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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

चिकित्सितस्थानम्

[, ६ ]
चिकित्सितस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः ( पृ० १६५-२४७ )
अभयामलकीयो रसायनपादः प्रथमः—भेषज के पर्याय । अभेषज के दो प्रकार । रसायन का लक्षण । रसायन के कार्य-इन गुणों की प्राप्ति का कारण, वाजीकरण औषध । अभेषज का लक्षण । रसायन प्रयोग के दो प्रकार-कुटी प्रावेशिक विधि, सशोधन । हरड के गुण । हरीतकी सेवन के योग्य व्यक्ति । आवले के गुण, कर्म । ब्राह्म रसायन का द्वितीययोग । च्यवनप्राश, आमलक रसायन । हरीतक्यादि योग । हरीतक्यादि द्वितीय योग । उपसहार ।
प्राणकामीयो रसायनपादो द्वितीयः रसायन विधि के गुण, रसायन के साथ आहार विधि, आमलकावलेह । आमलक चूर्ण । विडगावदेह । आमलकावलेह । नागबला रसायन । भल्लातकक्षीर । भल्लातक तैल । भल्लातक विधान-भल्लातक प्राश—भल्लातक का विशेष गुण । उपसहार ।
करप्रचितीयो रसायनपादस्तृतीयः—आमलकायस ब्रह्म-रसायन । केवलामलक रसायन । लौहादिरसायन । ऐन्द्री-रसायन । मेधाकर वा मेध्य चार रसायन । पिप्पली रसायन । पिप्पली वर्धमान रसायन । गगाधर कविराज का मतभेद । त्रिफला रसायन के तीन योग । शिलाजतु । भावनाए ।
शिलाजतु के तीन प्रकार के प्रयोग । शिलाजतु की भिन्न २ गतिया, शिलाजतु के आलोड़न द्रव्य ।
आयुर्वेदसमुत्थानीयो रसायनपादश्चतुर्थः—ऋषियो के प्रति इन्द्र का उपदेश । इन्द्रोक्त रसायन । द्रोणीप्रावेशिक रसायन-ब्रह्मसुवर्चला, आदित्यपर्णी, बलवज, सोम, पद्मा, काष्ठ, गोधा, सर्पा, अजशृंगी इन आठ औषधियो का प्रयोग-इन्द्रोक्त रसायन दूसरा, आचार रसायन । अश्विन्यों के कार्य । अश्विन्यो की मान-प्रतिष्ठा-प्राणाचार्य के लक्षण । आयुर्वेद का उद्देश्य—उपसहार ।
द्वितीयोऽध्यायः ( पृ० २४७-२७३ )
संप्रयोगशरमूलीयो वाजीकरणपादः प्रथमः—सबसे प्रधान वाजीकरण स्त्री, स्त्री की श्रेष्ठता, अपत्य रहित पुरुष की निन्दा, बहु सन्तान पुरुष की उत्तमता, बृहणी-गुटिका । वाजीकरण घृत । वाजीकरण पिण्डरस । वृष्यरस ।
आसिक्तक्षीरीयो वाजीकरणपादो द्वितीयः—षष्टिकादि गुटिका । वृष्य भक्ष्य । अपत्यकर स्वरस । वृष्य क्षीर । वृष्य घृत । दधिशरं प्रयोग । षष्टिकौदन प्रयोग-वृष्य पूपलिका । उपसहार ।
माषपर्णभृतीयो वाजीकरणपादस्तृतीयः—माष के पत्तो पर पली गाय के दूध का प्रयोग, वृष्य क्षीर प्रयोग ।

[ ७ ]

