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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४४३

Page 427Permalink

अ० ६ ] चिकित्सास्थानम् ४४३
रक्षा मे श्रेष्ठ भगवान् आत्रेय ने उचित अवसर पर, अग्निवेश के प्रश्न करने पर
उन्माद-रोग के कारण, लक्षण और चिकित्सा का अग्निवेश को उपदेश किया ॥३॥
विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् ।
उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥४॥
उन्माद के कारण और सामान्य लक्षण—विरुद्ध ( संयोग-विरुद्ध जैसे—
मछली और दूध ), विष आदि से दूषित और अपवित्र खान-पान, देव, गुरु-
जन, ( माता-पिता और आचार्य ) और द्विजो (ब्राह्मणो ) का तिरस्कार, भय
या हर्ष के कारण मन पर आघात होना, ( इसी प्रकार क्रोध, शोक, चिन्ता
आदि से मन पर चोट पहुचना ) और शरीर की क्रियाओ का विषम होना,
ये सब बाते उन्माद रोग के कारण है ॥ ४ ॥
तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रर्दूष्य ।
स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥
सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणों से अल्पसत्त्व अर्थात् दुर्बल व्यक्ति मे मल
( वात आदि दोष ) प्रकुपित होकर, बुद्धि ज्ञान और स्मृति के आश्रय-स्थान
हृदय को दूषित कर देते है ओर मनोवह स्रोता का आश्रय लेकर पुरुष के चित्त
को शीघ्र ही माहित अर्थात् विपरीत ज्ञान वाला और विचलित कर देते है ॥५॥
धीविभ्रमः सत्त्वपरिस्रवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च ।
अबद्धवाक्त्वं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य लिङ्गम् ॥ ६ ॥
लक्षण—धी-विभ्रम ( बुद्धि का भ्रश ), सत्त्वपरिस्रव ( मन की अति चञ्च-
लता ), आखो मे व्याकुलता ( इधर-उधर देखना ), अधीरता, असम्बद्ध वाणी,
हृदयशून्यता अर्थात् भाव से रहित हृदय होना, ये सब निज और आगन्तुज
दोनो प्रकार के उन्मादो के लक्षण है ॥ ६ ॥
स मूढचेता न सुख न दुःखं नाऽऽचारधर्मौ कुत एव शान्तिम् ।
विन्दत्यपास्तस्मृतिबुद्धिसंज्ञो भ्रमत्ययं चेत इतस्ततश्च ॥ ७ ॥
इस मूढ चित्तवाले पुरुष को न सुख का, न दुःख का और न आचार
( मर्यादा ) का, न धर्म का ज्ञान रहता है, इसलिये चित्त को कही भी शान्ति
प्राप्त नही होती । इस व्यक्ति की स्मृति, बुद्धि और सज्ञा सब नष्ट हो जाती है,
यह व्यक्ति चित्त को इधर-उधर डोलाता रहता है ॥ ७ ॥
समुद्भ्रमं बुद्धिमनास्मृतीनामुन्मादमागन्तुनिजोत्थमाहुः ।
तस्योद्भवं पञ्चविधं पृथक् तु १ वक्ष्यामि लिङ्गानि चिकित्सितं च ॥८॥
१ 'पञ्चविधस्य भूयो' इति वा ।