चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ११] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१
अ० ११] ३१ चिकित्सितस्थानम् ४८१
यह अमृतप्राश घृत नष्टशुक्र, क्षतक्षीण, दुर्बल, रोगों से कृश हुए, अति-
मैथुनशील, हीनमांस, वर्ण, स्वर से हीन व्यक्तियों को पुष्ट करता है। यह घृत
कास, हिक्का, ज्वर, श्वास, दाह, प्यास, रक्तपित्त, वमि, मूर्च्छा, हृदय
रोग, योनिरोग और मूत्ररोग को नष्ट करता है, यह घृत पुत्रदायक अर्थात्
वीर्यवर्धक है ॥३५-४३ ॥
श्वदंष्ट्रोशीरमञ्जिष्ठाबलाकाश्मर्यकत्तृणम् ।
दर्भमूलं पृथक्पर्णीं पलाशर्षभकौ स्थिराम् ॥ ४४ ॥
पलिकान् साधयेत्तेषां रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
कल्कैः स्वगुप्ताजीवन्तीमेदर्षभकजीवकैः ॥ ४५ ॥
शतावर्या द्विमृद्वीकाशर्कराश्रावणीबिसैः ।
प्रस्थः सिद्धो घृताद्वातपित्तहृद्द्रव'शूलनुत् ॥ ४६ ॥
मूत्रकृच्छ्रप्रमेहार्शः कास'शोपक्षयापहः ।
धनुःस्त्रीमद्यभाराध्वखिन्नानां बलमांसदः ॥ ४७ ॥
इति श्वदंष्ट्रादिघृतम् ।
(१६( श्वदंष्ट्रादि घृत-गोखरू, खस, मजीठ, खरेंटी, गम्भारी, रोहिषतृण,
दर्भमूल, पृश्निपर्णी, ढाक, ऋषभक, शालपर्णी प्रत्येक एक एक पल लेकर आठ
गुणे जल में पकावे । चतुर्थांश रहने पर इसमे घी से चौगुना दूध मिलावे ।
कल्कार्थ—कोंच, जीवन्ती, मेदा, ऋषभक, जीवक, शतावरी, ऋद्धि, द्राक्षा,
शर्करा, श्रावणी (गोरखमुण्डी), बिस (मृणाल) इनका घी से एक चतुर्थांश
कल्क लेकर उसके द्वारा घी का एक प्रस्थ सिद्ध करे ।
यह घृत वातजन्य और पित्तजन्य हृदयशूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, अर्श, कास,
शोष और क्षय का नष्ट करता है, धनुष, भार, स्त्री, मद्य, यात्रा से क्षीण
व्यक्तियों का बल और मांस देता है ॥ ४४-४७ ॥
मधुकाष्टपलं द्राक्षाप्रस्थक्वाथे घृतं पचेत् ।
पिप्पल्यष्टपले कल्के प्रस्थं सिद्धे च शीतले ॥ ४८ ॥
पृथगष्टपलं क्षौद्रशर्कराभ्यां विमिश्रयेत् ।
समं शक्तु क्षतक्षीणे रक्तगुल्मे च तद्धितम् ॥ ४६ ॥
इति शक्तुप्रयोगः ।
जिसको खाया था वह सुधा और देवों ने जिसका पान किया था वह अमृत
कहाया था । नाग और देव दोनो उनको सेवन कर दीर्घजीवी और अमर हुए
ऐसी प्रसिद्धि है। इन दोनों के ही तुल्य यह अमृतप्राश घृत समझना चाहिये। चक्र०
१ 'हृद्द्रव' इति । २ 'काम' इति च पाठ.।
४८२ चरकसंहिता [ अ० ११
( १७ ) सक्तु प्रयोग—मुलहठी आठ पल, सूखी दाख एक प्रस्थ इनके
क्वाथ मे पिप्पली का कल्क आठ पल मिला कर घी का एक प्रस्थ ( १६ पल )
सिद्ध करे । सिद्ध होने पर जब ठण्डा हो जाये तब मधु आठ पल, शर्करा
( खाण्ड ) आठ पल मिलावे । इस घी को सत्तू के समान भाग मे मिला कर
खांवे । यह घृत क्षतक्षीण और रक्तगुल्म रोगो मे हितकारी है ॥ ४८-४६ ॥
धात्रीफलविदारीक्षुजीवनीयरसाद् घृतात् ।
अजागोपयसोश्चैव सप्त प्रस्थान्पचेद्भिषग् ॥ ५० ॥
सिद्धशीते सिताक्षौद्र द्विप्रस्थं विनयेत्ततः ।
