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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५

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अ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४१५
की स्मृति और बुद्धि को बढाने के लिये कुष्ठ-नाशन अध्याय मे संग्रह
किया है ॥ १७७-१७६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने
कुष्ठचिकित्सितं नाम सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातो राजयक्ष्मचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'राजयक्ष्मा की चिकित्सा' का वर्णन करते हैं। भगवान् आत्रेय ने
ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
दिवौकसां कथयतामृषिभिर्वै श्रुता कथा ।
कामव्यसनसंयुक्ता पौराणी शशिनं प्रति ॥ ३ ॥
रोहिण्यामतिसक्तस्य शरीरं नानुरक्षतः ।
आजगामाल्पतामिन्दोर्देहः स्नेहपरिक्षयात् ॥ ४ ॥
दुहितॄणामसंभोगाच्छ्लेष्मांशं च प्रजापतेः ।
क्रोधो निःश्वासरूपेण मूर्तिमान् निःसृतो मुखात् ॥ ५ ॥
पजापतेर्हि दुहितॄरष्टाविंशतिमंशुमान् ।
भार्यार्थं प्रतिजग्राह न च सर्वास्र्ववर्तत ॥ ६ ॥
गुरुणा तमवध्यातं भार्यास्वसमवर्तिनम् ।
रजःपरीतसबलं¹ यक्ष्मा शशिनमाविशत् ॥ ७ ॥
सोऽभिभूतोऽतिबलिना² गुरुक्रोधेन निष्प्रभः ।
देवदेवर्षिसहितो जगाम शरणं गुरुम् ॥ ८ ॥
अथ चन्द्रमसः शुद्धां मतिं बुद्ध्वा प्रजापतिः ।
प्रसादं कृतवान्सोमस्ततोऽश्विभ्यां चिकित्सितः ॥ ६ ॥
स विमुक्तो ग्रहश्चन्द्रो विरराज विशेषतः ।
ओजसा वर्धितोऽश्विभ्यां शुद्धं सत्त्वमवाप च ॥ १० ॥
क्रोधो यक्ष्मा ज्वरो रोग एकोऽर्थो दुःखसंज्ञितः ।
यस्मात्स राज्ञः प्रागासीद्राजयक्ष्मा ततो मतः ॥ ११ ॥
१ 'रजोऽन्धमबल दोन' इति च । २ 'गुरुणा' इति च

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४१६ चरकसंहिता [ अ० ८
स यक्ष्मा हुङ्कृतोऽश्विभ्यां मानुषं लोकमागतः ।
लब्ध्वा चतुर्विधं हेतुं समाविशति मानवान् ॥ १२ ॥
यक्ष्मा की उत्पत्ति का उपाख्यान—देवताओं के कहते हुए ऋषियो ने
चन्द्रमा के काम व्यसन से सम्बन्धित पुराण मे वर्णित कथा को इस प्रकार सुना है—
भगवान् प्रजापति की अट्ठाईस कन्याओ का विवाह चन्द्रमा के साथ हुआ
था । इन कन्याओ को भार्या रूप मे लेकर चन्द्रमा ने सबके साथ समानता का
व्यवहार नही किया । शरीर पर ध्यान न रखते हुए उसने रोहिणी के साथ
अति-आसक्ति का व्यवहार किया । इस आसक्ति से शरीर का स्नेह क्षीण होने
के कारण चन्द्रमा का शरीर कृश हो गया । शेष स्त्रियो ने चन्द्रमा के इस अस-
मान व्यवहार की बात दक्ष प्रजापति से कही । तब दक्ष प्रजापति के मुख से
निःश्वास रूप मे मूर्त्तिमान् क्रोध उत्पन्न हुआ । भार्या रूप मे सबका ग्रहण करने
पर समान व्यवहार न होने पर असमान व्यवहार करने वाला चन्द्रमा को गुरु
( प्रजापति ) ने शाप दिया । इसमे रजोगुण से युक्त निर्बल चन्द्रमा मे यक्ष्मा
ने प्रवेश किया उसको यक्ष्मा हो गया१ । वह चन्द्रमा गुरु ( श्वशुर ) के अत्यन्त
बलवान् क्रोध से तिरस्कृत होकर कान्तिरहित हो गया । तब देवा और देवर्षियो
को साथ मे लेकर चन्द्रमा गुरु ( प्रजापति ) की शरण मे गया । इसके पश्चात्
चन्द्रमा की बुद्धि शुद्ध हो गई जान कर गुरु प्रसन्न हो गये । इसके पीछे अश्विनी-
१ (१) प्रजापति की अट्ठाईस कन्याये अट्ठाईस नक्षत्र ये है । (१) अश्विनी,
(२) भरणी, (३) कृत्तिका, (४) रोहिणी, (५) मृगशिरा, (६) आर्द्रा,
(७) पुनर्वसु, (८) पुष्या, (६) आश्लेषा, (१०) मघा, (११) पूर्वा
फाल्गुनी, (१२) उत्तरा फाल्गुनी, (१३) हस्ता, (१४) चित्रा, (१५)
स्वाति, (१६) विशाखा, (१७) अनुराधा, (१८) ज्येष्ठा, (१६) मूला,
(२०) पूर्वाषाढा, (२१) उत्तराषाढ़ा, (२२) श्रवणा, (२३) धनिष्ठा,
(२४) शतभिषा, (२५) पूर्वा भाद्रपदा, (२६) उत्तरा भाद्रपदा, (२७)
रेवती और (२८) अभिजित् ।
(२) राजयक्ष्मा के लक्षण—स्नेह का परिक्षय, शरीर का कृश और निष्प्रभ
(आज का ह्रास) होना, ये तीन लक्षण है जो कि सबसे प्रथम शरीर पर दिखाई
देते है । क्षीण होते हुए चन्द्र मे ये तीनो लक्षण स्पष्ट होने से चन्द्र की कथा से
ही राजयक्ष्मा को जोड दिया है । दिन रात्रि ये दो अश्वी है । वे ही क्षीण होते
हुए चन्द्र के क्षय को दूर करके पुनः पुनः पूर्ण कर देते हैं । इस प्रकार यह
अलकार से कथन है ।