चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
चिकित्सितस्थानम्
चिकित्सितस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
( प्रथमः पादः )
[ चिकित्सा शास्त्र के हेतु लिंग और औषध ज्ञान ये तीन ही अंग हैं। ये
तीनों अग स्वस्थ और रोगी दोनों पुरुषो के लिये उपयोगी हैं। इनमें से हेतु
और लिंग इन दो बातों का विवेचन पीछे कर चुके हैं। अब औषधज्ञान की
व्याख्या के लिये इस स्थान का अवतरण करते हैं। औषध ज्ञान रूप चिकित्सा
धर्म, अर्थ और यश को देती है। इस चिकित्सा मे भी रसायन और वाजीकरण-
चिकित्सा अधिक फलदायक है। क्योंकि इनसे बुढ़ापा आदि स्वाभाविक रोग
दूर होते हैं, पुत्रैषणा पूर्ण होती है और रसायन द्वारा अपरिमित आयु प्राप्त
होती है, इसलिये रसायनचिकित्सा अधिक महत्त्व की है । ]
अथातोऽभयामलकीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम "अभयामलकीय नामक रसायन पाद" की व्याख्या करते हैं,
भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया था ॥ १-२ ॥
चिकित्सितं व्याधिहरं पथ्यं साधनमौषधम् ।
प्रायश्चित्तं प्रशमनं प्रकृतिस्थापनं हितम् ॥ ३ ॥
विद्याद्भेषजनामानि-
भेषज के पर्याय—चिकित्सा, व्याधिहर, पथ्य, साधन, औषध, प्रायश्चित्त,
प्रशमन, प्रकृतिस्थापन और हित ये सब भेषज के पर्याय हैं ॥ ३ ॥
भेषजं द्विविधं च तत् ।
स्वस्थस्यौजस्करं किञ्चित्किञ्चिदार्तस्य रोगनुत् ॥ ४ ॥
भेषज के दो भेद—यह भेषज दो प्रकार का है। एक स्वस्थ पुरुष के ओज,
शक्ति या जीवन को बढ़ानेवाला, दूसरा रोगी पुरुष के रोग को नष्ट करनेवाला ।
अभेषजं च द्विविधं बाधन सानुबाधनम् ।
अभेषज-अभेषज भी दो प्रकार का है। जैसे एक बाधन और दूसरा सानु-
बाधन । इनसे बाधन अभेषज उसी समय के लिये पीड़ा देता है (जैसे—चीता या राई
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अथवा भिलावे का लेप)। और सानुबाधन औषध-दीर्घकाल तक रहनेवाले कुष्ठ
आदि विकारों को उत्पन्न करता है (जैसे-मत्स्य को दूध के साथ खाना) ॥ ४॥
स्वस्थस्यौजस्करं यत्तु तद् वृष्यं तद् रसायनम् ॥ ५ ॥
प्रायः, प्रायेण रोगाणां द्वितीयं प्रशमे मतम् ।
प्रायःशब्दो विशेषार्थो ह्युभयं ह्युभयार्थकृत् ॥ ६ ॥
रसायन—जो औषध स्वस्थ पुरुष के बल वीर्य को बढ़ाता है वह औषध
प्राय. वृष्य और रसायन होता है। दूसरी प्रकार का औषध प्रायः रोगों का
शमन करता है । यहाँ पर प्रयुक्त हुआ 'प्रायः' शब्द विशेषार्थवाची है । साधा-
रणतः दोनों प्रकार के कार्य करते हैं । [जैसे-क्षतक्षीण अध्याय में कहा सर्पि-
र्गुड़ रसायन और वृष्य दोनों हैं । ] ॥ ५-६ ॥
दीर्घमायुः स्मृतिं मेधामारोग्यं तरुणं वयः ।
प्रभावर्णस्वरौदार्यं देहेन्द्रियबलं परम् ॥ ७ ॥
वाक्सिद्धि प्रणतिं कान्तिं लभते ना रसायनात् ।
लाभोपाया हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥ ८ ॥
रसायन के कार्य—रसायन के सेवन से पुरुष दीर्घ आयु, स्मृति (पूर्व
अनुभूत का स्मरण करने का सामर्थ्य ), मेधा ( धारणात्मिका बुद्धि ), आरोग्य,
तरुण वय (जवानी), प्रभा, वर्ण, स्वर की उदारता (प्रशस्तता), उत्कृष्ट
देह-बल, इन्द्रिय-बल, वाक्-सिद्धि (जो कहा जाय वह अवश्य होकर रहे),
प्रणति (लोकों की पूजनीयता) और कान्ति प्राप्त करता है ।
इन गुणों की प्राप्ति में कारण—प्रशस्त रस (आहार, वार्य, विपाक) आदि
के लाभ के उपाय ही रसायन हैं। (उत्तम रस से धातु भी उत्तम होते हैं) ॥७-८॥
अपत्यसन्तानकरं यत्सद्यः संप्रहर्षणम् ।
वाजीवातिबलो येन यात्यप्रतिहतः स्त्रियः ॥ ६ ॥
भवत्यतिप्रियः स्त्रीणां येन येनोपचीयते ।
जीर्यतोऽप्यक्षयं शुक्रं फलवद्येन दृश्यते ॥ १० ॥
प्रभूतशाखः शाखीव येन चैत्यो यथा महान् ।
भवत्यर्च्यो बहुमतः प्रजानां सुबहुप्रजः ॥ ११ ॥
सन्तानमूलं येनेह प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ।
यशः श्रियं बलं पुष्टिं वाजीकरणमेव तत् ॥ १२ ॥
वाजीकरण औषध—जो औषध सन्तान-परम्परा (सन्तान-तन्तु) पुत्र
पौत्रादि की शृङ्खला को बनाती है, जिसके सेवन से प्रहर्ष (लिंग में कामोत्ते-
जना, हर्ष) होता है, जिसके सेवन से पुरुष घोड़े के समान अति बलशाली