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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१

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अ० ९ ] चिकित्सितस्थानम् ४५१
उत्पन्नावस्था मे घृत का पान करावे । क्योकि कफ पित्त द्वारा मार्ग के अवरुद्ध
होने से प्रथम वमन, विरेचन रूपी शोधन करना उचित है। शोधन स्नेहयुक्त
और मृदु हो इससे वायु का प्रकोप नही होता ।
कफ और पित्त से उत्पन्न उन्मादो मे भी रोगी का स्नेहन और स्वेदन
करके वमन और विरेचन देना उचित है। रोगी के शुद्ध होने पर पेया विलेपी
रूप से अन्न सेवन का क्रम चालू करे ॥ ३२-३३ ॥
निरूहान् स्नेहबस्तींश्च १ शिरसश्च विरेचनम् ।
ततः कुर्याद्यथादोषं तेषां भूयस्त्वमाचरेत् ॥ ३४ ॥
हृदिन्द्रियशिरःकोष्ठे संशुद्धे वमनादिभिः ।
मनःप्रसादमाप्नोति स्मृतिं संज्ञां च विन्दति ॥ ३५ ॥
पीछे से निरूह ( आस्थापन ), स्नेह बस्ति ( अनुवासन ), शिरोविरेचन
करावे । दोष के अधिक होने पर दोषानुसार बार बार वमन, विरेचन करावे ।
वमन आदि कार्यों से हृदय ( छाती ), चक्षु आदि इन्द्रियो के, शिर, कोष्ठ
( आमाशय-पक्वाशय ) के शुद्ध होने पर रोगी का मन प्रसन्न हो जाता है, वह
स्मृति और संज्ञा ( ज्ञान ) को प्राप्त करता है ॥ ३४-३५ ॥
शुद्धस्याऽऽचारविभ्रंशे तीक्ष्णं नावनमञ्जनम् ।
ताडनं च मनोबुद्धिदेहसंतर्जनं हितम् ॥ ३६ ॥
शोधन करने पर भी यदि रोगी मे आचार की अपवित्रता हो तो तीक्ष्ण
नस्य, तीक्ष्ण अञ्जन, दण्ड आदि से पीटना, मन, बुद्धि और शरीर को उद्विग्न
करने वाले कार्य करने हितकारी हैं ॥ ३६ ॥
यः शक्तो विनयेत्पट्टैः संयम्य सुदृढैः सुखैः ।
अपेतलोष्ठकाष्ठाद्यैः संरोध्यश्च तमोगृहे ॥ ३७ ॥
तर्जनं त्रासनं दानं सान्त्वनं हर्षणं भयम् ।
विस्मयो विस्मृतेर्हेतोर्नयन्ति प्रकृतिं मनः ॥ ३८ ॥
जो उन्माद-रोगी नम्रता से वश मे आ सके उसको सुदृढ और सुखकारक
जिनसे उसे देह मे पीड़ा या व्रण न हो ऐसे वस्त्रों से बाध कर अन्धकारयुक्त
घर मे बन्द कर दे । घर मे से ढेले, लकड़ी आदि सब हटा देवे जिससे ये न
चुभे न किसी प्रकार की चोट लगे । तर्जन ( डाट डपट ), करना, दान,
हर्षोत्पादन, आश्वासन, भयदिखाना, विस्मय ( चकित करना ), आदि क्रियाओं
से विस्मृत हुआ मन ( विमूढ चित्त ) पुनः प्रकृति में आ जाता है ॥३७-३८॥
१. 'निरूहणस्नेहबस्ती' इति वा ।

