चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ३ ] चिकित्तिसस्थानम् ३१५
अ० ३ ] चिकित्तिसस्थानम् ३१५
चन्दनोदकशीतानां संस्पर्शानुरसान् स्पृशेत् ॥ २६२ ॥
स्रग्भिर्नीलोत्पलैः पद्मैर्व्यजनैर्विविधैरपि ।
शीतवातावहैर्व्यज्येच्चन्दनोदकवर्षिभिः ॥ २६३ ॥
नद्यस्तडागाः पद्मिन्यो ह्रदाश्च विमलोदकाः ।
अवगाहे हिता दाहतृष्णाग्लानिज्वरापहाः ॥ २६४ ॥
प्रियाः प्रदक्षिणाचाराः प्रमदाश्चन्दनोक्षिताः ।
सान्त्वयेयुः परैः कामैर्मणिमौक्तिकभूषणाः ॥ २६५ ॥
शीतानि चान्नपानानि शीतान्युपवनानि च ।
वायवश्चन्द्रपादाश्च शीता दाहज्वरापहाः ॥ २६६ ॥
(१) पुष्कर (लाल कमल), पद्म, उत्पल तथा कल्हार (कुमुद) के
शीतल पत्तों पर अथवा चन्दन के पानी से ठण्डे किये निर्मल क्षौम वस्त्रों पर,
शीतल या बर्फ से शीतल बने (जल के छिड़काव से ठण्डे) या शीतल धारा-
गृहों में (जहाँ पर फुहारे छूट रहे हों) दाह से पीड़ित मनुष्य को सुख से
सोना चाहिये। (२) स्वर्ण, शंख, मूगा, मणि, मोती और चन्दन के पानी से
शीतल किये पदार्थों का स्पर्श करे। गरम होने पर छोड़ दे। [चक्रदत्त में शीत-
क्रिया के लिये एक उत्तम विधि दी है। रोगी को पीठ के भार लेटा कर उसकी
नाभि पर कांसी आदि शीतल पात्र रख कर ऊपर से पानी की धारा गिरानी
चाहिये इससे दाह मिटता है।] (३) नीले कमल की या श्वेत कमल की
मालाओं को धारण करावे खस आदि के नाना प्रकार के पंखों को चन्दन के
पानी से तर करके शीतल वायु देवे। (४) नदियां, तालाब, पद्मिनी (पुख-
रणियां), ह्रद जिनका पानी निर्मल हो, उनमें अवगाहन करे। इससे दाह,
प्यास, ग्लानि और ज्वर नष्ट होता है। (५) प्रिय, अनुकूल आचार वाली,
चन्दन का लेप किये हुए, मणि और मोतियों के आभूषणों को पहिने हुए
कामिनियों द्वारा रोगी की शान्ति करे। [वाह्य परिशीलन मात्र करे वीर्य का
नाश नहीं होने देवे।] (६) शीतल खान पान, शीतल बाग बगीचे, शीतल
वायुए, चन्द्रमा की शीतल किरणें ये दाह ज्वर को नष्ट करती हैं ॥२६०-२६६॥
अथोष्णाभिप्राायिणां ज्वरितानामभ्यङ्गादीनुपक्रमानुपदेक्ष्यामः ।
अगुरु-कुष्ठ-तगर-पत्र-नलद-शैलेयक-व्यामक-हरेणुका-स्थौणेयक-क्षेमकै-
ला-वरा-वराङ्गदल-पूर-तमाल-पत्र-भूतीक-रोहिष-सरल-शल्लकी-देवदार्वग्नि-
मन्थ-बिल्व-स्योनाक-काश्मर्य-पाटला-पुनर्नवा-वृश्चीर-कण्टकारिका-बृह-
ती-शालिपर्णी-पृश्निपर्णी-माषपर्णी-मुद्गपर्णी-गोक्षुरकैरण्ड-शोभाञ्जनक-व-
३१६ चरकसंहिता [ अ० ३
