चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७
अ० ८ ] २७ चिकित्सितस्थानम् ४१७
कुमारो ने उसकी चिकित्सा की । इस प्रकार रोग से मुक्त चन्द्रमा विशेष रूप
से शोभित होने लगा, उसका ओज बढने लगा और शुद्ध सत्त्व ( मन ) को
प्राप्त हुआ । क्रोध, यक्ष्मा, ज्वर, रोग ये सब एक ही अर्थ को बतलाते है । यह
रोग सबसे प्रथम नक्षत्रराज चन्द्रमा को हुआ, अतएव राजयक्ष्मा नाम से कहा
जाता है। यह यक्ष्मा रोग अश्विनीकुमारो के हुकार से भयभीत होकर मनुष्य-
लोक मे आगया । यह चार प्रकार के कारणो का प्राप्त करके मनुष्यो मे प्रवेश
कर जाता है ॥ ८-१२ ॥
अयथाबलमारम्भ वेगसन्धारणं क्षयम् ।
यक्ष्मणः कारणं विद्याच्चतुथं विषमाशनम् ॥ १३ ॥
यक्ष्मा के चार कारण—( १ ) अपने बल वा शक्ति से अधिक कार्य
करना, ( २ ) वेगो का रोकना, ( ३ ) धातुक्षय और ( ४ ) विषम भोजन,
राजयक्ष्मा के ये चार कारण है ॥ १३ ॥
युद्धाध्ययनभाराध्वलङ्घनलवनादिभिः ।
पतनैरभिघातैर्वा साहसर्वा तथाऽपरः ॥ १४ ॥
अयथाबलमारम्भेर्जन्तोरुरसि विक्षते ।
वायुः प्रकुपितो दोषावुदीर्योभौ विधावति ॥ १५ ॥
स शिरःस्थः शिरःशूल करोति गलमाश्रितः ।
कण्ठोद्ध्वंस च कास च स्वरभेदमरोचकम् ॥ १६ ॥
पार्श्वशूलं च पार्श्वस्थो वर्चोभेदं गुदे स्थितः ।
जम्भा ज्वरं च सन्धिस्थ उरस्थश्चोरसो रुजम् ॥ १७॥
क्षोभनाच्चोरसो रक्तं कासमानः कफानुगम् ।
जर्जरेणोरसा कृच्छ्रमुरःशूली निरस्यति ॥ १८ ॥
इति साहसिको यक्ष्मा रूपैरेतैः प्रपद्यते ।
एकादशभिरात्मज्ञः सेवेतातो१ न साहसम् ॥ १९ ॥
( १ ) शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न क्षय—खूब युद्ध करना,
खूब अध्ययन ( पढना ), बहुत भार उठाना, बहुत मार्ग चलना, बहुत लङ्घन,
बहुत लवन ( कूदना ), गिरना, चोट लगना, साहस तथा शक्ति से बाहर के
अन्यान्य कार्य करने पर पुरुष की छाती मे क्षत हो जाता है। तब प्रकुपित
वायु-पित्त और कफ दोनो दोषो को उदीर्ण करके इधर-उधर भागता है। शिर
मे पहुच कर शिरःशूल उत्पन्न करता है, गले मे आश्रित होकर कण्ठोद्ध्वंस,
१. 'भजेत्तस्मात्' इति वा पाठः ।
४१८ चरकसंहिता [ अ० ८
कास, स्वरभेद और अरुचि उत्पन्न करता है। पार्श्व मे स्थित पार्श्वशूल को गुदा
मे स्थित होकर अतीसार को, सन्धियों मे स्थित वायु जम्भाई और ज्वर को,
उरः मे स्थित वायु छाती मे दर्द को उत्पन्न करता है। उरः (फेफड़ों) मे
छत होने से रोगी के खांसते समय कफ से मिला रक्त बाहर आता है। छाती के
जर्जरित होने से कष्ट के साथ कफ निकलता है। साहसिक यक्ष्मा इन कारणो से
उत्पन्न होता है, यह यक्ष्मा ग्यारह लक्षणो सहित होता है। इसलिये अपने
सामर्थ्य को जानने वाला पुरुष कभी साहस नही करे ॥ १४-१६ ॥
ह्रीमत्त्वाद्वा घृणित्वाद्वा भयाद्वा वेगमागतम् ।
वातमूत्रपुरीषाणां निगृह्णाति यदा नरः ॥ २० ॥
तदा वेगप्रतीघातात्कफपित्ते समीरयन् ।
ऊर्ध्वं तिर्यगधश्चैव १ विकारान्कुरुतेऽनिलः ॥ २१ ॥
प्रतिश्यायं च कासं च स्वरभेदमरोचकम् ।
पार्श्वशूलं शिरःशूलं ज्वरमंसावमर्दनम् ॥ २२ ॥
अङ्गमर्दं मुहुश्छर्दि वर्चोभेदं त्रिलक्षणम् ।
