चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६
अ० ५ ] शारीरस्थानम् ६६
वरुण, कुबेर, गन्धर्व इनके सत्त्व के अनुसार क्रम से शुद्ध सत्त्व के सात भेद
हैं। दैत्य, पिशाच, राक्षस, सर्प, प्रेत और शकुनि इनके सत्त्व के अनुसार राजस
सत्त्व के छः भेद हैं। पशु, मत्स्य और वनस्पति इनके सत्त्व के अनुसार तामस
सत्त्व के तीन भेद हैं। किस प्रकार से इन सत्त्वों के अनुसार प्राणियों के साथ
बर्त्ताव हो, इसका दिग्दर्शन करा दिया है। इस प्रकार से प्रतिज्ञानुसार यह
गर्भावक्रान्ति प्रकरण सम्पूर्ण रूप से कह दिया है। इसमें जानने के प्रयोजन,
गर्भकारक भावों के अनुष्ठान, गर्भ के नाश करने वाले कारणों को इस अध्याय
से सम्पूर्ण रूप से कह दिया है ॥५७॥
तत्र श्लोकाः—निमित्तमात्मा प्रकृतिर्वृद्धिः कुक्षौ क्रमेण च ।
वृद्धिहेतुश्च गर्भस्य पञ्चार्थाः शुभसञ्ज्ञिताः ॥ ५८ ॥
अजन्मनि च यो हेतुर्विनाशे विकृतावपि ।
इमांस्त्रीनशुभान् भावानाहुर्गर्भविघातकान् ॥५९॥
शुभाशुभसमाख्यातानष्टौ भावानिमान् भिषक् ।
सर्वथा वेद यः सर्वान् स राज्ञः कर्तुमर्हति ॥६०॥
अवाप्त्युपायान् गर्भस्य स एव ज्ञातुमर्हति ।
ये च गर्भविघातोक्ता भावांस्तांश्चाप्युदारधीः ॥६१॥
गर्भ के लिये पाच बातें शुभ है—गर्भ का कारण, आत्मा, प्रकृति, बुद्धि
और गर्भ का कुक्षि में बढने का कारण। ये पाच अर्थ गर्भ के लिये शुभ कहाते
हैं। गर्भ के न होने मे कारण, गर्भ के विनाश में तथा विकार में कारण ये तीन
बातें गर्भ को नाश करनेवाले 'अशुभ' कहे जाते हैं। जो वैद्य इन शुभ-अशुभ
रूपी आठों बातों को भली प्रकार से जानता है, वह राजा की चिकित्सा करने
योग्य है। उदार, विशाल बुद्धिवाले वैद्य को गर्भ की रक्षा वा प्राप्ति के उपाय
तथा गर्भ के नाश करनेवाले कारण भी जानने चाहिये ॥५८-६१॥
इत्यग्निवेश कृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते शारीरस्थाने महतीगर्भाव-
क्रान्तिशारीर नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः ।
अथातः पुरुषविचयं शारीरं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'पुरुषविचय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥
७० चरकसंहिता [ अ० ५
पुरुषोऽयं लोकसंमित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः । यावन्तो
हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो
लोके, इत्येवंवादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—नैतावता वाक्ये-
नोक्तं वाक्यार्थमवगाह्यामहे, भगवता बुद्ध्या भूयस्तरमनुव्याख्यायमानं
शुश्रूषामहे— इति ।
ऐसा भगवान् पुनर्वसु आत्रेय ने उपदेश किया है कि यह पुरुष लोक
के तुल्य है, लोक में जितने भी विशेष भाव (पदार्थ) है, वे सब इस पुरुष
(शरीर) मे हैं, और जितनी बाते इस पुरुष मे हैं, उतनी ही सब लोक
में हैं, इस प्रकार कहते हुए भगवान् पुनर्वसु को शिष्य अग्निवेश ने कहा—
हे भगवन् ! इतना कह देने से ही हम सम्पूर्ण वाक्यार्थ नही समझ
सकते । हे भगवन् ! आपकी बुद्धि से हम अधिक विस्तार में इसको सुनना
चाहते हैं ।
तमुवाच भगवानात्रेयः—अपरिसंख्येया लोकावयवविशेषाः, पुरु-
षावयवविशेषा अप्यपरिसंख्येया । तेषा यथास्थूलं भावान् सामान्य-
मभिप्रेत्योदाहरिष्यामः, तानेक मना निबोध सम्यगुपवर्ण्यमानानग्नि-
वेश ! षड्धातवः समुदिता 'लोक' इति शब्द लभन्ते । तद्यथा—पृथिव्या-
पस्तेजो वायुराकाशं ब्रह्म चाव्यक्तमित्येत एव च षड्धातवः समु-
दिताः 'पुरुष' इति शब्दं लभन्ते ॥ ३ ॥
इस पर अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—लोक के विशेष अवयव
(वृक्ष, तृण, पशु आदि) तथा पुरुष के विशेष अवयव (स्नायु, कण्डरा,
धमनी आदि) भी असख्य हैं। परन्तु यहा पर मोटी माटी बातो का सामान्य
रूप से दिग्दर्शन करायेगे । हे अग्निवेश ! उनका वर्णन एकाग्र-चित्त होकर
ध्यान से सुनो ! छ धातुऐ मिलकर एक समुदाय 'पुरुष' नाम से कहे जाते
हैं । अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश और अव्यक्त ब्रह्म । इन छ
धातु का समुदाय मिलकर 'पुरुष' ऐसा कहा जाता है ॥ ३ ॥
तस्य पुरुषस्य पृथिवी मूर्ति', आपः क्लेदः, तेजोऽभिसंतापो, वायुः
प्राणो, वियच्छिषिराणि, ब्रह्माऽन्तरात्मा, यथा खलु ब्राह्मी विभूतिर्लोके
तथा पुरुषेऽप्यान्तरात्मिकी विभूतिः, ब्रह्मणो विभूतिर्लोके प्रजापति-
रन्तरात्मनो विभूतिः पुरुषे सत्त्व, यस्त्विन्द्रो लोके स पुरुषेऽहङ्कारः,
आदित्यस्तु आदान, रुद्रो रोषः, सोमःप्रसादो, वसवः सुखम्, अश्विनौ
कान्तिः, मरुदुत्साहो, विश्वेदेवाः सर्वेन्द्रियाणि सर्वेन्द्रियार्थाश्च,
तमो मोहो, ज्योतिर्ज्ञानं, यथा लोकस्य सर्गादिस्तथा पुरुषस्य गर्भाधानं,