य उन्माद के लक्षण है। इस मे रोग का बल भोजन की जीर्ण-
अवस्था मे अधिक होता है ॥ ११-१२ ॥
संपूर्यैर्मन्दविचेष्टितस्य सोष्मा कफो मर्मणि संप्रवृद्धः ।
बुद्धिं स्मृति चाप्युपहृत्य चित्तं प्रमोहयन्संजनयेद्विकारम् ॥ १३ ॥
वाक्चेष्टितं मन्दमरोचकश्च नारीविविक्तप्रियताऽतिनिद्रा ।
छर्दिश्च लाला च बलं च भुक्ते नखादिशौक्ल्यं च कफात्मके स्यात् ॥१४॥
(३) कफज उन्माद—मन्द चेष्टाशील (प्राय करके शयन, आसन
आदि पर रहने वाले), व्यक्ति के अति भोजन करने से, ऊष्मा अर्थात् उष्णता
की इच्छा सहित कफ, मर्म अर्थात् हृदय मे बढ कर, बुद्धि और स्मृति का
नाश करके चित्त को मोहित कर उन्माद रोग को उत्पन्न करता है१ ।
लक्षण—वाणी और शरीर की चेष्टा का मन्द होना, अरोचक (अरुचि),
स्त्रीसग की चाह, एकान्त, निर्जन स्थान की अभिलाषा, नीद का अधिक आना,
छर्दि और लाला-स्राव, आहार के खाने पर रोग का बल बढना, नख, त्वचा,
मूत्र आदि का श्वेत होना कफोन्माद के लक्षण है ॥ १३-१४ ॥
यः सन्निपातप्रभवोऽतिघोरः सर्वैः समस्तैः स तु हेतुभिः स्यात् ।
सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति तादृग्विरुद्धभेषज्यविधिर्विवर्ज्यः ॥ १५ ॥
(४) सन्निपातजन्य उन्माद—तीनो दोषों से मिलकर उत्पन्न हुआ
उन्माद अति दारुण होता है। इसमे वात आदि तीनो दोष कारण रूप से
सम्मिलित रहते है, इसलिये इसमे सब दोषों के लक्षण भी रहते है। इसमे
चिकित्सा परस्पर विरोधिनी होने के कारण यह असाध्य है ॥ १५ ॥
देवर्षिगन्धर्वपिशाचयक्षरक्षःपितॄणामभिधर्षणानि ।
आगन्तुहेतुर्नियमव्रतादि मिथ्याकृतं कर्म च पूर्वदेहे ॥ १६ ॥
१ कफान्माद मे उष्णता की अभिलाषा होती है। जैसा कि सुश्रुत मे कहा ह—
“निद्रापरोऽल्पकथनोऽल्पभुगुष्णसेवी-
रात्रौ भृश गवति चापि कफप्रयोगात् ।”
४४६ चरकसंहिता [ अ० ६
अमर्त्यवाग्विक्रमवीर्यचेष्टो ज्ञानादिविज्ञानबलादिभिर्यः ।
उन्मादकालोऽनियतश्च यस्य भूतोत्थमुन्मादमुदाहरेत्तम् ॥ १७ ॥
अदूषयन्तः पुरुषस्य देहं देवाद्यः स्वैश्च गुणप्रभावैः ।
विशन्त्यदृश्यास्तरसा यथैव छायायातपौ दर्पणसूर्यकान्तौ ॥ १८ ॥
( ५ ) आगन्तुज उन्माद—देवता, ऋषि, गन्धर्व, पिशाच, यक्ष, राक्षस
( राक्षस और ब्रह्मराक्षस ) और पितर इन आठो ग्रहो का तिरस्कार करना,
नियमपूर्वक व्रतादि का आचरण न करना और पूर्वजन्म मे उत्तम कर्म न होना
ये आगन्तुज उन्माद रोग के कारण है ।
लक्षण—(१) जिस उन्माद-रोगी मे अमानुषीय ( दैवी ), वाणी, पराक्रम,
शूरता, शरीर क्रियाये दिखाई दे, जिसका ज्ञान, बुद्धि, स्मृति, विज्ञान ( शिल्प
सम्बन्धी ज्ञान ), और अमानुषी बल ( मनुष्य सीमा से अधिक ) प्रतीत हो,
जिस उन्माद का काल निश्चय न हो ( कभी प्रात, कभी मध्याह्न और कभी
सायकाल हो ), इस प्रकार के उन्माद को भूतोन्माद जानना चाहिये । जिस
प्रकार अपने गुणो के प्रभाव से दर्पण मे छाया ( प्रतिबिम्ब ) और सूर्य कान्त-
मणि मे सूर्य की किरणे प्रवेश करती है, परन्तु दिखाई नही देती, उसी प्रकार से
