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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ८] शारीरस्थानम् १३१

अ० ८] शारीरस्थानम् १३१
रूक्ष, द्रव, झाग वाला, हलका, पीने पर पूर्ण तृप्ति नहीं करने तथा
शिशु को सुखाने वाला होता है। ऐसा दूध वात के विकारों को उत्पन्न करता
है। वह वात से दूषित दूध होता है। पित्त से दूषित दूध—काला, नीला, पीला,
ताम्बे के रंग का, तिक्त, अम्ल, कटु अनुरस वाला, दुर्गन्ध या रक्त की गन्ध
वाला, बहुत गरम होता है। कफ विकार वाला वा कफ से दूषित दूध—बहुत
सफेद, बहुत मधुर, पीने पर पिछे मे नमकीन स्वाद वाला, घी, तैल, वसा,
मज्जा की गन्ध से युक्त, पिच्छिल, धागे या सूत्रों वाला, जो पानी के पात्र में
नीचे बैठ जाता है, ऐसे दूध को कफ के विकारों को उत्पन्न करनेवाला, कफ
से दूषित जानना चाहिये ॥५६॥
तेषां त्रयाणामपि क्षीरदोषाणां प्रति प्रतिविशेषमभिसमीक्ष्य यथास्वं
यथादोषं च वमनविरेचनास्थापनानुवासनानि विभज्य कृतानि प्रश-
मनाय।
इन तीनों प्रकार के दूध के दोषों में वात, पित्त, कफ प्रत्येक दोष के अनुसार
अपने अपने दोष के लक्षणों को देख कर वमन, विरेचन, आस्थापन, अनुवासन
आदि का विभाग करके उचित रूप में शान्ति के लिये व्यवहार करना चाहिये।
पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यव-गोधूम-शालि षष्टिक-मुद्ग-हरे-
णुक-कुलत्थ सुरा सावीरक-तुषोदक मैरेय-मेदक-लशुन-करञ्ज-प्राय.स्यात्,
क्षीरदोष-विशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात्, पाठा-महौषध-
सुरदारु-मुस्त-मूर्वा-गुडूची-वत्सक-फलकिरात - तिक्त - कटुक - रोहिणी-
सारिबा-कषायाणा च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषा तिक्त-कषाय-कटुक-
मधुराणा द्रव्याणां प्रयोग इति क्षीर-विकार-विशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां
काल चेति क्षीरविशोधनानि ॥ ५७ ॥
दूषित दूध वाला स्त्री के दूध के शोधने लिये खान पान विधि—जिस स्त्री
का दूध दूषित हो उसे जौ, गेहूँ, हेमन्त धान्य, साठी चावल, मूग, हरेणु,
कुलत्थी, सुरा, सौवीरक, धान्याम्ल, तुषोदक, मैरेय, मेदक, लशुन, करंज आदि
का सेवन करना चाहिये । दूषित क्षीर के विशेष २ लक्षणों को (वात आदि को)
देख २ कर उनकी यथायोग्य चिकित्सा करनी चाहिये। पाठा, सोंठ, देवदारु,
नागरमोथा, मूर्वा, गिलोय, इन्द्रजौ, चिरायता, कुटकी, सारिवा इन पदार्थों के
कषायों का पान उत्तम है । इसी प्रकार अन्य तिक्त, कषाय, कटु और मधुर रस
वाले द्रव्यों का प्रयोग दूध के विकारों के कारणों को जान कर मात्रा में समय
पर करना चाहिये। यह दूधको साफ़ करने वाले उपायोंका वर्णन कर दिये हैं।

१३२ चरकसंहिता [ अ० ८
क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च
शाक-धान्य मांसानि द्रव-मधुराम्ल-भूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः
क्षीरपान चानायासश्चेति, वीरण-शालि-षष्टिकेश्रुवालिका-दर्भ-कुश-काश-
गुन्द्रेत्कट-मूल कषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि ॥ ५८ ॥
दूध-वर्धक पदार्थ-सीधु नामक मद्य को छोड़ कर शेष सब मद्य, ग्राम्य और
आनूप देशों मे उत्पन्न शाक, धान्य या मांस, द्रव, मधुर, अम्ल, लवण, बहुत
भोजन, दूध-वर्धक ओषधिया, दूध का पान और मेहनत न करना । वीरण,
साठी, हेमन्त धान्य, गन्ना, दाभ, कुश, काश गुन्द्रा, इत्कट इनकी जड़ों के
कषायों को पिलाना दूध-वर्धक है ॥५८॥
धात्री तु यदा स्वादु-बहुल-शुद्ध-दुग्धा स्यात्तदा स्नातानुलिप्ता शुक्ल
वस्त्रं परिधायैन्द्री ब्राह्मी शतवीर्याममोघामव्यथा शिवामरिष्टा वाट्यपुष्पी
विष्वक्सेनकान्ता वा बिभ्रत्योषधि कुमारं प्राङ्मुख प्रथम दक्षिण स्तनं
पाययेदिति धात्रीकर्म ॥ ५६ ॥
धात्री की नियुक्ति-जिस समय धात्री का दूध बहुत स्वाद, बहुत शुद्ध हो,
उस दिन स्नान कराके, चन्दन लगाकर सफेद बस्त्रों को पहिनाकर ऐन्द्री, ब्राह्मी,
शतवीर्या, सहस्रवीर्या, अमोघा, गिलोय, शिरा, वाट्यपुष्पी, अरिष्टा, विष्वक्सेन-
कान्ता आदि ओषधियो को धारण कराके, शिशु का शिर पूर्व की ओर करके
प्रथम दक्षिण स्तन पीने के लिये देना चाहिये । यह धात्री-कर्म का उपदेश
कर दिया है ॥५६॥
अतोऽनन्तरं कुमारागारविधिमनुव्याख्यास्यामः--वास्तु-विद्या-
कुशलः प्रशस्तं रम्यमत्तमस्क निवातं प्रवातैकदेश दृढमपगत-श्वापद-पशु
दंष्ट्रि-मूषिक पतङ्ग सुसंविभक्त-सलिलोदूखल-मूत्र-वर्चः-स्थान-स्नान-
भूमि-महानसमृतुसुख यथर्तुशयनासनास्तरणसंपन्न कुर्यात्तथा सुविहित-
रक्षा-विधान-बलि-मङ्गल-होम प्रायश्चित्तं शुचि-वृद्ध-वैद्यानुरक्त-जन-सपू-
र्णमिति कुमारागारविधिः ॥ ६० ॥
कुमारागार विधि-इसके आगे कुमारागार विधि का वर्णन करते हैं।
मकान की रचना को जानने वाला वास्तुविद्या में कुशल पुरुष उत्तम, सुन्दर,
प्रकाशयुक्त, वायुदार ( परन्तु जोर से चारों ओर की वायु न आये ), मजबूत,
गाय, बकरी, पशु आदि और बिछी आदि दाढ़ वाले पशु, चूहे, पतंग आदि
से रहित, पानी, उलूखल, मूत्रस्थान, मलस्थान, स्नानगृह, रसोई आदि पृथक्
पृथक् ऋतु के अनुकूल, ऋतु के अनुसार, बिस्तर आसन, बिछौने से युक्त घर