यक्ष्मापस्मारपित्तासृक्कासमेहक्षयापहम् ॥ ५१ ॥
वयःस्थापनमायुष्यं मांसशुक्रबलप्रदम् ।
( १८ ) आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का
रस एक प्रस्थ, जीवनीय गण का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध एक प्रस्थ,
गाय का दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, इन सात वस्तुओ को पकावे । इस घृत
के शीतल होने पर शर्करा एक प्रस्थ ( १६ पल ) और मधु एक प्रस्थ मिलावे ।
यह घृत यक्ष्मा, अपस्मार, रक्तपित्त, कास, प्रमेह और क्षय को नष्ट करता है,
यौवन को बनाये रखन और बुढापे को दूर करने वाला, आयुर्वर्धक और मास
शुक्र तथा बल को बढाता है ॥ ५०-५१-॥
घृतं तु पित्तेऽभ्यधिके लिह्याद्वातेऽधिके पिबेत् ॥ ५२ ॥
लीढं निर्वापयेत्पित्तमल्पत्वाद्वन्ति नानलम् ।
आक्रामत्यनिलं पीतमूष्माणं निरुणद्धि च ॥ ५३ ॥
( १६ ) पित्त के प्रबल होने पर घी चाटे, वायु के अधिक होने पर घृतका
पान करे । पित्त के अधिक होने पर चाटा हुआ घृत पित्त को तो शान्त करता
है और मात्रा में थोड़ा होने से जाठर-अग्नि का नाश नही करता । वायु के
अधिकता मे पिया हुआ घृत स्निग्ध और गुरु होने से वायु को शमन करता है
वायु रूक्ष और लघु होता है । बलवान् वायु पक्वाशय से जिस उष्णिमा को ले
जा रहा हो, उसको शान्त करता है ॥ ५२-५३ ॥
क्षामक्षीणकृशाङ्गानामेतान्येव घृतानि च ।
त्वक्क्षीरीशर्करालाजचूर्णैः स्यानानि१ योजयेत् ॥ ५४ ॥
क्षाम (क्रान्त शरीर), क्षीण और कृश अगो-वाले व्यक्तियों मे उपरोक्त घृत
१ 'पानानि' च पाठः ।
अ० ११ ] चिकित्सितस्थानम् ४८३
वशलोचन, पिप्पला, लाजा इनके चूर्णो से गाढा ( घन ) पान बना कर
सेवन करावे ॥ ५४ ॥
सर्पिर्गुडान् समध्वक्षाञ्जग्ध्वा चानु पयः पिवेत् ।
रेतो वीर्य बलं पुष्टिं तैराशुतरमाप्नुयात् ॥ ५५ ॥
( २० ) सर्पिर्गुड— ( १ ) वशलोचन, पिप्पली और लाजा चूर्ण से बने
बनाये घृतो को मधु के साथ सेवन करे पीछे से दूध पीवे । इस प्रकार करने से
शुक्र, सामर्थ्य, बल और पुष्टि शीघ्र प्राप्त होती है ॥ ५५ ॥
बला विदारी ह्रस्वा च पञ्चमूली पुनर्नवा ।
पञ्चानां क्षीरिवृक्षाणा शुङ्गा मुष्ट्यशका अपि ॥ ५६ ॥
एषा कषाये द्विक्षीरे विदार्याजरसांशिके ।
जीवनीयैः पचेत्कल्केैरक्षमात्रैर्घृताढकम् ॥ ५७ ॥
सितापलानि पूतेऽस्मिन् शीते द्वात्रिंशदावपेत् ।
गोधूमपिप्पलीवाशीचूर्ण शृङ्गाटकस्य च ॥ ५८ ॥
सक्षौद्रं कुडवाशेन तत्सं खजमूर्च्छितम् ।
स्त्यानं सर्पिर्गुडान् कृत्वा भूर्जपत्रेण वेष्टयेत् ॥ ५९ ॥
ताञ्जग्ध्वा पलिकान् क्षीरं मद्य चानुपिवेत्कफे ।
शोषे कासे क्षते क्षीणे श्रमस्त्रीभारकर्पिते ॥ ६० ॥
रक्तनिष्ठीवने तापे पीनसे चोरसि स्थिते ।
शस्ताः पार्श्वशिरःशूले विभेदे स्वरवर्णयोः ॥ ६१ ॥
इति द्वितीयसर्पिर्गुडाः ।
( २१ ) सर्पिर्गुड़ ( २ )—क्वाथ के लिये खरैटी, विदारीकन्द, लघुपञ्च
मूल ( शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू ) पाचो क्षीरी
