चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
[अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७५
[अ० ५ ] शारीरस्थानम् ७५
दण्डधारणं, भैक्ष्यचर्यार्थं पात्रं, प्राणधारणार्थमेककालमग्राम्यो
यथोपपन्नोऽभ्यवहारः, श्रमापनयनार्थं शीर्ण-शुष्क-पर्ण-तृणास्तरणोप-
धान, ध्यानहेतोः कायनिबन्धन, वनेष्वनिकेतवासः, तन्द्रा-निद्रालस्यादि-
कर्मवर्जनं, इन्द्रियार्थेष्वनुरागोपतापनिग्रहः, सुप्रस्थित-गत-प्रेक्षिताहार-
प्रत्यङ्ग-चेष्टादिकेष्वारम्भेषु स्मृतिपूर्विका प्रवृत्तिः, सत्कार-स्तुति-गर्हा-
वमान-क्षमत्वं, क्षुत्पिपासायास-श्रम-शीतोष्ण-वात-वर्षा-सुख-दुःख-
संस्पर्श-सहत्वं, शोक-दैन्योद्वेग-मद-मान लोभ-रागेर्ष्या-भय-क्रोधादि-
भिरसचलनम्, अहङ्कारादिषूपसर्गसंज्ञा, लोकपुरुषयोः सर्गादिसाम्या-
न्वावेक्षणं, कार्यकालात्ययभय, योगारम्भे सततमनिर्वेदः, सत्त्वोत्सा-
होऽपवर्गाय धी-धृति-स्मृति-बलावान, नियमनमिन्द्रियाणां चेतसि,
चेतस आत्मनश्च धातुभेदेन शरीरावयवसंख्यान, अभीक्ष्णं सर्वं कार-
णवद् दुःखमम्वमनित्यमित्यभ्युपगमः, सर्वप्रवृत्तिषु दुःखसंज्ञा १, सर्व-
संन्यासेषु सुखमित्यभिनिवेशः एष मार्गोऽपवर्गाय। अतोऽन्यथा बध्यत
इत्युदयनानि व्याख्यातानि ॥ १०॥
लोक में दोष देख कर मुमुक्षु पुरुष का सब से प्रथम आचार्य के पास
जाना, आचार्य के उपदेश के अनुसार आचरण करना, अग्नि और अग्नि के
तुल्य आचार्य की सेवा करना, धर्मशास्त्र का सम्पूर्ण अध्ययन करना, धर्मशास्त्र
के अर्थ का ज्ञान, अर्थज्ञान में धैर्य, दृढ़ता रखना, शास्त्र के अनुसार क्रिया
करना, सत्पुरुषों की सेवा, दुर्जनों का परित्याग, दुर्जन के साथ मेल न करना,
मन, वचन से सत्य का पालन, सब प्राणियो का हितकारी रहना, कठोर भाषण
न करना, मधुर और समय पर परीक्षा करके बोलना, सब प्राणियों पर अपने
समान प्रेम दृष्टि रखना, किसी भी स्त्री का स्मरण न करना, न स्त्रियों का सङ्कल्प
करना, न उनसे कोई प्रार्थना करना और न उनसे बातचीत करना, सब प्रकार
के परिग्रहो का त्याग, कटि को ढापने मात्र तथा ब्रह्मचर्य रक्षा के लिये कौपीन
का ही धारण करना, कन्था (गूद्दड़ी) को सीने के लिये सूई और सूई रखने
का पात्र, शौच क्रिया के लिये जलपात्र (कमण्डलु), दण्ड का धारण करना,
भिक्षा अर्थात् मधुकरी के लिये पात्र, प्राणरक्षामात्र के लिये एक समय अग्राम्य
(पवित्र) जैसा प्राप्त हो सके वैसा भोजन, थकान दूर करने के लिये गिरे सूखे
पत्ते, तिनकों आदि का बिस्तर और तकिया, ध्यान समाधि के लिये शरीर की
रक्षा, जगलो मे बिना घर बनाए रहना, तन्द्रा, निद्रा, आलस्य आदि का परि-