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४५२ चरकसंहिता [ अ० ९
प्रदेहोत्साद्नाभ्यङ्गधूमाः पानं च सर्पिषः ।
प्रयोक्तव्यं मनोबुद्धिस्मृतिसंज्ञाप्रबोधनम् ॥ ३६ ॥
प्रदेह, उत्सादन ( उबटन ), अभ्यग ( तैल मर्दन ), धूम और घृतपान
ये सब वस्तुए मन, बुद्धि, स्मृति और सज्ञा को प्रबुद्ध करती है, इनका प्रयोग
करना उचित है ॥ ३६ ॥
सर्पिःपानादिरागन्तौर्मन्त्रादिश्चेष्यते विधिः ।
आगन्तुज उन्माद मे रति तथा अर्चना की कामना से उत्पन्न उन्मादो मे
घृतपान आदि भेषजविधि तथा ओषधि, मणि, मगल, बलि आदि मत्र विधि
का प्रयोग करे ।
अतः सिद्धतमान्योगाञ्छृणून्मादविनाशनान् ॥ ४० ॥
हिङ्गुसौवर्चलव्योषैर्द्विपलांशैर्धृताढकम् ।
चतुर्गुणे गवां मूत्रे सिद्धमुन्मादनाशनम् ॥ ४१ ॥
अब विस्तार से अति सिद्ध ( परीक्षित ) फलप्रद उन्मादनाशक योगों
को सुनो—
( १ ) हींग, सौवर्चल ( सचल ), व्योष ( सोंठ, मरिच, पिप्पली ), इनमे
प्रत्यक दो पल परिमित लेकर इनके कल्क से, घी एक आढक और गाय का मूत्र
चार आढक लेकर घृतपाक करे, यह घृत उन्माद का नाशक है ॥ ४०-४१ ॥
विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेल्ववालुकम् ।
स्थिराऽनन्ता रजन्यौ द्वे शारिवे द्वे प्रियङ्गु कम् ॥ ४२ ॥
नीलोत्पललमाञ्जिष्ठादन्तीदाडिमकेशरम् ।
तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ॥ ४३ ॥
विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठं चन्दनपद्मकौ ।
कल्कैः कर्षसमैरेतैर्विंशत्यष्टाभिरेव च ॥ ४४ ॥
चतुर्गुणे जले सम्यक् १ घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
अपस्मारे ज्वरे कासे श्वासे मन्देऽनले क्षये २ ॥ ४५ ॥
वातरक्ते ३ प्रतिश्याये तृतीयकचतुर्थके ।
छर्द्यशौमूत्रकृच्छ्रेषु विसर्पोपहतेषु च ॥ ४६ ॥
कण्डू-पाण्ड्वामयोन्माद-विष-मेह-गदेषु च ।
भूतोपहतचित्तानां गद्गदानामरेतसाम् ४ ॥ ४७ ॥
१. 'पक्त्वा' इति । २ 'मन्देऽनलक्षये' इति ।
३ 'वातरोगे' इति । ४ 'मचेतसाम्' इति च पाठः ।

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अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५३

शस्तं स्त्रीणां च वन्ध्यानां धन्यमायुर्बलप्रदम् ।
अलक्ष्मीपापरक्षोघ्नं सर्वग्रहविनाशनम् ॥ ४८ ॥
कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च ।
इति कल्याणकं घृतम् ।
( २ ) कल्याणक घृत—विशाला ( गवाक्षी ), त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा,
आँवला ), कौन्ती ( रेणुका और 'कान्ता' पाठ मे—मोटी इलायची ), देवदारु,
एलवालुक ( एलुआ ), स्थिरा ( शालपर्णी ), नत ( तगर ), हल्दी, दारु-हल्दी,
अनन्तमूल, कृष्णसारिवा, फूल प्रियगु, नीला कमल, छोटी इलायची, मजीठ,
दन्तीमूल, अनार, नागकेसर, तालीशपत्र, बड़ी कटेरी, मालती ( चमेली के नये
फूल ), वायबिडङ्ग, पृश्निपर्णी, कूठ, लाल चन्दन, पद्माख इन अट्ठाईस ओषधियो
मे प्रत्येक एक कर्ष लेकर इनके कल्क द्वारा, घी एक प्रस्थ, पानी चार प्रस्थ
लेकर घृत पाक करे¹। यह कल्याणक नाम का घृत अपस्मार, ज्वर, कास,
शोष, मन्दाग्नि, क्षय, वातरक्त, प्रतिश्याय, तृतीयक, चतुर्थक ज्वर, छर्दि, अर्श,
मूत्रकृच्छ्र, वीसर्प, कण्डू, पाण्डु-रोग, उन्माद, विष और प्रमेह रोगो मे
हितकारी है, भूतो से आक्रान्त चित्त वाले अव्यक्त वाणी वाले, अल्प शुक्र
पुरुषो और वन्ध्या स्त्रियो के लिये प्रशस्त है। यह कल्याणक घृत धन के लिये
हितकारी, कल्याणकारी, आयुप्रद, बलप्रद तथा सब प्रकार के ग्रहो से उत्पन्न रोगो
का नाशक है ॥४२-४८॥
एभ्य एव स्थिरादीनि जले पक्त्वैकविंशतिम् ॥ ४९ ॥
रसे तस्मिन्पचेत्सर्पिर्गूढक्षीरे चतुर्गुणे ।
वीरा-द्विमाष-काकोली-स्वयंगुप्तर्षभकद्धिभिः ॥ ५० ॥
मेदया च समैः कल्कैस्तत्स्यात्कल्याणकं महत् ।
बृंहणीयं विशेषेण सन्निपातहरं परम् ॥ ५१ ॥
इति महाकल्याणकं घृतम् ।
( ३ ) महाकल्याणक घृत—इन विशाला आदि अट्ठाईस वस्तुओ आर
स्थिरा आदि इक्कीस द्रव्यो से क्वाथ विधि से क्वाथ करे। इसमे पहिली बार
ब्याई ( खारके की ) गाय का दूध, घी से चतुर्गुण मिलावे। फिर वीरा ( पृश्नि-
पर्णी या शतावरी ), द्विमाष ( मूगपर्णी और माषपर्णी ), काकोली, कौंच,

