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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०५

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अ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०५
भेषजं शृण्वतः परम् ॥ ७२ ॥
ग्रहणीमाश्रितं दोषं विदग्धाहारमूर्च्छितम् ।
सविष्टम्भप्रसेकार्तिविदाहारुचिगौरवैः ॥ ७३ ॥
आमलिङ्गान्वितं ज्ञात्वा सुखोष्णेनाम्बुनोद्धरेत् ।
फलानां वा कषायेण पिप्पलीसर्षपैस्तथा ॥ ७४ ॥
अब ग्रहणी-रोग की चिकित्सा सुनो—
( १ ) आम दोष मे चिकित्सा—जिस समय आहार विदग्ध होता हो,
विष्टम्भ ( मल का अवरोध ), मुख से लाला-स्राव, पीड़ा, विदाह, अरुचि और
भारीपन हो उस समय ग्रहणी मे आश्रित दोषो को आम के लक्षणो से युक्त
समझना चाहिये । १इसके लिये ( १ ) रोगी को गरम सुहाते पानी से वमन
कराना चाहिये । अथवा ( २ ) मैनफल के क्वाथ से या पिप्पली और सरसो के
क्वाथ से वमन कराना चाहिये । या ( ३ ) मैनफल क क्वाथ मे ही पिप्पली और
सरसो का कल्क मिला कर वमन कराना चाहिये ॥ ७२-७४ ।
लीनं पक्वाशयस्थं वाप्यामं स्राव्यं सदीपनैः ।
शरीरानुगते सामे रसे लंघनपाचनम् ॥ ७५ ॥
( २ ) यदि आम-दोष कोष्ठ मे लीन ( छिपा या व्याप्त ) हो अथवा
पक्वाशय ( आतो मे ) मे पहुचा हो तो दीपनीय ओषधियो से रोगी को विरेचन
देकर इस आम को निकालना चाहिये और यदि आम सम्पूर्ण शरीर मे (अपक्वा-
वस्था मे) व्याप्त हो जाये तो रोगी को लंघन और पाचन देने चाहियें ॥ ७५ ॥
विशुद्धामाशयायास्मै पञ्चकोलादिभिः शृतम् ।
दद्यात् पेयादि लघ्वन्नं पुनर्योगांश्च दीपनान् ॥ ७६ ॥
( ३ ) जिस समय रोगी का आमाशय शुद्ध हो जाये तब पञ्चकोल ( पिप्पली,
पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सोठ ) और दीपनीय ओषधियो से साधित
पेयादि लघु अन्न देने चाहिये और अन्य दीपनीय-योगो का प्रयोग करना चाहिये ७६
ज्ञात्वा तु परिपक्वामं मारुतग्रहणीगदम् ।
दीपनीययुतं सर्पिः पाययेताल्पशो भिषक् ॥ ७७ ॥
१ चिरकृद् ग्रहणी दोषः सञ्चाच्चोपवेशयेत् ॥ अ० स० ।
अतिसार मे मल अत्यधिक और साम तथा निराम बार-बार आता है । जब
अन्न पचता नही तब ग्रहणी मे मल साम और भुक्त अन्न से युक्त होता है और
जब अन्न पच जाता है तब मल पका हुआ आता है या आता ही नही । इसमे
मल बिना कारण ही बधा और बिना कारण ही शिथिल आता है ।

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६०६ चरकसंहिता [ अ० १५
(४) वातजन्य ग्रहणी मे पेया और दीपनीय योगो से जब आम का परि-
पाक हो जाये तब वैद्य को चाहिये कि सूत्रस्थान मे कहे ( चतुर्थ ) दीपनीय
औषधियो से साधित घृत को थोड़ा थोड़ा करके देवे ।। ७७ ।।
किञ्चित्सन्धुक्षिते त्वग्नौ सक्तविण्मूत्रमारुतम् ।
द्वयहं त्र्यहं वा संस्नेह्य स्विन्नाभ्यक्तं१ निरूहयेत् ॥ ७८ ॥
(५) घृत के प्रयोग से जब अग्नि कुछ प्रदीप्त हो जाये तो यदि रोगी के
मल, मूत्र ओर आयु रुके हो तो दो या तीन दिन घृत पान कराना चाहिये और
रोगी को स्वेदन तथा तैल का अभ्यग देकर आस्थापन कराना चाहिये ॥ ७८ ॥
तत ऐरण्डतैलेन सर्पिषा तैलवकेन वा ।
सक्षारेणानिले शान्ते स्रस्तदोषं विरेचयेत् ॥ ७६ ॥
( ६ ) इस प्रकार से जब वायु शान्त हो जाये और दोष ढीले हो
जाएँ तब एरण्ड तैल से अथवा यवक्षारयुक्त तिल्वक घृत से रोगी को विरेचन
देना चाहिये ॥ ७६ ॥
शुद्धं रूक्षाशयं बद्धवर्चसं चानुवासयेत् ।
दीपनीयाम्लवातघ्नसिद्धतैलेन मात्रया ॥ ८० ॥
( ७ ) रोगी के आशय और पक्वाशय जब शुद्ध हो जाये, तथा कोष्ठ या
आशयों मे रूक्षता अनुभव होने पर, मल के बँध जाने पर अनुवासन देना
चाहिये । इसके लिये दीपनीय अम्ल तथा वात-नाशक ओषधियों से तैल सिद्ध
करके मात्रा मे अनुवासन देना चाहिये ॥ ८० ॥
निरूढं च विरिक्तं च सम्यक् चैवानुवासितम् ।
लध्वन्नप्रतिसंयुक्तं२ सर्पिरभ्यासयेत्पुनः ॥ ८१ ॥
जब रोगी को निरूह बस्ति, विरेचन और अनुवासन भली प्रकार से दिये
जा चुके तब पेया आदि लघु अन्न का भोजन करने वाले रोगी को घृत का पुन.
धीरे धीरे अभ्यास कराना चाहिये ॥ ८१ ॥
द्वे पञ्चमूले सरलं देवदारु सनागरम् ।
पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ८२ ॥
शणबीजं यवान्कोलान्कुलत्थान्सुरभींस्तथा ।
पाचयेदारनालेन दध्ना सौवीरकेण वा ॥ ८३ ॥
चतुर्भागावशेषेण पचेत्तेन घृताढकम् ।
१. 'द्वित्रीण्यहानि सस्नेहं स्नेहाभ्यक्त' इति पाठान्तरम् ।
२. 'सभुक्तः' इति पाठान्तरम् ।