त्याग, इन्द्रियों के विषय, गन्ध आदि में अनुराग न करना, उपताप, उनके न
१. 'धर्मशास्त्रानुगमन' इति च पाठः।
मिलने से प्राप्त द्वेष आदि का निग्रह करना, सोने, बैठने, चलने, देखने, आहार,
विहार, अंग, प्रत्यग आदि की चेष्टाओं में 'मै कौन हूँ' किस लिये तप करता हूँ। ऐसा
स्मरण करके प्रवृत्त होना, सत्कार, स्तुति आदि मे प्रसन्न न होना, निन्दा और अपमान
में क्रोधित न होकर उनको सहना, भूख, प्यास, मेहनत, थकान, शीत, गरमी, वर्षा,
वायु, सुख, दुःख आदि को सहन करने की शक्ति का होना, शोक, दीनता, मान,
उद्वेग, मद, लोभ, राग, ईर्ष्या, भय ओर क्रोध मे चलायमान न होना, उनसे
अधीर न होना, अलकार आदि वस्तुओं को अनिष्टकारी विघ्न जानना। लोक
और पुरुष दोनों में सृष्टि की आदि मे ही समानता को देखना, कार्य का समय
न बीत जाये इसमें भय मानना, योगक्रिया मे कभी उदासीन न रहना, प्रत्युत
सदा तत्पर रहना, आलस्य न करना, अपवर्ग के लिये सत्त्व और उत्साह रखना,
धी (बुद्धि), धृति (धैर्य) और स्मृति का बल बढाते रहना, बाह्य विषयों से
इन्द्रियों को रोकना, चिन्ता आदि विषयों से चित्त को रोकना, सुख दुख आदि
विषयों से आत्मा को रोकना, बार बार धातुभेद से शरीरावयवों, रक्त, मल, स्नायु
आदि अवयवों का ठीक २ ज्ञान करना, (जिससे वैराग्य हो), आत्मा से अतिरिक्त
उत्पन्न होने वाले सब पदार्थ दुःखों के कारण और अनित्य हैं यह ज्ञान करना,
सब प्रकार की प्रवृत्ति को पाप जानना, सब प्रकार के त्यागों में सुख मानना,
यह मार्ग अपवर्ग के लिये है। इस मार्ग से विपरीत चलने पर पुरुष बन्धन मे
बध जाता है। ये अभ्युदय के साधन अर्थात् मोक्ष के उपाय कह दिये गये हैं॥१०॥
भवन्ति चात्र—एतैरविमलं सत्त्वं शुद्धयुपायैर्विशुध्यति ।
मृज्यमान इवाऽऽदर्शस्तैल-चैल-कचादिभिः ॥ ११ ॥
ग्रहाम्बुद-रजो-धूम-नीहारैरसमावृतम् ।
यथार्कमण्डलं भाति भाति सत्त्वं यथाऽमलम् ॥ १२ ॥
ज्वलत्यात्मनि संरुद्धं तत्सत्त्व संवृतायने ।
शुद्धः स्थिर प्रसन्नाचिर्दीपो दीपाशये यथा ॥ १३ ॥
जिस प्रकार तैल, वस्त्र और हाथ आदि से साफ करने पर दर्पण चमक
उठता है, उसी प्रकार इन शुद्धि के उपायों से मलिन सत्त्व (चित्त) भी शुद्ध
हो जाता है। जिस प्रकार कि राहु, बादल, धूल, धुवा या बर्फ से रहित सूर्य-
विम्ब चमकता है, उसी प्रकार शुद्ध सत्त्व भी प्रकाशित होता है। जिस प्रकार
सत्त्व (चित्त) को पाच इन्द्रियों ढा ढापती हैं, उसी प्रकार सूर्य को भी राहु
आदि पाच वस्तुएँ आवृत करती हैं*। जिस प्रकार सुरक्षित घर में दीपक की
- धूमेनाऽऽव्रियते वह्निः यथाऽऽदर्शो मलेन च ।
यथोल्बेनाऽऽवृतो गर्भः तथा तेनेदमावृतम् ॥