चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १७३
अ० ६ ] इन्द्रियस्थानम् १७३
(२) जो रोगी अचेत हो, जिसका मुख सूखता हो, अनेक रोगों से
आक्रान्त हो उस, रोगी की आयु को समाप्त हुआ जान कर बुद्धिमान् मनुष्य
उसकी चिकित्सा न करे। (३) जिस रोगी की सिराये (त्वचा) हरी पड़
जाये, जिसके लोम छेद बन्द हो गये हों (पसीना नहीं आता हो), खट्टे रस
की चाह रखता हो ऐसा रोगी पित्त से ही मरता है ॥ ४-५ ॥
शरीरान्ताश्च शोभन्ते शरीरं चोपशुष्यति ।
बलं च हीयते यस्य राजयक्ष्मा हिनस्ति तम् ॥ ६॥
अंसाभितापो हिक्का च छर्दनं शोणितस्य च ।
आनाहः पार्श्वशूलं च भवत्यन्ताय शोषिणः ॥ ७ ॥
(४) जिस रोगी के हाथ पाव अच्छे दिखाई देते हैं, और शरीर
सूखता जाता है, शरीर का बल दिन पर दिन घटता जाता है वह रोगी राज
यक्ष्मा से मरता है। (५) जिस रोगी को हिचकी आवे और कन्धे भी दुखें,
रक्त का वमन हो, पेट में अफारा और पार्श्व मे तीव्र वेदना (शूल) हो, ये
लक्षण शोष-रोगी की मृत्यु के लिये होते हैं ॥ ६-७ ॥
वातव्याधिरपस्मरी कुष्ठी शोफी तथोदरी ।
गुल्मी च मधुमेही च राजयक्ष्मी च यो नरः ॥ ८ ॥
अचिकित्स्या भवन्त्येते बलमांसक्षये सति ।
अन्येष्वपि विकारेषु तान्भिषक्परिवर्जयेत् ॥ ६॥
विरेचनहतानाहो यस्तृष्णानुगतो नरः ।
विरिक्तः पुनराध्माति यथा प्रेतस्तथैव सः ॥ १० ॥
पेयं पातुं न शक्नोति कण्ठस्य च मुखस्य च ।
उरसश्च विशुष्कताद्यो नरो न स जीवति ॥ ११ ॥
स्वरस्य दुर्बलीभावं हानिं च बलवर्णयोः ।
रोगवृद्धिमयुक्तां च दृष्ट्वा मरणमादिशेत् ॥ १२ ॥
ऊर्ध्वश्वास गताष्माणं शूलोपहतवङ्क्षणम् ।
शर्म चानाधिगच्छन्तं बुद्धिमान् परिवर्जयेत् ॥ १३ ॥
अपस्वरं भाषमाणं प्राप्त मरणमात्मनः ।
श्रोतारं चाप्यशब्दस्य दूरतः परिवर्जयेत् ॥ १४ ॥
(६) वात रोगी, अपस्मार रोगी, कुष्ठी, शोफयुक्त, उदर रोगी, गुल्मी,
मधुमेही और राजयक्ष्मा से पीड़ित मनुष्य बल और मांस के क्षय होने पर असाध्य
हो जाते हैं। इसके सिवाय इन रोगियों को अन्य कोई दूसरे भी रोग हो जायें
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तो भी असाध्य हैं । (७) जिस रोगी का विरेचन के द्वारा पेट फूलने का रोग
शान्त करने पर प्रबल तृष्णा उत्पन्न हो जाये, अथवा विरेचन के पीछे पुन
अनाह (अफ़ारा) हो जाये वह रोगी प्रेत के समान है। (८) जो रोगी कण्ठ,
मुख, छाती, के शुष्क होने के कारण जल वा दूध भी नहीं पी सके वह रोगी नहीं
बचता। (६) आवाज कमजोर पड जाये, बल और वर्ण मे न्यूनता आ जाये,
अनुचित रूप से रोग बढ़ जाये, तो ऐसे रोगी का मरण हो कहे। (१०) जिस
रोगी को ऊर्ध्व श्वास आरम्भ हो जाये, अग ठण्डे हो जाये, वक्षण प्रदेश में खूब
शूल रहे, किसी भी प्रकार से रोगी को शान्ति न मिले बुद्धिमान् ऐसे रोगी को छोड़
दे। (११) जो रोगी विकृत स्वर से अपनी आई मृत्यु को बतला रहा हो, जो
बिना शब्द के भी शब्द सुने, उस रोगी को वैद्य दूर से ही त्याग दे ॥ ८-१४ ॥
यं नरं सहसा रोगो दुर्बलं परिमुञ्चति ।
संशयप्राप्तमात्रेयो जीवितं तस्य मन्यते ॥ १५ ॥
अथ चेज्ज्ञातयस्तस्य याचरेन् प्रणिपाततः ।
रसेनाद्यादिति ब्रूयान्नास्मै दद्याद्विशोधनम् ॥ १६ ॥
मासेन चेन्न दृश्येत विशेषस्तस्य शोभनः ।
रसैश्चान्यैर्बहुविधैर्दुर्लभं तस्य जीवितम् ॥ १७ ॥
निष्ठीवतं च पुरीषं च रेतश्चाम्भसि मज्जति ।
यस्य तस्याऽऽयुषः प्राप्तमन्तमाहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥
निष्ठीयूते यस्य दृश्यन्ते वर्णा बहुविधाः पृथक्।
तच्च सीदत्यधः प्राप्य न स जीवितुमर्हति ॥ १६ ॥
(१२) जिस निर्बल हुए रोगी को रोग एकदम से छोड़ जाये, ऐसे रोगी
के जीवन को भगवान आत्रेय संशय-ग्रस्त मानते हैं। (१३) जिस रोगी के सब
सम्बन्धी बहुत नम्रता और विनय के साथ चिकित्सा करने की प्रार्थना करे,
चिकित्सा के समय वैद्य इस रोगी को मास रस देने को कहे। परन्तु साथ मे
विरेचन या वमन रूप सशोधन कार्य नही करे । इस प्रकार एक मास तक
चिकित्सा करने पर भी कुछ शुभ परिवर्त्तन न दीखे, इसी प्रकार अनेक प्रकार के
मास रस देने पर भी जब फायदा न हो, तो उस रोगी का जीवन दुर्लभ है।
(१४) जिस रोगी का थूक (कफ), मल और वीर्य पानी में डूब जाता
है, बुद्धिमान् लोग उसकी आयु को समाप्त हुआ बतलाते हैं। (१५) जिस
रोगी के कफ में नाना प्रकार के बहुत से रंग दिखाई देते हैं और वह कफ
पानी में डूब जाता हो तो वह रोगी जी ने मे असमर्थ है ॥ १५-१९ ॥