१. चरकोपस्कार मे—'कान्ता' पाठ है। अष्टाङ्ग सङ्ग्रह मे भी—बड़ी
इलायची का ग्रहण है जैसे—'वरा विशाला भद्रैला देवदार्वेलवालुकैरि'ति ।
'कौन्ती' पाठ निर्णयसागर की प्रति मे है।

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४५४ चरकसंहिता [अ० ६
ऋषभ और ऋद्धि तथा मेदा इनको परस्पर सम भाग लेकर इनके कल्क से
घृतपाक करे, यह महाकल्याणक घृत है ॥ ४६-५१ ॥
जटिला पूतना केशी चारटी मर्कटी वचाम् ।
त्रायमाणां जया वीरा चोरकं कटुरोहिणीम् ॥ ५२ ॥
कायस्था शूकरी छत्रामतिच्छत्रा पलङ्कषाम् ।
महापुरुषदान्ता च वयःस्था नाकुलीद्वयम् ॥ ५३ ॥
कटम्भरा वृश्चिकाली स्थिरा चाऽऽहृत्य तैर्घृतम् ।
सिद्धं चातुर्थकोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ ५४ ॥
महापैशचिक नाम घृतमेतद्यथाऽमृतम् ।
बुद्धिस्मृतिकरं चैव बालाना चाङ्गवर्धनम् ॥ ५५ ॥
इति महापैशचिकं घृतम् ।
(४) महापैशचिक घृत—जटिला (जटामासी), पूतना (हरड), केशी
(भूतकेशी), चारटी (पद्मचारिणी अथवा ब्रह्मयष्टि), कर्कटी (कौच), वच,
त्रायमाणा, जया (अरण्डि), वीरा (पृश्निपर्णी या काकोली), चोरक (सुगन्धित
द्रव्य, इसे भूटानी लोग बेचते है) कुटकी, कायस्था (सुरसा वा क्षीरकाकोली),
शूकरा (वाराही कन्द वा विधारा), छत्रा (धनिया), अतिच्छत्रा (सौंफ),
पलङ्कषा (लाख या गुग्गुल), महापुरुषदान्ता (शतावरी), वयस्था (आवला),
नाकुली द्वय (दोनो रास्ना अथवा सपाक्षी और सर्पगन्धा), कटम्भरा (कटभी),
वृश्चिकाली (बिच्छू बूटी), स्थिरा (शालपर्णी), इन को लाकर इनके क्वाथ
और कल्क से घृत सिद्ध करे । यह घृत चतुर्थक ज्वर उन्माद, ग्रह, अपस्मार
को नष्ट करता है। यह महापैशार्चिक नामक घृत अमृत के समान बुद्धि, स्मृति-
कारक, तथा नालको के अगो को बढाने वाला है ॥ ५२-५५ ॥
लशुनाना शतं त्रिशदभया त्र्यूषणात्पलम् ।
गवा चर्ममसीप्रस्थमाढकं क्षीरमूत्रयोः ॥ ५६ ॥
पुराणसर्पिषः प्रस्थमेभिः सिद्धं प्रयोजयेत् ।
हिङ्गुचूर्णपलं शीते दत्त्वा च मधुमाणिकाम् ॥ ५७ ॥
तद्दोषगन्तुसम्भूतालुन्मादान्विषमज्वरान् ।
अपस्मारांश्च हन्त्याशु पानाभ्यञ्जननावनैः ॥ ५८ ॥
इति लशुनाद्यं घृतम् ।
(५) लशुनाद्य घृत—लहसुन एक सौ, हरड़ तीस, मिलित सोठ, मरिच,
पिप्पली एक पल, गाय का चमड़ा जलाकर तैयार की राख एक प्रस्थ, गाय