देव आदि भी मनुष्य के शरीर को दूषित किये बिना ही अपने गुणों के प्रभाव
से अतिवेग से प्रविष्ट हो जाते है । [ ये वात आदि दोषो के समान शरीर को
दूषित नही करते ] ॥ १६-१८ ॥
आघातकालास्तु सपूर्वरूपाः प्रोक्ता निदानेऽथ सुरादिभिश्च ।
उन्मादरूपाणि पृथङ्निबोध कालं च गम्यान्पुरुषांश्च तेषाम् ॥ १९ ॥
अभिगमनीय पुरुषो पर आघात ( आक्रमण ) के काल और आगन्तुज
उन्माद के पूर्वरूप ये निदान स्थान मे प्रथम कह दिये है । अब देवता आदि
आठो ग्रहो के द्वारा उत्पन्न उन्माद के लक्षण, अभिगमन-काल और यह रोग
जिन पुरुषों को होता है यह सब पृथक् २ सुनो ।
[ यद्यपि देव आदि का प्रवेश दिखाई नही देता तथापि ज्ञान, विज्ञान-
शीलता आदि लक्षणो से इनका अनुमान करना चाहिये ] ॥ १६ ॥
तद्यथा—सौम्यदृष्टि गम्भीरमप्रधृष्यमकोपनमस्वप्नमभोजनाभिला-
षिणमल्पस्वेद-मूत्र-पुरीष-वाचं शुभगन्धं फुल्ल-पद्म-वदनमिति देवोन्मत्तं
विद्यात् ॥ २० ॥
( १ ) देवोन्माद—दृष्टि प्रसन्न ( निर्मल आख ) हो, गम्भीर हो, लज्जाशील
हो, क्रोध से रहित हो, निद्रा से रहित हो, भोजन की अभिलाषा से रहित हो,
थोडे पसीने हो, थोडे ही मूत्र और मल हो, थोड़ा बोले, शोभन गन्ध हो, खिले
हुए कमल के समान विकसित मुख हो, ऐसे लक्षणों वाले पुरुष को देवग्रहो से
उन्मत्त हुआ जाने ॥ २० ॥
गुरुवृद्धसिद्धर्षीणामभिशापाभिचाराभिध्यानानुरूपाहारचेष्टान्याहार
तैरून्मत्तं विद्यात् ॥ २१ ॥
(२) गुरु वृद्ध आदि से उत्पन्न उन्माद—गुरु, वृद्ध, सिद्ध ( इन तीन
ग्रन्भेदो ) और ऋषियो के अभिशाप, अभिचार, और अभिध्यान के अनुकूल
जिस रोगी की चेष्टा आदि हो, उसको गुरु, वृद्ध और सिद्ध ग्रहो से उन्मत्त
हुआ जाने १ ॥ २१ ॥
अप्रसन्नदृष्टिमपश्यन्तं निद्रालु प्रतिहतवाचमनन्नाभिलाषिणमरोच-
काविपाकपरीतं पितृभिरुन्मत्तं विद्यात् ॥ २२ ॥
(३) पित्तग्रह—मलिन दृष्टि, लोगो की ओर आख उठा कर न देखे,
निद्राशील, निरुद्धवाक् (रुक रुक कर बोले ), अन्न की चाह न रखे, परन्तु
पितृभोज्य तिल गुड़ आदि की चाह करे, अरोचक, अविपाक ( मन्दाग्नि ) युक्त
हो, ऐसे पुरुष को पितृग्रहो से उन्मत्त समझे ॥ २२ ॥
चण्डं साहसिकं तीक्ष्णं गम्भीरमप्रधृष्यं मुख-वाद्य-नृत्य-गीतान्न-पान-
स्नान-माल्य-धूप-गन्ध-रति रक्त-वस्त्र-बलि-कर्म-हास्य-कथानुयोगप्रियं शुभ-
गन्धं च गन्धर्वोन्मत्तं विद्यात् ॥ २३ ॥
(४) गन्धर्व-ग्रह—मुख से बाजा बजावे, नाचे, गावे, खान-पान, स्नान,
माला, धूप और सुगन्धित वस्तुओ की चाह करे, लाल वस्त्र, बलिकर्म, हास्य,
कथा ( बातचीत ), अनुयोग ( पूछने की इच्छा ) करे और शुभ गन्ध युक्त हो,
ऐसे मनुष्य को गन्धर्व-ग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २३ ॥
असकृत्स्वप्न-रोदन-हास्यं नृत्य-गीत-वाद्य-पाठ कथान्न-पान-स्नान-
माल्य-धूप-गन्ध-रति रक्त-विप्लुताक्ष द्विजाति-वैद्य-परिवादिनं रहस्य-
भाषिणमिति यक्षोन्मत्तं विद्यात् ॥ २४ ॥
(५) यक्षोन्माद—बार-बार नीद ले, लेटे, रोवे, हसे, नाचे, गावे-बजावे,