[बायाँ स्तम्भ]
अपत्यकर क्षीरयोग। अपत्यजनन क्षीर
योग। वृष्य पायस योग। वृष्य पूप-
लिका। शतावरी घृत। वृष्य मधुक
योग। उपसंहार।
पुमान्-जातबलादिको वाजीकर-
णपादश्चतुर्थः—स्त्रियो मे रमण करने
और सन्तानवान् होने का विस्तार से
वर्णन,वृष्य बस्तिया। वृष्य माष गुडिका,
वृष्य माहिषरस। पूपलिका योग। वृष्य
घृतभृष्ट मत्स्यमास-गर्भाधानकर योग,
पूपलिका योग। वृष्य पूपलिका योग, वृष्य
माषादि पूपलिका। वृष्ययोग, अपत्यकर
घृत, वृष्य गुटिका। वृष्य उत्कारिका,
वृष्यका लक्षण, शुक्र के क्षय के कारण।
शुक्र प्रवृत्त न होने की दशाए। शुक्र का
मथे जाकर प्रवृत्त होने में आठ कारण,
कवि गंगाधरसेन का मत। कामेच्छा से
शरीर में आने वाली विकृतिया। वीर्य
का महत्त्व। प्रशस्त शुक्र। उपसहार।
तृतीयोऽध्यायः ( पृ० २७३-३२८)
ज्वरचिकित्सितम्—अग्निवेश के
ज्वरसम्बन्धी प्रश्न। गुरु आत्रेय पुन-
र्वसु का समाधान,ज्वर की प्रकृति अर्थात्
स्वाभाविक रूप,ज्वर की उत्पत्ति। शिव-
कोप से ज्वर की उत्पत्ति। ज्वर का
प्रभाव व लक्षण। जन्म मृत्यु के समय
का महातम ज्वर। ज्वर का पूर्वरूप।
ज्वर का अपना स्वरूप,विधि भेद से
ज्वर के दो प्रकार,सौम्य, आग्नेय,वेगा-
भिप्राय से दो भेद प्राकृत, वैकृत-साध्या
साध्य भेद से दो प्रकार, दोष कालादि
भेद से पाच प्रकार, रसादि धातुभेद से

[दायाँ स्तम्भ]
सात प्रकार,कारण भेद से ज्वर के आठ
प्रकार। मानस ज्वर के लक्षण। अन्त-
र्वेग ज्वर के लक्षण। बहिर्वेण ज्वर के
लक्षण। प्राकृत ज्वर के साध्यासाध्य
पर विचार। वैकृत ज्वर के साध्य साध्य
पर विचार। क्षीण शोष सहित असा
ध्य ज्वर। सन्तत ज्वर की उत्पत्ति।
तृतीयक और चतुर्थक ज्वर की उत्पत्ति।
अन्येद्युष्क ज्वर की उत्पत्ति। दोषो की
गति, अन्येद्युष्क, तृतीयक, चतुर्थक के
लक्षण, तृतीयक ज्वर के तीन प्रकार।
चतुर्थक ज्वर के दो प्रकार। चतुर्थक का
भेद विषम ज्वर। ज्वर के पाच प्रकार।
ज्वर के होने मे ऋतु, दिन, रात्रि, मन
के बलाबल की कारणता, चतुर्थकादि का
तृतीयाकादि में परिवर्त्तन। सातों धातुओं
मे आश्रित ज्वर के लक्षण। वात पित्त
ज्वर के लक्षण, वात कफ ज्वर के लक्षण,
कफ पित्त ज्वर के लक्षण। सन्निपातज
ज्वरो का वर्णन, उसके १२ प्रकार।
सन्निपातज्वर के लक्षण, सुश्रुतोक्त
अभिन्यास ज्वर के लक्षण। सन्निपातज
साध्यासाध्यता, आगन्तु-ज्वर के चार
प्रकार। अभिचार और अभिशाप द्वारा
उत्पन्न ज्वर। कामजन्य ज्वर। शोक
जन्य ज्वर। क्रोधजन्य ज्वर, भूताविष्ट
ज्वर के लक्षण। ज्वर का रूप। आम
ज्वर के लक्षण। पच्यमान ज्वर के
लक्षण। निराम ज्वर। नवज्वर में अप-
थ्य। ज्वर मे लंघन। [लघन के लक्षण
और पहचान] दोषो के पाचन। षड-
गपानीय। साम ज्वरो के उपचार।

[ ८ ]

