चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७१
अ० १० ] चिकित्सितस्थानम् ४७१
इनका प्रयोग अपस्मार, उन्माद, किलास (श्वेत कुष्ठ) और विषम-ज्वर
मे करे ॥ ४७-४८ ॥
पुष्योद्धृतं शुनः पित्तमपस्मारघ्नमञ्जनम् ।
(३) पुष्य-नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त को लेकर उसका अञ्जन करने से
अपस्मार नष्ट होता है।
तदेव सर्पिषा युक्तं धूपनं परमं मतम् ॥ ४६ ॥
धूपन—(१) पुष्य-नक्षत्र मे कुत्ते के पित्त का लेकर पुराने घृत के साथ
मिलाकर धूपन देना भी अपस्मार की उत्तम औषध है ॥ ४६ ॥
नकुलोलूकमार्जारगृध्रकीटाहिकाकजैः ।
तुण्डैः पक्षैः पुरीषैश्च धूपन मारयेद्भिषक् ॥ ५० ॥
आभिः क्रियाभिः सिद्धाभिर्हृदयं सम्प्रबुध्यते ।
स्रोतांसि चापि शुध्यन्ति स्मृति संज्ञा स विन्दति ॥ ५१ ॥
(२) नेवला, उल्लू, बिल्ली, गीध, कीट (बिच्छू), साप और कौवा
इनके मुख, पख और पुरीषो मे अपस्मार-रोगी को धूपन देवे। इन उपरोक्त
सिद्ध फलदायक कर्मो से अपस्मार-रोगी के हृदय और मनोवह-स्रोत शुद्ध हो
जाते है और रोगी को सज्ञा (चेतना) आ जाती है ॥ ५०-५१ ॥
यस्यातुबन्धस्त्वागन्तुदोषलिङ्गाधिकाकृतिम् ।
पश्येत्तस्य भिषक्कुर्यादागन्तून्मादभेषजम् ॥ ५२ ॥
जिस अपस्मार मे वात आदि दोषो सं अधिक लक्षण दिखाई देते हों,
उसको आगन्तुज समझे। इस आगन्तुज-अपस्मार मे आगन्तुज-उन्माद की
चिकित्सा करे अर्थात् घृतपान और मत्रादि-चिकित्सा करे ॥ ५२ ॥
अतत्त्वाभिनिवेश नामक महारोग का निदान और चिकित्सा —
अनन्तरमुवाचेदमग्निवेशः कृताञ्जलिः ।
भगवान् प्राक् समुद्दिष्टः श्लोकस्थाने महागदः ॥ ५३ ॥
अतत्त्वाभिनिवेशो यस्तद्धेत्वाकृतिभेषजम् ।
तत्र नोक्तं ततः श्रोतुमिच्छामि तदिहोच्यताम् ।
शुश्रूषवे वचः श्रुत्वा शिष्यायाऽऽह पुनर्वसुः ॥ ५४ ॥
अपस्मार¹ का हेतु, लक्षण, चिकित्सा सुनने के अनन्तर हाथ जोड़ कर
अग्निवेश ने भगवान् आत्रेय से निवेदन किया—भगवन् ! आपने सूत्रस्थान
१. अतत्त्वाभिनिवेश-रोग का लक्षण और चिकित्सा का अंश आर्ष नही
है, यह चक्रदत्त और उनके गुरु-जनो, का मत है।
४७२ चरकसंहिता [ अ० १०
में 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक जो महारोग कहा हे, उसकी आकृति, लक्षण, हेतु
वक्ष पर आपने नहीं कहे थे, उनको मैं सुनना चाहता हूँ। उसे आप यहा पर
कहिये। सुनने की इच्छा वाले शिष्य के वचन को सुन कर भगवान् महर्षि
ने कहा—॥ ५३-५४ ॥
महागदं सौम्य शृणु सहेत्वाकृतिभेषजम् ।
मलिनाहारशीलस्य वेगान्प्राप्तान्निगृह्णतः ।
शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैर्हेतुभिश्चातिसेवितैः ॥ ५५ ॥
हृदयं समुपाश्रित्य मनोबुद्धिवहाः सिराः ।
दोषाः संदूष्य तिष्ठन्ति रजोमोहावृतात्मनः ॥ ५६ ॥
हे सौम्य ! महागद के हेतु, लक्षण ओर चिकित्सा को सुनो—जो व्यक्ति
नित्यप्रति मलिन (अपवित्र) और अपथ्य आहार का सेवन करता है, मूत्र,
पुरीष आदि के उपस्थित वेगो को रोकता है, शत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष
आदि कारणो को अति सेवन करता है रजोग्रस्त और मो-(तम) से आवृत
उस पुरुष मे प्रकुपित शारीरिक वात आदि दोष हृदय मे पहुँच कर मनोवह
और बुद्धि-वह (सज्ञावह), सिराओ (स्रोतो) को दूषित कर देते है ॥५५-५६॥
रजस्तमोभ्यां वृद्धाभ्यां बुद्धौ मनसि चाऽऽवृते ।
हृदये व्याकुले दोषैरथ मूढालपचेतसः ॥ ५७ ॥
करोति विषमां बुद्धिं नित्यानित्ये हिताहिते ।
अतत्त्वाभिनिवेशं तमाहुराप्ता महागदम् ॥ ५८ ॥
रज और तम रूपी मानस दोषो के अधिक बढने से सत्त्व-सञ्ज्ञक मन और
बुद्धि घिर जाते है, ढप जाते है। शारीरिक दोषों के बढने से हृदय व्याकुल
हो जाता है। इस अवस्था मे पुरुष को मोह (मूर्च्छा) आ जाती है, चेतना
कम हो जाती है, नित्य, अनित्य और हित, अहित कार्यों मे विपरीत बुद्धि
करने लगता है। आप्त विद्वान् इसको 'अतत्त्वाभिनिवेश' नामक महाराग
कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥
स्नेहस्वेदोपपन्नं तं संसाध्य वमनादिभिः ।
कृतसंसर्जनं मेध्यैरन्नपानैरुपाचरेत् ॥ ५६ ॥
चिकित्सा—रोगी को प्रथम स्नेहन और स्वेदन कराके वमन आदि
क्रियाओ से शुद्ध करे। पीछे से अग्नि को बढाने के लिये पेया आदि कर्म तथा
मेधावर्धक, पवित्र अन्नपानो से चिकित्सा करे ॥५६॥