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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३७

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अ० १ ] इन्द्रियस्थानम् १३७
व्याधि, व्याधि के पूर्वरूप, वेदना, उपद्रव, शरीर की छाया, ( शारीरिक ),
प्रतिछाया, स्वप्न-दर्शन, दूताधिकार, मार्ग के उपद्रव के दृश्य, रोगी के घर
की अवस्था, इसके भाव, औषध-सफलता और औषध की रोग सम्बन्ध में
योजना—इन सब बातों की अवश्य परीक्षा करे। इनका विस्तार आगे यथास्थान
किया जायेगा ॥ ३ ॥
तत्र खल्वेषा परीक्ष्याणां कानिचित्पुरुषमनाश्रितानि कानिचिच्च
पुरुषसंश्रयाणि। तत्र यानि पुरुषमनाश्रितानि तान्युपदेशतो युक्तितश्च
परीक्षेत, पुरुषसंश्रयाणि पुनः प्रकृतितश्च विकृतितश्च ॥ ४ ॥
इन उपरोक्त परीक्षा करने योग्य बातों में से कुछ बातें तो पुरुष में आश्रित
हैं और कुछ बातें पुरुष मे आश्रित नहीं हैं। इसलिये जो परीक्षायें पुरुष में
आश्रित नहीं हैं, उनकी परीक्षा आप्तजनों के उपदेश से जाननी चाहिये और
जो परीक्षायें पुरुष के शरीर मे आश्रित हैं उनकी परीक्षा प्रकृति और विकृति
से करनी चाहिये ॥ ४ ॥
तत्र प्रकृतिर्जातिप्रसक्ता च कुलप्रसक्ता च देशानुपतिनी च काला-
नुपातिनी च वयोऽनुपातिनी च प्रत्यात्मनियता च । जाति-कुल-देश-
काल-वयः-प्रत्यात्मनियता हि तेषां तेषां पुरुषाणां ते ते भावविशेषा
भवन्ति ॥ ५ ॥
इनमे प्रकृति छः प्रकार की है—(१) जाति से प्राप्त ( २ ) काल से प्राप्त
( ३ ) देशानुसार ( ४ ) कालानुसार ( ५ ) वय के अनुसार और ( ६ )
प्रतिव्यक्ति नियत जाति, देश, कुल, काल, आयु और प्रत्येक पुरुष की भिन्नता
के कारण पुरुषों की प्रकृति भिन्न २ हो जाती है ॥ ५ ॥
[ जाति—जापानी लोगों को हैजा कम होता है, हिन्दुओं और यहूदियो
को 'मधुमेह' अधिक होता है । कुल—जिस कुल में क्षय या अर्श रोग चलता
हो, उसमें विवाह सम्बन्ध का शास्त्र ने निषेध किया है । देश—मरुस्थल प्रदेश
में कफजन्य रोग बहुत कम होते हैं । मदुरा मे हाथीपग ( पील-पाव ) और
उड़ीसा मे अण्ड-वृद्धि बहुत है । काल--वसन्त ऋतु मे चेचक रोग तथा
टायफाइड ( आन्त्रज्वर ) फैलता है । वयस्--प्लेग और क्षय जवान ( १८ से
२८ तक ) पुरुषो को ही होते हैं । प्रत्यात्म--जिस आदमी को एक बार चेचक
हो जाती है, उसको फिर नहीं होती और कई आदमी जन्म से ही किसी किसी
रोग के लिये प्रतिशक्त होते हैं । ( २ ) इसका अर्थ यह भी है कि कइयों में

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१३८ चरकसंहिता [ अ० १
शौच आदि गुण प्रकृति से होते हैं यथा—ब्राह्मण में। कई कुलों में, कई
जातियों में शौच गुण (स्वच्छता) विशेष रहता है]।
विकृति पुनर्लक्षणनिमित्ता च लक्ष्यनिमित्ता च निमित्तानुरूपा च।
तत्र लक्षणनिमित्ता नाम सा, यस्याः शरीरे लक्षणान्येव हेतुभूतानि
भवन्ति देवात्। लक्षणानि हि कानिचिच्छरीरोपनिबद्धानि भवन्ति,
यानि हि तस्मिंस्तस्मिन् काले तत्राधिष्ठानमासाद्य तां तां विकृतिमुत्पा-
दयन्ति। लक्ष्यनिमित्ता तु सा, यस्या उपलभ्यते निमित्तं यथोक्तं निदा-
नेषु। निमित्तानुरूपा तु निमित्तार्थकारिणी या। नामनिमित्ता निमित्त-
मायुषः प्रमाणज्ञानार्थेच्छन्ति भिषजो भूयश्चायुषः क्षयनिमित्ता प्रेतलि-
ङ्गानुरूपाम्। यामायुषोऽन्तादस्य ज्ञानार्थमुपदिशन्ति धीराः। यामधि-
कृत्य पुरुषसंश्रयाणि मुमूर्षता लक्षणान्युपदिश्याम इत्युद्देश । तद्विस्तरे-
णानुव्याख्यास्याम ॥ ६ ॥
विकृति तीन प्रकार की ह । यथा—( १ ) लक्षण के निमित्त से, ( २ )
लक्ष्य के निमित्त से और ( ३ ) निमित्तों के अनुरूप ॥ ६ ॥
( १ ) लक्षणनिमित्ता—जिसके दैववश हेतु रूप लक्षण ही शरीर में उत्पन्न
होते हैं। कई एक लक्षण शरीर से ही सम्बद्ध रहते हैं। वे भिन्न २ अनेक
समयों में अपना आश्रय बना कर भिन्न २ विकृति (विकार, रोग, पीड़ा) को
उत्पन्न करते हैं। हाथों में नख रेखा-पद्मादि सामुद्रिक लक्षण होना ।
( २ ) लक्ष्यनिमित्ता—जैसा निदानों में निमित्त बतलाया है। तदनुसार
जिसका निमित्त उपलब्ध होता है।
( ३ ) निमित्तानुरूप—विकृति वह है जो निमित्त के कार्य रूप प्रयोजन
को पूरा करती है, उस निमित्त से भिन्न विकृति को भी वैद्य लोग आयु के
परिमाण ज्ञान का निमित्त मानते हैं, और जिसका, समाप्त होने वाली आयु के
ज्ञान के लिये विद्वान् लोग उपदेश करते हैं। जिसका प्रकरण उठा कर पुरुष मे
आश्रित, मरणासन्न पुरुषों के लक्षणों का हम उपदेश करेंगे । यह उद्देश अर्थात्
अभी नाममात्र कहा है। अब इसका विस्तार से वर्णन करेंगे ॥ ६ ॥
तत्राऽऽदित एव वर्णाधिकारः, तद्यथा—कृष्णः कृष्णश्यामः श्यामाव-
दातोऽवदातश्चेति प्रकृतिवर्णाः शरीरस्य भवन्ति, यांश्चापरानुप्रेक्षमाणो
विद्यादनूक्ततोऽन्यथा वापि निर्दिश्यमानांस्तज्ज्ञैः। नील-श्याम-ताम्र-हरित-
शुक्लाश्च वर्णा शरीरस्य वैकारिका भवन्ति। यांश्चापरानुप्रेक्षमाणो विद्यात्,
ऽविकृतानभूत्वोत्पन्नान्। इति प्रकृतिवर्णा भवन्त्युक्ताः शरीरस्य ॥७॥