रूपाण्येकादशैतानि यक्ष्मा यैरुच्यते महान् ॥ २३ ॥
(२) वेग-सन्धारण से उत्पन्न यक्ष्मा—लज्जा से, घृणा से वा भय के
कारण जब मनुष्य वायु, मूत्र तथा मल के उपस्थित वेगो को रोकता है, तब
वेगों के रुक जाने से प्रकुपित वायु कफ और पित्त को ऊपर, नीचे, तिरछे
तीनों गतियों मे प्रेरित करके अनेक विकारो को उत्पन्न करता है। तब प्रतिश्याय,
कास, स्वरभेद, अरोचक, पार्श्वशूल, शिरःशूल, ज्वर, कधो मे पीड़ा, अंगमर्द
बार बार वमन, अतीसार ये नाना विकार तीनो लक्षणो से उत्पन्न होते हैं।
राजयक्ष्मा के ये ग्यारह रूप है, जिनको देख कर राजयक्ष्मा महान् रोग
कहा जाता है ॥ २०-२३ ॥
हर्षोत्कण्ठाभयत्रासक्रोधशोकातिकर्शनात् ।
व्यवायान्शनाभ्या च शुक्रमोजश्च हीयते ॥ २४ ॥
ततः स्नेहक्षयाद्वायुर्वृद्धो दोषानुदीरयन् ॥
प्रतिश्यायं ज्वरं कासमङ्गमर्दं शिरोरुजम् ॥ २५ ॥
श्वासं विड्भेदमरुचि पार्श्वशूलं स्वरक्षयम् ।
करोति चांससन्तापमेकादशमिमान् गदान् ॥ २६ ॥
१ 'तिर्यगधः कुर्याद्' इति च
४२० चरकसंहिता [ अ० ८
स्त्रीमद्यमांसप्रियता प्रियता चावगुण्ठने ॥ ३४ ॥
मक्षिकाघुणकेशानां तृणानां पतनानि च ।
प्रायोऽन्नपाने, केशानां नखानां चाभिवर्धनम् ॥ ३५ ॥
पतत्रिभिः पतङ्गैश्च श्वापदैश्चाभिधर्षणम् ।
स्वप्ने केशास्थिराशीनां भस्मनश्चाधिरोहणम् ॥ ३६ ॥
जलाशयानां शैलानां वनानां ज्योतिषामपि ।
शुष्यतां क्षीयमाणानां पततां यच्च दर्शनम् ॥ ३७ ॥
प्राग्रूपं बहुरूपस्य तज्ज्ञेयं राजयक्ष्मणः ।
राजयक्ष्मा का पूर्वरूप—प्रतिश्याय (जुकाम), दुर्बलता, दोषरहित पदाथो
मे भी दोष का दीखना, शरीर मे बीभत्सता दीखना, घृणा होना, खाते हुए भी
बल और मास का क्षीण होना, स्त्री-प्रियता (मैथुन की चाह), मद्यप्रियता,
मासप्रियता, शर्मीलापन (लोगो से मिलने मे संकोच), खान पान मे मक्खियो,
घुण, केश, तिनकों का गिरना, केश और नखो का जल्दी जल्दी बढ़ना,स्वप्न
मे पक्षियो तथा व्याघ्र आदि हिंसक पशुओ से पराजित होना, बालो, अस्थिया
ओर राख के ढेर पर चढ़ना, तालाबो का सूखते हुए, पर्वतो को तथा वनो को
क्षीण होते हुए ओर ताराओ को गिरते हुए देखना, यह बहुत रूप वाले यक्ष्मा
के पूर्वरूप है ॥ ३३-३७ ॥
रूपं तस्य यथोद्देशं परं शृणु सभेषजम् ॥ ३८ ॥
यथा स्वेनोष्मणा पाकं शारीरा यान्ति धातवः ।
स्रोतसा च यथास्वेन धातुः पुष्यति धातुना ॥ ३९ ॥
स्रोतसां संनिरोधाच्च रक्तादीनां च संक्षयात् ।
धातूष्मणां चापचयाद्राजयक्ष्मा प्रवर्तते ॥ ४० ॥
तस्मिन्काले पचत्यग्निर्यदन्नं कोष्ठमाश्रितम् ।
मलीभवति तत्प्रायः कल्पते किंचिदोजसे ॥ ४१ ॥
तस्मात्पुरीषं संरक्ष्यं विशेषाद्राजयक्ष्मिणः ।
सर्वधातुक्षयार्तस्य बल तस्य हि विड्बलम् ॥ ४२ ॥
रसः स्रोतःसु रुद्धेषु स्वस्थानस्थो विवर्धते ।
स ऊर्ध्वं कासवेगेन बहुरूपः प्रवर्तते ॥ ४३ ॥
जायन्ते व्याधयश्चातः षडेकादश वा पुनः ।
येषां सङ्घातयोगेन राजयक्ष्मेति कल्प्यते ॥ ४४ ॥
अब यक्ष्मा के रूप और औषध सुनो—शरीर मे अपनी गरमी से धातुओ
का पाक ( पोषण ) होता है। धातु अपने अपने स्रोतो द्वारा जाकर धातु का