चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० ४] चिकित्सितस्थानम् ३४३
अ० ४] चिकित्सितस्थानम् ३४३
इनके क्षार को, ढाक को, प्रियंगु के क्षार को, महुए के क्षार को, असन के क्षार
को मधु और घी के साथ चटावे ॥ ६४ ॥
शतावरीदाडिमतिन्तिडीकं काकोलिमेदो मधुकं विदारीम् ।
पिष्ट्वा च मूलं फलपूरकस्य घृतं पचेत्क्षीरचतुर्गुणेन ॥ ६५ ॥
कासज्वरानाहविबन्धशूलं तद्रक्तपित्तं च घृतं निहन्यात् ।
(४) शतावरी घृत—शतावर, अनार, इमली, काकोली, मेदा,
मुलहठी, विदारीकन्द और बिजौरे की जड इनके कल्क के साथ चतुर्गुण दूध में
घृत का पाक करे । यह घृत कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध, शूल और रक्तपित्त
को नष्ट करता है ॥ ६५- ॥
यत्पञ्चमूलैरथ पञ्चभिर्वा सिद्धं घृतं तच्च तदर्थकारि ॥६६ ॥
इति शतमूलादिघृतम् ।
(५) रसायन अध्याय में कहे पाच पञ्चमूलो में सिद्ध किया हुआ घी भी
कास, ज्वर, आनाह, विबन्ध ओर रक्तपित्त को नष्ट करता हे । इस घृत को
कषाय और कल्क दोनो मे सिद्ध करे ॥ ६६ ॥
कषाययोगा य इहोपदिष्टास्ते चावपीडे भिषजा प्रयोज्याः ।
(६) जिस समय दूषित दाप नाक से बहने वाले रक्त के साथ निकल
चुके तब रक्तस्राव को रोकने के लिये उपराक्त कषायो को कूट कर इनसे रस
निकाल कर नासिका मे डालना चाहिये । प्रारम्भ मे रक्त का बन्द करना
अच्छा नहीं ।
घ्राणात्प्रवृत्तं रुधिरं सपित्तं यदा भवेन्निःस्रुतदुष्टदोषम् ॥ ६७ ॥
रक्ते प्रदुष्टे ह्यवपीडबन्धे दुष्टप्रतिश्यायशिरोविकाराः ।
रक्तं सपूंयं कुणपञ्च गन्धः स्याद् घ्राणनाशः कृमयश्च दुष्टाः ॥६८॥
नीलोत्पलं गैरिकशङ्खयुक्तं सचन्दनं स्यात्तु सिताजलेन ।
नस्यं तथाऽऽम्रास्थिरसः समङ्गा मधातकीमोचरसः सलोध्रः॥६६॥
(७) अवपीडन द्वारा यदि आरम्भ में ही रक्तावराव हा जाय तो दूषित
दाष के अन्दर रुक जाने से दूषित प्रतिश्याय (पुरातन या दारुण) और शिरो-
राग उत्पन्न हा जाते हे, तथा पूय मिश्रित रक्त, मुर्दे की गन्ध (रक्त मे,
नासिका मे), गन्ध की अनभिज्ञता ओर दूषित कृमि उत्पन्न हा जाते है। इसी
प्रकार से आम की गुठली (गीली या पानी में कूट कर) का स्वरस या नीला
कमल, स्वर्ण गैरिक ओर शख भस्म, श्वेत चन्दन इनके कल्क को शरबत के
साथ पीस कर अवपीड़न करे । लाजवन्ती या मजीठ को धाय के फूल के साथ
अथवा मोचरस और लोध को जल से पीसकर अवपीडन करे ॥ ६७-६६ ॥
३४४ चरकसंहिता [ अ०४
द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्य क्षीरस्य दूर्वास्वरसस्य चैव ।
यवासमूलानि पलाण्डुमूलं नस्यं तथा दाडिमपुष्पतोयम् ॥१००॥
प्रियालतैल मधुकं पयश्च सिद्ध घृतं माहिषमाजकं वा ।
आम्रास्थि पूर्णैः पयसा च नस्य ससारिदैः स्यात्कमलोत्पलैश्च ॥१०१॥
निम्न वस्तुओ का नस्य देवे—( १ ) अगूर का रस, गन्ने का रस, दूध, दूब
का स्वरस, जवासे की जड का स्वरस, प्याज का रस और अनार के फूल के
रस को नंस्य के लिये देवे । ( २ ) पियाल के तैल को मलहठी के कल्क और
दूध के साथ सिद्ध करके उसका नस्य देवे । ( ३ ) अथवा पियाल के तैल या
मुलहठी को दूध के साथ पीस कर उसका नस्य देवे । ( ४ ) भैस या बकरी के
घी को आम की गुटली के साथ, लाजवन्ती और धाय के फूल के साथ, मोच-
रस और लोध के साथ, अगूर के रस, गन्ने के रस, दूब, दूब का स्वरस, जबसे
की जड़का रस, प्याज का रस या अनार के फूल के रस के साथ सिद्ध करके
देवे । ( ५ ) अथवा भैस या बकरी के घी को अनन्तमूल, कमल और नीलो-
त्पल के फूलो के कल्क से पका कर नस्य देवे । पकाने मे सब द्रव्य घृत के
समान, कल्क घी से चतुर्थांश लेवे ॥ १००-१०१ ॥
