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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे ।

अ० ८ ] इन्द्रियस्थानम् १६३

( १ ) जिस रोगी की छाया वा प्रतिबिम्ब के शिर नीचे और पाव ऊपर
( अवाक्-शिर ) हो, अथवा जिसकी छाया वा प्रतिबिम्ब कुटिल हो, या जिस में
शिर का भाग न दीखता हो, वैद्य उस रोगी की चिकित्सा न करे ।
( २ ) जिस रोगी की दोनों पलकों के रोम जटा के समान गुझला जाये
तथा आखें बन्द हो जायें, ऐसे रोगी का औषध से उपचार न करे, ऐसे को
औषध देना व्यर्थ होता है ।
( ३ ) जिस रोगी की आंखें, नाक, कान आदि मूज जायें और फिर अच्छी
न हों वा अपने स्थान में न समावे, तथा आले लिपसी जावें, वह रागी प्रेत
( मृत ) के समान होता है ।
( ४ ) जिस रोगी के भोहों में या शिर के बालों में चमत्कारिक सीमन्त
( माग जैसी रेखा ) या बहुत से भवर ( गोल चक्कर ) बिना बनाये, अकारण
ही आ जाये उसे मरणासन्न कहे ।
( ५ ) ये लक्षण यदि रोगी पुरुष में दीखे, तो वह तीन दिन मे अधिक
नहीं जीता, और यदि स्वस्थ पुरुष मे ये लक्षण हों तो वह छ रात से अधिक
नहीं जीता ॥ ३-७ ॥
आयम्योत्पाटितान् केशान् यो नरो नावबुध्यते ।
अनातुरो वा रोगी वा षड्रात्रं नानिवर्तते ॥ ८ ॥
यस्य केशा निरभ्यङ्गा दृश्यन्तेऽभ्यक्तसन्निभाः ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
( ६ ) जो स्वस्थ या रोगी पुरुष शिर के बालों को खींचकर उखाड़ने पर
भी नहीं जाने वह छ दिन से अधिक नहीं जीता ।
( ७ ) शिर के बालों पर तैल न लगाने पर भी जिस रोगी के बालों मे तैल
की-सी चमक दिखाई दे, उसकी आयु समाप्त जान कर बुद्धिमान् पुरुष उसकी
चिकित्सा न करे ॥ ८-६ ॥
ग्लायतो नासिकावंशः पृथुत्वं यस्य गच्छति ।
अशूनः शूनसकाशः प्रत्याख्येय स जानता ॥ १० ॥
अत्यर्थविवृता यस्य यस्य चात्यर्थसंवृता ।
जिह्वा वा परिशुष्का वा नासिका न स जीवति ॥ ११ ॥
( ८ ) जिस रोगी का नासिका वश निर्बल होकर नम जाये, या बहुत मोटा
वा बड़ा हो जाये वास्तव में सूजन न होने पर सूजा हुआ लगे, वह रोगी
त्याज्य है । (९) जिस रोगी की नासिका बहुत फैल जाये या बहुत सकुचित, तग
हो जाये, कुटिल हो जाये वा सूख जाये वह रोगी अधिक नहीं जीता ॥१०-११॥

१७० चरकसंहिता [ अ० ८

मुखं शब्दश्रवावोष्ठौ शुक्लश्यावातिलोहितौ ।
विकृतौ यस्य वा नीलौ न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १२ ॥
( १० ) जिस रोगी का मुख, दोनों कान और दोनों ओठ (विकार के
कारण) श्वेत, काले, लाल, वा नीले हो जाते हैं, वह रोग से मुक्त नहीं होता,
वह मर जाता है ॥ १२ ॥
अस्थिश्वता द्विजा यस्य पुष्पिताः पङ्कसंवृताः ।
विकृत्या न स रोगं तं विहायाऽऽरोग्यमश्नुते ॥ १३ ॥
( ११ ) जिस रोगी के दांत विकार से अस्थि के समान श्वेत, पुष्पित
अथवा कीचड़ या मैल से ढक जाते हैं, वह रोगी रोग से छूट कर कभी आरोग्य
लाभ नहीं करता ॥ १३ ॥
स्तब्धा निश्चेतना गुर्वी कण्टकापचिता भृशम् ।
श्यावा शुष्काऽथवा शूना प्रेतजिह्वा बिसर्पिणी ॥ १४ ॥
( १२ ) जिस रोगी की जीभ स्तब्ध, —जड़, कड़ी, चेतना रहित, भारी
और बहुत से कांटों से भर जाये, काली, लाल, सूखी या सूजी हुई अथवा
बाहर को निकल २ आवे, यह जिह्वा मृतपुरुष का लक्षण है ॥ १४ ॥
दीर्घमुच्छ्वस्य यो ह्रस्वं नरो निःश्वस्य ताम्यति ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
( १३ ) जोर से बाहर सांस फेंक कर जो रोगी अन्दर छोटा (थोड़ा वायु)
सांस लेता है, और सांस लेते समय कष्ट अनुभव करता या मूर्च्छित हो जाता है,
उस रोगी की आयु मरणासन्न समझकर उसे त्यागना चाहिये ॥ १५ ॥
हस्तौ पादौ च मन्ये च तालु चैवातिशीतलम् ।
भवत्यायुःक्षये क्रूरमथवाऽतिभवेन्मृदु ॥ १६ ॥
( १४ ) जीवन के नाश के समय हाथ, पाव, गले की नसे, तालु बहुत
ठण्डे या बहुत कठोर अथवा बहुत कोमल हो जाते हैं ॥ १६ ॥
घट्यञ्जानुना जानु पादावुद्यम्य पातयन् ।
योऽपास्यति मुहुर्वक्त्रमातुरो न स जीवति ॥ १७ ॥
( १५ ) जो रोगी घुटनों से घुटनों को रगड़ता है, पाव को ऊपर उठाकर
जमीन पर पटकता है, बार-बार मुख को इधर-उधर चलाता है वह रोगी
नहीं बचता ॥ १७ ॥
दन्तैश्छिन्दन्नखाग्राणि नखैश्छिन्दञ्छिरोरुहान् ।
काष्ठेन भूमिं बिलिखन्न रोगात्परिमुच्यते ॥ १८ ॥