वृक्षो ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, अश्वत्थ ) के नवीन कोमल पत्ते प्रत्येक
एक मुष्टि ( पल ) लेकर आठ गुणे जल मे क्वाथ करे । चतुर्थाश रहने पर उतार
ले । कषाय से दुगुना दूध, विदारी का स्वरस तथा बकरे का मास रस प्रत्येक
कषाय के समान, अथवा एक एक आढक, कल्कअर्थ-जीवक, ऋषभक आदि
जीवनीय गण की दस ओषधिया प्रत्येक एक एक कर्ष, घृत एक आढक ( चार
प्रस्थ ) लेकर यथाविधि घृतपाक करे । सिद्ध होने पर छान कर इस घृत मे
मिश्री बत्तीस पल, गेहूँ, पिप्पली, वशलोचन, सिंघाड़ा इनमे से प्रत्येक का चूर्ण
और शहद प्रत्येक एक एक कुडव ( चार पल ) मिला कर खौचे से भली
प्रकार चलावे, जिससे गाढा हो जाये । फिर इनकी एक एक पल की गुटिकाये
४८४ चरकसंहिता [ अ० ११
बाध कर शक्ति बढाने के लिये भूर्जपत्र ( भोजपत्र ) से लपेट दे । इन गुटि-
काओ का एक पल परिमित मात्रा मे खाकर, यदि वायु और पित्त की अविकता
हो तो ऊपर से दूध पीवे, कफ की प्रबलता हो तो मद्य का अनुपान करे । ये
सर्पिर्गुड़ शोष, क्षत, कास क्षीण, श्रम, भार और स्त्री-प्रसग से कृश हुए व्यक्तियो
के लिये, रक्तवमन, पीनस, उरोदाह, पार्श्वशूल, शिर शूल स्वरभेद और विवर्णता
मे हितकारी हे ॥ ५६-६१ ॥
त्वक्क्षीरीश्रावणीद्राक्षामूर्वर्षभकजीवकैः ।
वीरर्द्धिक्षीरकाकोलीबृहतीकपिकच्छुभिः ॥ ६२ ॥
खर्जूरफलमेदाभिः क्षीरपिष्टैः पलोन्मितैः ।
धात्रीविदारीक्षुरसप्रस्थः प्रस्थं घृतात्पचेत् ॥ ६३ ॥
शर्करार्धतुला शीते क्षौद्रार्धप्रस्थमेव च ।
क्षिप्व्रा सर्पिर्गुडान्कुर्यात्कासहिक्काज्वरापहान् ॥ ६४ ॥
यक्ष्माणं तमकं श्वासं रक्तपित्त हलीमकम् ।
शुक्रनिद्राक्षयं तृष्णा हन्युः कार्श्यं सकामलम् ॥ ६५ ॥
इति तृतीयसर्पिर्गुडकाः ।
सर्पिर्गुड ( ३ )—वंशलोचन, श्रावणी (गोरखमुण्डी), द्राक्षा, मूर्वा, जीवक,
ऋषभक, वीरा ( पृश्निपर्णी या शतावरी ), ऋद्धि, क्षीरकाकोली, बड़ी कटेरी,
कोंच, खजूर, मेदा प्रत्येक द्रव्य एक एक पल लेकर दूध के साथ खूब बारीक
पीस ले । आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का रस
एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ लेकर उपराक्त कल्क के साथ घृत सिद्ध करे । घी
के शीतल होने पर शर्करा पचास पल, मधु आठ पल मिला कर घृतपिण्ड बना
लेवे । ये घृतपिण्ड कास, हिचकी, ज्वर, यक्ष्मा, तमक श्वास, रक्तपित्त, हलीमक,
शुक्रक्षय, निद्राक्षय, तृष्णा, कृशता और कामला का नष्ट करते है ॥६२-६५॥
नवमामलकं द्राक्षा १मात्मगुप्ता पुनर्नवाम् ।
शतावरी विदारी च समागा पिप्पली तथा ॥ ६६ ॥
पृथग्दशपलान् भागान् पलान्यष्टौ च नागरात् ।
यष्ट्याह्वासौवर्चलयोर्द्विपलं मरिचस्य च ॥ ६७ ॥
क्षीरतैलघृताना च त्र्याढकं शर्कराश्रृते ।
कथिते तानि चूर्णानि दत्त्वा बिल्वसमान् गुडान् ॥६८॥
कुर्यात्तानभक्षयेत्क्षीणः क्षतशुष्कश्च मानवः ।
१ 'द्राक्षा नवामामलकी' इति वा पाठः ।