भद्रश्रियं लोहितचन्दनं च प्रपोण्डरीकं कमलोत्पले च ।
उशीरवानीरजलं मृणालं सहस्रवीर्या मधुक पयस्या ॥ १०२ ॥
शालीक्षमूलानि यवासगुन्द्रामूल नलाना कुशकाशयोश्च ।
कुचन्दनं शैवलमप्यनन्ता कालानुसार्या तृणमूलमृद्धिः ॥ १०३ ॥
मूलानि पुष्पाणि च वारिजाना प्रलेपनं पुष्करिणीमृदश्च ।
उदुम्बराश्वत्थमधूकलोध्राः कषायवृक्षाः शिशिराश्च सर्वे ॥१०४॥
प्रदेहकल्पे परिषेचने च तथाऽवगाहे घृततैलसिद्धौ ।
रक्तस्य पित्तस्य च शान्तिमिच्छन् भद्रश्रियादीनि भिषक्प्रयुञ्ज्यात् ॥१०५॥
भद्रश्रिया ( श्वेत चन्दन ), लाल चन्दन, पोण्डरीक, श्वेत कमल, नीला
कमल, खस, बानीर ( जलवेतस ), जल ( गन्धवाला ), मृणाल ( कमल नाल )
सहस्रवीर्या (दूर्वा ), मुलहठी, क्षीरकाकोळी, शालि मूल, गन्ने की जड, जवासे
की जड, गुन्द्रा ( तृणविशेष ) की जड़, नड़ सर, कुश, कास की जड़े,
कुचन्दन ( लाल चन्दन ), सरवाल, सारिवा, कालानुसारी ( तगर ), गन्धतृण
की जड़, ऋद्धि, कमलों की जड और पुष्प, और पोखर ( तालाब ) की मिट्टी
का लेप, गूलर, पीपल, महुआ, लोध तथा कषाय रस वाले और शीतक वृक्ष ये
सब रक्तपित्त की शान्ति के लिये प्रदेह, परिषेचन, अवगाहन, घी, तैल पाक मे
प्रयोग करने चाहिये । इनसे घी आदि सिद्ध करके रक्तपित्त मे बरते ॥१०५॥
अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३४५
धारागृह भूमिगृहं च शीत वनं च रम्यं जलवातशीतम् ।
वैदूर्यमुक्तामणिभाजनाना स्पर्शाश्च दाहे शिशिराम्बुशीताः ॥१०६॥
दाह की शान्ति के लिये—धारागृह (फव्वार वाले घर), भूमिगृह
(तहखाने), जल और वायु से शीतल सुन्दर वन, लहसुनिया, मोती, मणि
आदि से बने तथा शीतल पानी से ठण्डे किये बर्तनों का स्पर्श करना चाहिये
इन पात्रा मे बर्फ का पानी या चन्दनोदक भर कर स्पर्श करे ॥ १०६ ॥
पत्राणि पुष्पाणि च वारिजाना क्षौम च शीत कदलीदलं च ।
प्रच्छादनार्थं शयनासनाना पद्मोत्पलाना च दलाः प्रशस्ताः ॥१०७॥
बिस्तर और आसन पर बिछाने के लिये जल म उत्पन्न कमल आदि के
पत्ते या फूल, शीतल क्षौम वस्त्र, केले के पत्ते, कमल या नीले कमल के पत्ते
बिछा कर उन पर सोवे ॥ १०७ ॥
प्रियङ्गुकाचन्दनरूपिताना स्पर्शा. प्रियाण च वराङ्गनानाम् ।
दाहे प्रशस्ताः सजलाः सुशीताः पद्मोत्पलाना च कलापवाताः ॥१०८॥
दाह मे प्रियगु, श्वेतचन्दन मे लिप्त अगो वाली प्रिय वारागनाओ (स्त्रियों)
का स्पर्श, कमल, नीले कमल का स्पर्श अथवा इनका और मोर के पखो से बने
पखों को शीतल पानी से भिगो कर हिलाना उत्तम है ॥ १०८ ॥
सरिद्ध्रदाना हिमवद्गरीणा चन्द्रोद्याना कमलाकराणाम् ।
मनोऽनुकूलाः शिशिराश्च सर्वाः कथाः सरक्त शमयन्ति पित्तम् ॥१०६॥
नदिया, तालाव, पर्वता की गुफाये, चन्द्रमा की किरणे, तालाबो का सेवन,
मन के अनुकूल शान्ति देने वाली सब कथाये रक्तपित्त को शान्त करती है॥१०६॥
तत्र श्लोकौ—हेतुं वृद्धि संज्ञा स्थानं लिङ्ग पृथक् प्रदुष्टस्य ।
मार्गौ साध्यमसाध्य याप्यं कार्यक्रम चैव ॥ ११० ॥
पानान्नमिष्टमेव च वर्ज्यं संशोधनं च शमनं च ।
गुरुरुक्तवान् यथावच्चिकित्सिते रक्तपित्तस्य ॥ १११ ॥
रक्तपित्त रोग के कारण, वृद्धि, सज्ञा, स्थान, लक्षण (पृथक् पृथक् ),
दानो मार्ग, साध्यता असाव्यता, याप्य, चिकित्सा क्रम, हितकर खान-पान,
त्याज्य पदार्थ, सशाधन, सशमन ये सब भगवान् आत्रेय ने इस रक्तपित्त
चिकित्सा मे कह दिये है ॥ ११०-१११ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
रक्तपित्तचिकित्सित नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