रुणार्क-चिरिबिल्वातिबिल्वक-शटीपुष्कर-मूलगण्डीरोरुबूक-पत्तूराक्षीवा-
श्मान्तक-शिग्रु-मातुलुङ्ग-मूलक-मूलपर्णी-पीलुपर्णी-तिलपर्णी-मोरटा-
मेषशृङ्गी-हिंस्त्रा-दन्त-शठैरावतक-भल्लातका-स्फोट-कण्डीरात्मजा-काका-
ण्डैकैषीका-करञ्ज-धान्यकाजमोद-पृथ्वीका-सुमुख-सुरस-कुठेरक-काण्डीर-
कालसाल्क-पर्णास-क्षवक-फणिज्झक-भूस्तृण-शृङ्गवेर-पिप्पली-सर्पपाश्वग-
न्धा-रास्नारुहावरोहा-वचा-बलातिबला-गुडूच्य-शतपुष्पा-शीतवती-नाकु-
ली-गन्धनाकुली-श्वेता-ज्योतिष्मती-चित्रकाव्यण्डाम्ल-चाङ्गेरी-बदर-कुल-
त्थ-माषाणामेव विधानामन्येषां चोष्णवीर्याणां यथालाभमौषधानां कषायं
कारयेत्। तेन कषायेण तेषामेव च कल्केन सुरा-सौवीरक-तुषोदक-
मैरेय-मेदक-डाम्यमण्डारनाल-कट्वर-प्रतिविनीतेन तैलपात्रं विपाचयेत्,
तेन सुखोष्णेन तैलेनोष्णाभिप्रायिणं ज्वरितमभ्यञ्ज्यात्, तथा शीतज्वरः
प्रशाम्यति । तैरेव चौषधैः श्लक्ष्णपिष्टैः सुखोष्णैः प्रदेहं कारयेत्, एतेषा-
मेव च सुखोष्णमुत्क्वाथमवगाहनपरिषेकार्थं प्रयुञ्जीत ज्वरप्रशमार्थ-
मिति ॥ २६७ ॥
इति शीतज्वरेऽगुर्वाद्यन्तैलम् ।
जिस ज्वर के रोगी उष्ण प्रलेप आदि की इच्छा करते हैं, उनके लिये
अभ्यङ्ग आदि का उपदेश करे । यथा—अगुरु, कुष्ठ, तगर, तेजपत्र, नलद
( बालछड ), गैलेय (छैलछरीला ), व्यामक ( तृणविशेष ) हरेणु, ( रेणुका ),
स्थौणेय (सुगन्धित द्रव्य गठिवन ), क्षेमिक ( चोरक ), एला ( इलायची ),
वरा ( त्रिफला ), वरांगदल ( दालचीनी की छाल अथवा प्रियंगुपत्र ), पुर
( गुग्गुलु ), तमालपत्र, भूतीक (तृणविशेष), राहिय (तृणविशेष ), सरल
( चीड ), शल्लकी (सर्जभेद ), देवदारु, अनिमन्य ( अरणी ), बेलगिरी,
स्योनाक (सोना पाठा), काश्मरी (गम्भारी), पाटला (पाढल), श्वेत पुनर्नवा,
लाल पुनर्नवा, छोटी कटेरी, बडी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्गपर्णी, माप-
पर्णी, गोखरू, एरण्ड, सहजना, वरना आक, करञ्ज ( नाटा ), तिल्वक (लोध),
कचूर, पोहकरमूल, भाण्डीर ( भाट ), उरुवक ( लाल एरण्ड ), पत्तूरा ( राज
गरी ), अक्षीव ( महानिम्ब ), अश्मान्तक, शिग्रु ( कडुआ सहजन ), बिजौरा,
मूलपर्णी, पीलुपर्णी, ( बिम्बी, मूर्वा भेद ), तिलपर्णी ( तलवणो या हुलहुल ),
मेढाशृङ्गी, हिंस्त्रा ( मासी, कथार ), दन्तशठ ( गलगल ), ऐरावतक (नारंगी),
भिलावा, आस्फोटक ( हरफा रेवड़ी ), कण्डीर ( जंगली करेली ), आत्मज
( पुत्रजरा ), काकाण्ड ( कौंच ), एकैषिका ( त्रिवृता या पाठा ), करजुआ,