पाठ करे, बातचीत, खानपान, स्नान, माला, धूप, गन्ध मे इच्छा रखे, आखे
लाल और भय से चकित हो, ब्राह्मण आदि द्विजो तथा वैद्यो की निन्दा करे,
१ अष्टाग-सग्रह मे १८ ग्रह गिने है । जैसे—सुर, असुर, गन्धर्व, उरग,
यक्ष, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, पिशाच, प्रेत, कूष्माण्डक, ककाल, दौर्किर, बेताल,
पितृ, ऋषि, गुरु, सिद्ध और वृद्ध ।
४४८ चरकसंहिता [अ० ६
एकान्त मे बातचीत करे, ऐसे प्रकृति वाले पुरुष को यक्षग्रह से उन्मत्त हुआ
जाने ॥ २४ ॥
नष्टनिद्रमन्न-पान-द्वेषिणमनाहारमप्रतिबलिनं शस्त्र-शोणित-मांस-रक्त-
माल्याभिलाषिणं सन्तर्जकं च राक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥ २५ ॥
(६) राक्षसोन्माद—रात को नींद न आये, रोगी रात को विचरे, खान-
पान से द्वेप रखे, बिना आहार के भी अति बलवान् हो, शस्त्र, रक्त, मास, लाल
माला की चाह करे ओर दूसरे को डाट का भय दिखावे, ऐसे व्यक्ति को राक्षस-
ग्रह से उन्मत्त जाने ॥ २५ ॥
प्रहास-नृत्य-प्रधानं १ देव-विप्र-वैद्य-द्वेपावज्ञाभिः स्तुति- २ वेद-मन्त्र-शा-
स्त्रोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥२६॥
(७) ब्रह्मराक्षस—हास्य करे और नृत्य करे, देव, ब्राह्मण और वैद्यो मे
द्वेष, अनाहार तथा देवता आदि की स्तुति करे, वेद, मत्र, धर्मशास्त्र इनके
अनेक उदाहरण दे, लकडी, डेले आदि से अपने शरीर को आघात पहुचावे,
ऐसे व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस से उन्मत्त समझे ॥२६॥
अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्य-गीत-हासिनं बद्धाबद्धप्रलापिनं ३
संकर-कूट-मलिन-रथ्याचैल-तृणाश्म-काष्ठाधिरोहणरतिं ४ संभिन्न-रूक्ष-
वर्ण-स्वरं नग्नं विधावन्तं नैकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृतिं च
पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ॥ २७ ॥
(८) पिशाचोन्माद—अस्वस्थ मन हो, नाचे, गावे, हसे, सम्बद्ध और
असम्बद्ध बातचीत करे, संकर (झाडू से एकत्र किये धूल तिनके आदि), कूट
(मिट्टी का ढेर), मैले रास्ते, मलिन वस्त्र, तिनके, पत्थर, लकडी इन पर चढने
की प्रवृत्ति हो, जिसके वर्ण मिलेजुले हो, स्वर रूखा ओर एक समान न रहता
हो (बदलता रहे), नगा रहे, इधर-उधर भागे, एक स्थान पर न बैठे, दूसरे
के सामने अपने दुःख की कथा कहे तथा स्मृति नष्ट हो गई हो, ऐसे व्यक्ति को
पिशाचग्रह से उन्मत्त समझे ॥ २७ ॥
तत्र शौचाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नर प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयो-
दश्या च देवाः, ज्ञान-शुचि-विविक्त-सेविनं धर्म-शास्त्र-श्रुति-काव्य-कुशलं
प्रायः षष्टिनवम्योर्ऋषयः, मातृ-पितृगुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो
दशम्याममावास्यायां च पितरः, गन्धर्वास्तु स्तुति-गीत-वादित्र-रति पर-
१ 'प्रहासनृत्यवादिन' इति । २ 'वज्ञाभिस्तुति-' इति । ३. 'बद्धप्रभाषिण'
इति च । ४. 'तृणेषु आरोहण-' इति च पाठः ।