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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५५

अ० ९ ] चिकित्सास्थानम् ४५५
का दूध एक आढक, गाय का मूत्र एक आढक, पुरातन (दस साल पुराना) घृत
एक प्रस्थ, इन सब से यथाविधि घृत पाक करे । सिद्ध होने पर छान कर ठण्डा
होने पर इसमे हींग का चूर्ण एक पल और शहद दो कुडव मिला देवे । यह
घृत पान, अभ्यङ्ग, नस्य मे प्रयोग करने से दोषजन्य, आगन्तुज उन्माद रोग,
विषमज्वर और अपस्मार को शीघ्र नष्ट करता है ॥ ५६-५८ ॥
लशुनस्याविनष्टस्य तुलाधे निस्तुषीकृतम् ।
तदर्धं दशमूलस्य द्वयाढकेऽपां विपाचयेत् ॥ ५९ ॥
पादशेषे घृतप्रस्थं लशुनस्य रसं तथा ।
कोलमूलकवृक्षाम्लमातुलुङ्गाद्रकै रसैः ॥ ६० ॥
दाडिमाम्लसुरामस्तुकाञ्जिकाम्लैस्तदर्धिकैः ।
साधयेत् त्रिफलादारुलवणव्योषदीप्यकैः ॥ ६१ ॥
यवानीचव्यहिङ्ग्वम्लवेतसैश्च पलार्धिकैः ।
सिद्धमेतत्पिबेच्छूलगुल्माशोजठरापहम् ॥ ६२ ॥
ब्रध्नपाण्ड्वामयप्लीहयोनिदोषज्वरकृमीन् ।
वातश्लेष्मामयान्त्सर्वानुन्मादं चापकर्षति ॥ ६३ ॥
इति द्वितीयं लशुनाद्यं घृतम् ।
(६) लशुनाद्य घृत (२)—रस, गन्ध आदि से युक्त लहसुन को छिलके
रहित करके उसकी गिरी ५० पल, मिलित दशमूल २५ पल, इनको दो आढक
जल मे पकावे । जब चौथाई रह जाये तो वस्त्र से छान ले । फिर पुरातन घृत
एक प्रस्थ, लशुन का रस १ प्रस्थ, बेर मूली, वृक्षाम्ल (समाक दान), बिजौरा,
अदरक, अनार का रस, सुरा, मस्तु, काजी ये प्रत्येक आधा प्रस्थ, त्रिफला,
देवदारु, सैन्धानमक, त्रिकटु, अजमोदा, दीप्यक (जीरा), चव्य, हींग, अम्ल-
वेत प्रत्येक आधा पल, लेकर घृत सिद्ध करे । यह सिद्ध हुआ घृत शूल, गुल्म,
अर्श, उदर रोग, ब्रध्न, पाण्डु-रोग, प्लीहा, योनि दोष, ज्वर, कृमि और वात-कफ
रोगो और उन्माद को नष्ट करता है ॥ ५६-६३ ॥
हिङ्गुना हिङ्गुपर्ण्या च सकायस्थावयस्थया ।
सिद्धं सर्पिर्हितं तद्वद्वयःस्थाहिङ्गुचौरकैः ॥ ६४ ॥
केवलं सिद्धमेभिर्वा पुराणं पाययेद् घृतम् ।
पाययित्वोत्तमा यात्रा श्वभ्रे रुन्ध्याद् गृहेऽपि वा ॥ ६५ ॥
विशेषतः पुराणं च घृतं त पाययेद्भिषक् ।
हींग, हिंगुपर्णी (वेणुपत्री या डीकामारी), कायस्था (हरड़), वयस्था
(आवला), इनके कल्क से सिद्ध घृत अथवा वयस्था (आवला), हींग, चोरक

४५६ चरकसंहिता [ अ० ६
( सुगन्धित द्रव्य ) इनसे सिद्ध घृत उन्माद रोग मे हितकारी है, ये दो योग
हैं । अथवा हीग, सौवर्चल, त्रिकटु द्वारा पुरातन घृत को सिद्ध करके पिलावे
उन्माद रोगी को घी की उत्तम मात्रा ( जो कि २४ घण्टे अर्थात् दिन-रात मे
जीर्ण हो ) पिला कर पानी रहित गढे या घर मे बन्द कर देवे१ ॥६४-६५॥
उग्रगन्धं पुराणं स्याद्दशवर्षस्थितं घृतम् ॥ ६६ ॥
लाक्षारसनिभं शीतं तद्धि सर्वग्रहापहम् ।
मेध्यं विरेचनेऽपथ्यं प्रपुराणमतः परम् ॥ ६७ ॥
त्रिदोषघ्नं पवित्रत्वाद्विशेषाद् ग्रहमोक्षणम् ।
गुणकर्माधिकं स्थानादास्वादात्कटुतिक्तकम् ॥ ६८ ॥
नासाध्यं नाम तस्यास्ति यत्स्याद्वर्षशतस्थितम्२ ।
दृष्टं स्पृष्टमथाघ्रातं तद्धि सर्वग्रहापहम् ।
अपस्मारग्रहोन्मादवतां शस्तं विशेषतः ॥ ६६ ॥
( ७ ) पुरातन घृत—जो घी दस साल पुराना हो जाये, जिसमे कि तीव्र
गन्ध आने लगे, जिसका रग लाख के समान लाल हो जाये, वह शीतवीर्य होता
है, उसका नाम पुराना घृत है । दस वर्ष के पीछे घृत अति पुरातन हो जाता
है इसको 'प्र-पुराण' कहते हैं । वह त्रिदोषनाशक पवित्र होने से खासकर ग्रह
रोगो को नष्ट करता है, पीने से अधिक गुणशाली है, स्वाद मे कटु-तिक्त रस है,
कान, आख के रोगो को नष्ट करता, विषनाशक और पवित्र करने वाला है ।
और बारह साल पुराने घृत से कोई भी रोग असाध्य नही है । इसके देखने,
छूने ओर सूघने से वीसर्प और ग्रह-रोग नष्ट होते है । वह अपस्मार, विष,
उन्माद और वायु रोगों मे अमृत के समान प्रशस्त है ॥६६-६६॥
एतैरौषधवर्गैर्वा विधेयत्वं न गच्छति ।
अञ्जनोत्सादनालेपान्नावनादींश्च योजयेत् ॥ ७० ॥
शिरीषो मधुकं हिङ्गु लशुनं तगरं वचा ।
कुष्ठं च बस्तमूत्रेण पिष्टं स्यान्नावनाञ्जनम् ॥ ७१ ॥
इति नस्याञ्जनम् ।
१उत्तम मात्रा का लक्षण—दिन रात्रि भर मे बिना दोष उत्पन्न किये जो
जीर्ण हो सके वह मात्रा कुष्ठ, विष, उन्माद ग्रह, अपस्मार को नाश करती
है । एक दिन रात मे जीर्ण होने वाली स्नेह की उत्तमा मात्रा, पूरे दिन मे
जीर्ण होने वाली मध्यमा और आधे दिन मे जीर्ण होनेवाली ह्रस्वमात्रा कहाती है ।
२. 'यत्स्याद् द्वादशवार्षिकम्' इति च पाठः ।