[बायाँ स्तम्भ]
लंघन की मर्यादा। घृतपान आदि उप-
चार। शिरोविरेचन, धूपन और अञ्जन
प्रयोग। ज्वर-नाशक द्रव्यों के अनुपा-
नादि का क्रम। हितकारी यूष, शाक,
मास रस मद्य आदि। ज्वरनाशक
कषाय। बृहत्यादि गण। पिप्पल्यादि
घृत। वासाद्य घृत। बलाद्य घृत। वमनके
योग। विरेचन के योग। पञ्चमूल सिद्ध
दूध। त्रिकण्टकाद्य दूध। वात-पित्त ज्वर
नाशक योग। पटोलाद्य बस्ति। आर-
ग्वधादि बस्ति। गुडूच्यादि-निरूह।
जीवन्त्यादि अनुवासन। ज्वर नाशक
कुछ योग। चन्दनाद्य तैल। दाहज्वर
नाशक परिषेक-अवगाहन। दाहनाशक
उपचार। शीत ज्वर मे अगुरु आदि तैल।
शीतज्वर नाशक तेरह प्रकार के स्वेद।
शीत नाशक अन्य वस्त्र आदि उपचार,
वायुजन्य ज्वर के लिये उपचार। निराम
ज्वर वातिकज्वरमें पथ्य-अपथ्य, कफ प्रधान
ज्वर में अल्पाशन विधि। साम ज्वरो मे
लङ्घन। सन्निपात ज्वर। उसके २५भेद।
वीसर्प आदि से उत्पन्न, ज्वर पर उप-
चार, जीर्ण ज्वर के पुन लौटने पर उप
चार,तृतीयक-चतुर्थक ज्वर के उपचार।
वात प्रधान, पित्त प्रधान और कफ
प्रधान विषम ज्वर। बिषम ज्वर नाशक
योग। शाप, अभिचार तथा भूताभि-
षङ्ग के कारण से हुए ज्वर की चिकित्सा,
अभिघातजन्य ज्वरचिकित्सा। क्षत,
व्रण और काम क्रोधजन्य ज्वर की
चिकित्सा। नवज्वर और चिरकालिक
ज्वरमोक्ष। ज्वर से मुक्त पुरुष के

[दायाँ स्तम्भ]
लक्षण। ज्वरयुक्त और ज्वरमुक्त के
लिये पथ्य, अवशिष्ट ज्वरदोष की
हानियां-उन दोषो का शोधन। उपसहार।
चतुर्थोऽध्यायः (पृ० ३२८-३४५)
रक्तपित्तचिकित्सितम्—रक्तपित्त के
सम्बन्ध में अग्निवेश का निवेदन और
आत्रेय पुनर्वसु का समाधान, पित्त के
रक्त को दूषित करने का कारण। रक्त
पित्त-नाम का कारण। कफ आदि दोषो
के ससर्ग। रक्तपित्त की गति। रक्तपित्त
का कारण। चिकित्सा विधि। रक्तपित्त
में तर्पण। रक्तपित्ती का भोजन। रक्त-
पित्त मे यवागू, पेया आदि। तृष्णोप-
शम। ऊर्ध्वगामी, अधोगामी रक्तपित्त
के लिये वमन, विरेचन। सशमनी
क्रिया के २२ योग। घृतपाक। रक्तपित्त
नाशक अन्य उपचार। शतावरी घृत।
अवपीड़न। रक्तपित्त मे नस्य। रक्त-
पित्त-शामक लेप-परिवेचन-अवगाहन,
दाह-शान्ति के लिये धारागृह आदि
अनेक उपचार। उपसाहार।
पञ्चमोऽध्यायः (पृ० ३४६-३७४)
गुल्मचिकित्सितम्—कोष्ठ में वायु
प्रकोप के ९ कारण। वातगुल्म आदि
नाम से कहने योग्य पिण्डाकार पदार्थ।
वातजन्य आदि पाच प्रकारों के गुल्मो के
पाच स्थान। वातगुल्म के कारण वात-
गुल्म के लक्षण पित्त गुल्म के कारण और
लक्षण। कफगुल्म के कारण, लक्षण।
द्विदोषजन्य गुल्म और लक्षण। सन्नि-
पातजन्य गुल्म के लक्षण, रक्तगुल्म का
निदान और लक्षण। गुल्मनाशक योग