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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० १५ ] ३६ चिकित्सितस्थानम् ६०६

अ० १५ ] ३६ चिकित्सितस्थानम् ६०६
( १२ ) अथवा पञ्चमूलादि दस द्रव्यो के चूर्ण को गरम पानी के साथ
पीना चाहिये । इस चूर्ण को वात, कफजन्य से आवृत ग्रहणी रोग में, आमयुक्त
ग्रहणी रोग मे, कफजन्य या वात प्रबल ग्रहणी रोग मे इस चूर्ण का व्यवहार
करना चाहिये यह चूर्ण अति अग्निवर्धक है१ ॥६२-६३॥
मज्जत्यामाद् गुरुत्वाद्विट् पक्वा तूत्प्लवते जले ।
विनाऽतिद्रवसंघातशैत्यश्लेष्मप्रदूषणात् ॥ ६४ ॥
परीक्ष्यैवं पुरा सामं निरामं चामदोषिणाम् ।
विधिनोपाचरेत्सम्यक् पाचनेनेतरेण वा ॥ ६५ ॥
साम और निराम मल की परीक्षा—अति द्रव, सघात ओर शैत्य अथवा
कफ से यदि मल दूषित न हो तो मल आम के कारण भारी होने से पानी में
डूब जाता है और पक्व मल पानी मे तैरता है ।
अपवाद—( १ ) अति द्रव होने के कारण आम-मल भी पानी मे तैरता
है । ( २ ) अतिसहित ( घट्ट ) होने से पक्व मल भी पानी मे डूब जाता हे ।
( ३ ) शैत्य और कफ से दूषित पक्व मल भी पानी मे डूब जाता है ।
इस प्रकार से प्रथम साम या दोषयुक्त निराम की परीक्षा करके भली प्रकार
से वात या कफ दोष का निश्चय करके विधिपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये अथवा
पाचन-औषध देनी चाहिये । जिससे आम का परिपाक हो जाये ॥ ६४-६५ ॥
चित्रकं पिप्पलीमूलं द्वौ क्षारौ लवणानि च ।
व्योषं हिङ्ग्वजमोदा च चव्यं चैकत्र चूर्णयेत् ॥ ६६ ॥
गुडिका मातुलुङ्गस्य दाडिमस्य रसेन वा ।
कृता विपाचयन्त्यामं दीपयन्त्याशु चानलम् ॥ ६७ ॥
इति चित्रकाद्या गुडिका ।
( १३ ) चित्रकाद्या गुडिका—चीता, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, यवक्षार,
पाचों नमक ( सैन्धव, विड, साभर, सचल आर उद्भिद ), व्योष ( साठ,
मरिच और पिप्पली ), हींग, अजवायन, चविका इन सब को समान भाग
लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये२ । इस चूर्ण मे मातुलुग (गलगल) का रस अथवा
१ आम का लक्षण—आमाशयस्थः कायाग्नेर्दौर्बल्यादविपाचितः ।
आद्य आहार धातुर्यः स आम इति संज्ञितः ॥
आमं अन्नरस केचित् केचित्तु मलसच्चयम् ।
प्रथम दोषदुष्टि च केचिदाम प्रचक्षते ॥
२ कोई कोई पाच के स्थान में तीन नमक डालने का आदेश देते हैं ।

६१० चरकसंहिता [ अ० १५
अनार का रस मिला कर गोलिया बना लेनी चाहियें, ये गोलिया आम का परि-
पाक करनी और अग्नि को बढ़ाती है ॥ ६६-६७ ॥
नागरातिविशामुस्तक्वाथः स्यादाकपाचनः ।
मुस्तान्तकल्कः पथ्या वा नागरं चोष्णवारिणा ॥ ६८ ॥
देवदारुवचामुस्तनागरातिविषाभयाः ।
वारुण्यामासुतास्तोये कोष्णे वाऽलवणाः पिवेत् ॥ ६६ ॥
वर्चस्यामे सशूले च पिबेद्वा दाडिमाम्बुना ।
बिडेन लवणं पिष्ट्वा बिल्वं चित्रकनागरम् ॥ १०० ॥
सामे वा सकफे वाते कोष्ठशूलकरे पिवेत् ।
(१४) छः योग—(१) सोंठ, अतीस, मोथा इनका क्वाथ पीने से आम
का पाचन होता है । अथवा (२) सोंठ, अतीस, मोथा, हरड़ या इनके सोंठ
चूर्ण को गरम पानी से पीना चाहिये । (३) देवदारु, वच, मोथा, सोंठ,
अतीस और हरड़ इनके चूर्ण को भवके मे खींच वारुणी के पानी के साथ पीना
चाहिये अथवा (४) गरम पानी में नमक मिला कर पीना चाहिये, अथवा
(५) अनार के रस के साथ पीना चाहिये । इससे कर्त्तन के समान पीड़ा और
आमयुक्त मल नष्ट होता है । (६) आमयुक्त मल मे अथवा शूल होने पर
बिड् (काला नमक), सैन्धा नमक, बेलगिरी, चीता और सोंठ इनको पीस कर
अनार के रस के साथ पीना चाहिये ॥ ६८-१०० ॥
कलिङ्ग हिङ्ग्वतिविषावचासौवर्चलाभयाः ॥ १०१ ॥
(१५) यदि उदर मे शूल आम के कारण या वात मिश्रित कफ के का-
रण से होती हो तो इन्द्रजौ, हींग, अतीस, बच, सौवर्चल (सचल नमक) और
हरड़ इनके चूर्ण को अनार के रस के साथ पीना चाहिये ॥ १०१ ॥
छर्द्यर्शोग्रन्थिशूलेषु पिबेदुष्णेन वारिणा ।
पथ्यासौवर्चलाजाजिचूर्णं मरिचसयुतम् ॥ १०२ ॥
(१६) वमन, अर्श, ग्रन्थि-शूल मे—हरड़, सचल नमक, काला जीरा
और मरिच इनके चूर्ण को गरम पानी से पीना चाहिये ॥ १०२ ॥
अभयां पिप्पलीमूलं वचां कटुकरोहिणीम् ।
पाठां वत्सकबीजानि चित्रकं विश्वभेषजम् ॥ १०३॥
पिबेन्निष्क्वाथ्य चूर्णानि कृत्वा कोष्णेन वारिणा ।
पित्तश्लेष्माभिभूतायां ग्रहण्यां शलनुद्वितम् ॥ १०४ ॥
(१७) पित्त-कफजन्य ग्रहणीरोग में यदि तीव्र शूल होरहा हो तो हरड़,